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22 नवंबर, 2020|10:08|IST

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Gandhi Jayanti 2019: दुनिया में गांधी- ओह मिस्टर गांधी कह कर वह -नीग्रो मुझसे लिपट गया

gandhi jayanti  2 october

जुलाई 2007 में मैं न्यूयार्क गया था। मेरे साथ सात लोग थे। एक तो जनसत्ता के सम्पादक ओम थानवी, लेखिका मृदुला गर्ग, उपान्यासकार और कथाकार उदयप्रकाश, हिन्दुस्तान दिल्ली के सम्पादकीय विभाग के विजय किशोर मानव और कन्हैया लाल नंदन। दो लोगों के नाम याद नहीं हैं। एक ही उड़ान से हम कैनेडी हवाई अड्डे पर उतरे। विद्याभवन के लोग हम लोगों को ले जाने के लिए हवाई अड्डे के बाहर आए थे लेकिन ओम थानवी ने कहा कि जब तक वे अन्य लोगों का इंतजार करेंगे तब तक हम आठ लोग टैक्सी से चल चलें। लेकिन दिक्कत यह थी कि अमरीका में कोई चार लोगों से अधिक को टैक्सी में नहीं बैठाता। सो, ओम थानवी ने कहा कि रुकिए, मैं कोई बड़ी गाड़ी ले आता हूं। वह बाहर गए और वहां से एक बड़ी गाड़ी लेकर लौटे। वो लिवोजिन कार थी। बहुत बड़ी थी। मैं तो जीवन में पहली बार उसमें बैठा था। उसे एक अश्वेत नीग्रो ड्राइवर चला रहा था। उसमें ड्राइवर का एक अलग केबिन बना हुआ था। वह गाड़ी लेकर हम लोगों के सामने आया। हम आठों लोग बाहर एक साथ खड़े थे। जब उसने मुझको देखा तो वह अपने केबिन से निकला और हाथ जोड़े, दौड़ता हुआ मेरे पास आया 'ओह, मिस्टर गांधी' कहते हुए। मुझे रोमांच हो आया कि कि अमेरिका की जमीन पर मैं अभी उतर रहा हूं और जो पहला आदमी मुझे मिल रहा है वो मुझे गांधी के रूप में सम्बोधित कर रहा है। इससे मैं संकुचित भी हुआ। असल में वो जो अश्वेत नीग्रो था उसने गांधी जी को देखा तो नहीं होगा लेकिन उनकी तस्वीर देखी होगी या फिल्म में उन्हें देखा होगा। तो उसको मुझे धोती-कुर्ता पहने हुए देखकर लगा कि इनकी तस्वीर गांधीजी से मिलती है और फिर वह 'ओह, मिस्टर गांधी...' कहकर मुझसे लिपट गया। उसके बाद हमको रेडिसन होटल जाना था। वह सबको वहां ले गया। जब सब लोग उतर गए तो फिर मेरे गले लगकर उसने 'ओह, मिस्टर गांधी', कहा।

इस वाकये के बाद ओम थानवी मुझे 'गांधीजी' ही कहने लगे। बाद में जब कभी वह दिल्ली में मिलते तो मुझे इसी नाम से सम्बोधित करते। ये गांधीजी का प्रभाव था उस अश्वेत व्यक्ति पर। इसे हमको वहां से जोड़ना चाहिए कि अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने जो क्रांति की उसमें भी वह गांधीजी को ही अपना गुरु मानते थे। इस घटना को मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा। इसके बाद दुनिया के और भी देशों में मुझे जाने का मौका मिला। मैं जहां-जहां गया वहां एक तो कहीं न कहीं गांधी की प्रतिमा देखी या उनके नाम पर बनी हुई कोई सड़क। चाहे कनाडा हो, मास्को हो, नीदरलैंड, कई अन्य देशों में ये मिला। दूसरे, जो ये धोती-कुर्ता वाली भेष-भूषा है इसमें जहां कहीं भी गया, गांधी की भेष-भूषा होने के कारण मुझे बहुत आदर मिला। चीन जैसे देश में सिक्योरिटी पर खड़े सिपाही ने मुझे बिना जांच के जाने दिया। मास्को में एक बार मैं 18 दिन रहा। वहां मेरे मित्र और कवि अनिल जनविजय दुभाषिये के रूप में पूरे समय मेरे साथ रहे। जब मैं चलने लगा तो उन्होंने कहा कि मास्को में बीसों वर्षों से रहने के बावजूद दिन में कई बार उनके कागजात चेक हो जाते थे, लेकिन मेरे साथ 18 दिन के दौरान पुलिस ने एक बार भी उनके कागजात चेक नहीं किए थे। यह सब आपकी पोशाक का कमाल है। वह मेरे मित्र हैं इसलिए मैंने उस वक्त उन्हें अपना एक कुर्ता निकालकर दिया बाद में पहनने के लिए। 

