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8 मई, 2021|7:46|IST

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देव दीपावली: काशी के 5 घाटों से शुरू हुआ आयोजन 10 साल में 7 समंदर पार कर बना महापर्व

काशी की उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर देव दीपावली के दिन पूरा देवलोक उतर आता है। देव दीपावली का विहंगम व मनोरम दृश्य आंखों में उतारने के लिए हर मन आतुर रहता है। साढ़े तीन दशक पहले पंचगंगा सहित पांच घाटों से शुरू हुई देव दीपावली अगले एक दशक में सात समंदर पार कर महापर्व बन गई। इस बार तो देव दीपावली के इतिहास में पहली बार कोई प्रधानमंत्री भागीदारी कर रहा है। इससे भारत ही नहीं पूरे विश्व की निगाहें काशी की देव दीपावली पर टिकी हुई हैं। ऐसे में लोग सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर देव दीपावली की भव्यता का इतिहास भी खोज रहे हैं। 

काशी में पंचगंगा घाट से देव दीपावली की शुरूआत हुई थी। इससे पहले क्षेत्रीय लोगों के सहयोग से केवल दीपोत्सव होता था। वर्ष 1985 में मंगला गौरी मंदिर के महंत नारायण गुरु ने देव दीपावली को वृहद् और विहंगम रूप देने का प्रयास किया। उन्होंने देखा कि गंगा घाट बाढ़ के बाद भी काफी गंदे रहते हैं। कोई साफ सफाई नहीं होती। पर्यटकों को भी इससे असुविधा होती है। ऐसे में उन्हें विचार आया कि घाटों पर दीया जलाया जाए तो साफ सफाई भी हो जाएगी। उन्होंने पंचगंगाघाट के साथ पांच अन्य घाटों पर दीया जलाने की शुरुआत कराई।

नारायण गुरु ने देवदीपावली मनाने के लिए चाय-पान की दुकानों पर टिन रखवाए ताकि लोगों से तेल व घी का सहयोग मिल सके। नारायण गुरु बताते हैं कि उस समय सौ दीया का खर्च 12 रुपये आता था। छह घाट से शुरु हुआ आयोजन धीरे-धीरे प्रमुख घाटों तक पहुंच गया। नारायण गुरु के नेतृत्व में वर्ष 1990 तक यह उत्सव काशी के 84 में से 31 घाटों पर विस्तारित हो चुका था। इसके बाद इस उत्सव को प्रत्येक घाट पर आयोजित करने के लिए मुहिम चलाई गई। सभी घाटों पर दीये जलाने के लिए केंद्रीय देव दीपावली महासमिति बनाई गई। इससे एक दशक में इसने भव्य रूप ले लिया।

महासमिति के पदाधिकारियों ने काशी के कुंण्डों और तालाबों पर भी देव दीपावली मनाने की शुरुआत कर दी। 1995 से देव दीपावली को व्यापक आधार मिला। शहर के अन्य समाजसेवी भी इसमें योगदान देने के लिए आगे आये। इससे देखते ही देखते यह उत्सव वैश्विक फलक पर छा गया।

घाटों पर बनीं उप समितियां
महासमिति के अध्यक्ष वागीशदत्त मिश्र के नेतृत्व में प्रत्येक घाट पर उप समिति का गठन हुआ। 1992 में अयोध्या में ढांचा विध्वंस के बाद देवदीपावली उत्सव का विस्तार हुआ। 1995 से 2000 के बीच इस उत्सव को विश्वव्यापी ख्याति मिलनी शुरू हुई। 

1997 से शुरू हुई दैनिक आरती 
प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर सबसे पहले आरती की शुरुआत सन 1991 में हुई थी। तब चौकी पर मिट्टी की धुनुची में कपूर से खास अवसरों पर आरती होती थी। 14 नवम्बर 1997 से नित्य आरती गंगोत्री सेवा समिति ने शुरू की। अब यह भव्य स्वरूप ले चुकी है। एक आरती गंगोत्री सेवा समिति और दूसरी गंगा सेवा निधि की ओर से होती है।

इस बार बेहद खास है देवदीपावली
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए गंगा घाटों पर देव दीपावली के लिए खास तैयारी की गई है। गंगा घाटों पर 11 लाख दीप जलाए जाएंगे और गंगा पार रेत पर सैंड आर्ट भी बनाया गया है। चेतसिंह किला घाट पर लेजर शो की तैयारियां है। क्रूज पर सवार प्रधानमंत्री राजघाट से रविदास घाट तक अद्भुत दीपोत्सव की छटा निहारेंगे। 

कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित
कहा जाता है कि काशी के देव दीपावली उत्सव में किसी न किसी रूप में देवता भी शामिल होते हैं। कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को पर्व मनाया जाता है। एक समय त्रिपुर नाम के बलशाली राक्षस के अत्याचारों से देवता, ऋषि बेहाल और दुखी थे। अपनी रक्षा के लिए सभी महादेव की शरण में गए। तब भगवान शिव ने कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि को त्रिपुरासुर का वध कर दिया और तीनों लोकों को उसके भय से मुक्त किया। उस दिन से ही देवता हर वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को भगवान शिव के विजय पर्व के रूप में मनाने लगे। तब से देव दीपावली की शुरूआत हुई है। 

एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि विश्वामित्र ने देवताओं की सत्ता को चुनौती देकर अपने तप बल से त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। यह देखकर नाराज देवताओं ने त्रिशंकु को वापस पृथ्वी पर भेजना चाहा।  लेकिन महर्षि विश्वामित्र ने अपने तपोबल से उन्हें हवा में ही रोक दिया और नई स्वर्ग तथा सृष्टि की रचना प्रारंभ कर दी। यह देख देवताओं ने महर्षि से प्रार्थना की। तब उन्होंने दूसरे स्वर्ग और सृष्टि की रचना बंद कर दी। इससे प्रसन्न देवताओं ने दिवाली मनाई थी।

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  • Web Title:Devdeepavali of Kashi: A program started from 5 ghats and a mahaparva crossed 7 seas in 10 years