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29 सितम्बर, 2020|5:20|IST

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गोंडा : नहीं रहे सभी धर्मों के जानकार हाजी अब्दुल वहीद चौधरी

.....नबी से या वली से या ऋषि से कुछ नहीं होता, अगर तौफीक ए रब न हो तो किसी से कुछ नहीं होता। अपनी मृदु भाषी आवाज और बेलौस तकरीर के लिए देश भर में विख्यात हाजी अब्दुल वहीद (67) का लंबी बीमारी से शुक्रवार की सुबह निधन हो गया। निधन की सूचना मिलते ही क्षेत्र में शोक कि लहर दौड़ पड़ी। इनके अनुयायी भारत ही नहीं विदेश में भी है। स्टेशन रोड इटियाथोक में रहने वाले परिवार के बड़े बेटे तैय्यब चौधरी ने बताया कि काफी दिनों से बीमार चल रहे थे।

शुक्रवार की सुबह घर पर ही उनका निधन हो गया। देर शाम पैतृक निवास नौशहरा के कब्रिस्तान में सुपुर्द ए खाक किया गया। सोशल डिस्टेंसटिंग को देखते हुए जनाजे में परिवार के करीबी लोग ही शामिल हुए। जिसमे पूर्व प्रमुख हाजी अनवर शकील चौधरी, पूर्व प्रधान जकाउल्लाह चौधरी, हाजी लल्लन चौधरी, हाजी जुन्नू रैन, हाजी अब्दुल मजीद चौधरी, अब्दुल अजीज खान, हाजी डा जामिन अली, हाजी अब्दुल रशीद चौधरी, कुद्दन चौधरी, हाजी अशफाक चौधरी, दद्दन चौधरी सहित आदि लोग जनाजे में शामिल हुए।

कौन है हाजी अब्दुल वहीद चौधरी: पूर्व प्रमुख जिला पंचायत सदस्य हाजी अनवर शकील चौधरी के बड़े पिता रफातुल चौधरी के बेटे हाजी अब्दुल वहीद चौधरी का जन्म 1953 में हुआ। दो भाईयों में सबसे छोटे थे। बड़े भाई हाजी रशीद चौधरी मदरसा उसमनिया इटियाथोक में अध्यापक है। हाजी अब्दुल वहीद चौधरी ने हाईस्कूल की शिक्षा टामसन इंटर कालेज से पूरी की।सन 1970 से उन्होंने मौलाना पालमपुरी के देश में हो रहे उनके बयानों को सुनने के लिए घरों को छोड़ा। उस जमाने में मौलाना पालमपुरी ने अपनी एक किताब लिखी थी जिसका नाम 'शरीयत या जिहालत' थी।

हाजी वहीद ने इस किताब को इतना पढ़ा और मौलाना पालम पूरी के बयानों से इन्होंने सबसे पहले अपनी मृदु भाषी जुबान से नात ए पाक पढ़ने का सिलसिला शुरू किया। उसके बाद इन्होंने अल्लाह और उनके रसूल की बातो पर अपनी तकरीर भी शुरू कर दी। धीरे धीरे यह अपने नात ए पाक और तकरीर के लिए विख्यात हो गए। भारत ही नहीं पड़ोसी देश नेपाल, बांग्लादेश में इनके अनुयायी है।
 

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  • Web Title:Gonda: Haji Abdul Waheed Chaudhary a scholar of all religions