मैं दुनिया के करीब 16 देशों में गया। कनाडा के विश्वविद्यालय के सामने गांधी प्रतिमा के पास कई लोग दिखे। मास्को में बसों में सवार रूसी लोग हाथ हिला-हिलाकर हमारा अभिवादन करते थे। सभी जगह मैंने महसूस किया कि भारत का कोई एक व्यक्ति जो दुनिया में सर्वाधिक आदर की दृ़ष्टि से देखा जाता है वो हैं महात्मा गांधी। जुलाई 2007 में मैं जिन दिनों न्यूयार्क गया था, उसी सप्ताह संयुक्त राष्ट्रसंघ ने दो अक्तूबर को विश्व अहिंसा दिवस घोषित किया था। हम लोग संयुक्त राष्ट्रसंघ का कार्यालय देखने गए थे। उसके सामने एक मूर्ति शिल्प ,है जिसमें पिस्तौल को जंजीरों से बंधा हुआ रखा गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ हिंसा के विरुद्ध है। मुझे ऐसा लगता है कि गांधीजी की अहिंसा को भीतर से स्वीकार करने वाले लोग हैं। राष्ट्रों के प्रमुख भी हैं। 191 में से 137 देशों ने अहिंसा दिवस के पक्ष में मतदान किया था। गांधीजी की व्यापक स्वीकृति पूरी दुनिया में है।

आज भी प्रासंगिक हैं राष्ट्रपिता 

गांधीजी आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने कभी भी तात्कालिक दृष्टि से कुछ नहीं सोचा, बल्कि मनुष्यता के अंतिम लक्ष्य सुख और शांति को केंद्र में रखकर ही विचार किया। उन्होंने जो सोचा, जैसा भी आचरण किया वो आज और कल ही नहीं हमेशा प्रासंगिक रहेगा। आज जो धरना, प्रदर्शन, अनशन हो रहे हैं वो सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह के उनके मूलमंत्र पर ही आधारित हैं। लेकिन इनकी प्रभावशीलता इसलिए नहीं बन पा रही है क्योंकि बहुत बार ये क्षुद्र स्वार्थों को केंद्र में रखकर न किए जाने योग्य विषयों पर किए जाते हैं। यदि व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर इन्हें किया जाए तो आज भी इनकी वैसी ही प्रभावशीलता होगी। गांधीजी ने 1917 में जब चम्पारण में सत्याग्रह किया तो वहां की सीआईडी ने अपने उच्चाधिकारी को रिपोर्ट भेजी थी जो छपी हुई है। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि गांधीजी के प्रदर्शन को रोकना नामुमकिन है क्योंकि वह जहां-जहां जाते हैं वहां भीड़ लग जाती है और इस भीड़ को कंट्रोल करना बहुत मुश्किल है। तब वहां के कलेक्टर ने गांधीजी से कहा था कि आपको जिला छोड़ने का हुक्म दिया जाता है। 

(प्रस्तुति-अजय कुमार सिंह)

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  • Web Title:Gandhi Jayanti 2019 Gandhi in the world Negro said Oh Mr Gandhi and hug him