गिद्धों को विलुप्त होने से बचाने के लिए अनोखा प्रयास, दक्षिण अफ्रीका के वल्चर रेस्टोरेंट की तर्ज पर बनेगा गिद्ध का भोजनशाला
यूपी के खीरी और सीतापुर में गिद्धों के लिए वल्चर रेस्टोरेंट बनाया जाएगा। विलुप्त हो रहे गिद्ध प्रजाति को बचाने के लिए ऐसा प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए गिद्धों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराया जाएगा।

खीरी और सीतापुर में विलुप्त हो रहे गिद्ध प्रजाति को बचाने के लिए वल्चर रेस्टोरेंट (गिद्ध भोजशाला) का निर्माण किया जाएगा। सीतापुर में इसके लिए सबसे पहले पहल की जाएगी। जिले में गिद्धों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराया जाएगा। वहीं खीरी में गिद्धों की प्रजाति में बढ़ोत्तरी देखने को मिली है।
दुधवा टाइगर रिजर्व में मौजूदा समय में गिद्धों की पांच प्रजातियों को बचाने और इनकी संख्या में बढ़ोत्तरी को लेकर प्रस्ताव तैयार किया गया है। खीरी में दुधवा टाइगर रिजर्व समेत सौ स्थानों पर गिद्ध के दिखाई पड़ने के स्थान चिन्हित किए गये हैं। साथ ही इनकी गणना का भी काम किया जा रहा है। अब वल्चर रेस्टोरेंट का प्रस्ताव लेकर अधिकारी लाए हैं।
इस पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक केपी दुबे की मौजूदगी में तय किया गया। यह वल्चर रेस्टोरेंट खीरी और सीतापुर में बनेंगे। दुधवा टाइगर रिजर्व के निदेशक संजय पाठक ने बताया कि सबसे पहले सीतापुर जिले में गिद्धों के लिए भोजन की व्यवस्था करने को लेकर भोजस्थल का चुनाव तीन विभाग मिलकर करेंगे। खीरी में गिद्धों की अच्छी प्रजाति है। इसलिए शुरुआत सीतापुर से होगी।
आबादी से दूर बनेगा वल्चर रेस्टोरेंट
एफडी दुधवा टाइगर रिजर्व संजय पाठक ने बताया कि गिद्ध भोजस्थल के लिए आबादी से दूर गिद्ध रहने और पनपने वाली जगह को देखकर बनाया जाएगा। इसमें मरे हुए पशुओं के शव एकत्र होंगे। लेकिन उससे पहले इसकी जांच की जाएगी कि पशु के शरीर में डाइक्लोफेनिक या अन्य कोई खतरनाक रसायान तो नहीं है। साथ ही दूसरे जानवर इसमें न घुस सकें, इसके लिए चारों तरफ से बिना धातु के बाउंड्री बनाई जाएगी। इसके लिए पशुपालन, कृषि और वनविभाग मिलकर काम करेगा।
बांस और पेड़ों से बनेगी बाउंड्री
गिद्ध भोजस्थल बनाने को जगह का चिन्हित होने के बाद पहले इसको चारों तरफ से बांस और पेड़ खासकर बांस के पौधे, सेमल, ऊंचाई वाले पौधे लगाए जाएंगे। इसके अलावा दूसरे जानवर न घुस सके इसकी भी व्यवस्था की जाएगी।
सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में बना था वल्चर रेस्टोरेंट
पहला गिद्ध रेस्तरा साल 1966 में दक्षिण अफ्रीका में बना था। इसके बाद स्विट्जरलैंड, कंबोडिया, स्पेन, नेपाल में बनाया गया। वहीं भारत में हिमाचल प्रदेश में 2004 में और पठानकोट के नायरही गांव में 2009 में बनाया गया था।


