ट्रेंडिंग न्यूज़

Hindi News उत्तर प्रदेशयूपी में अब बन रहे चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार, गठबंधन टूटने से किसे नुकसान

यूपी में अब बन रहे चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार, गठबंधन टूटने से किसे नुकसान

यूपी में इंडिया गठबंधन टूटने से अब चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार बन रहे है। चारों प्रमुख दल भाजपा, सपा, कांग्रेस व बसपा अलग-अलग मैदान में उतरेंगे। आइए जानते हैं किसे नुकसान -

यूपी में अब बन रहे चतुष्कोणीय मुकाबले के आसार, गठबंधन टूटने से किसे नुकसान
Deep Pandeyअजित खरे,लखनऊWed, 21 Feb 2024 06:26 AM
ऐप पर पढ़ें

यूपी में सीटों के बंटवारे और अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं में फंसा इंडिया गठबंधन खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
इसके साथ ही यूपी का सियासी मंजर खासा दिलचस्प होता नजर आ रहा है। इंडिया गठबंधन ने तय किया था कि भाजपा को शिकस्त देने के लिए एक संयुक्त उम्मीदवार उतारा जाए लेकिन अब सपा-कांग्रेस के बीच बढ़ते अविश्वास के चलते संकेत है कि चारों प्रमुख दल भाजपा, सपा, कांग्रेस व बसपा अलग-अलग मैदान में उतरेंगे। बसपा ने शुरू से ही विपक्षी गठबंधन में शामिल होने से साफ इंकार कर दिया था। इस तरह 2024 की यूपी में चुनाव जंग चतुष्कोणीय मुकाबले के रूप में ही नजर आ रही है जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में त्रिकोणी मुकाबला था। तब सपा व बसपा ने गठबंधन किया था।

सपा को इस तरह हो सकता नुकसान 
इंडिया गठबंधन यूपी में अगर अंतत: टूट गया तो इसके लिए सपा को ही जिम्मेदार माना जाएगा और इससे जनता में गलत संदेश भी जाएगा। बसपा भी सपा पर गठबंधन धर्म का पालन न करने का आरोप लगाती रही है। सपा ने जिस तरह छोटे दलों को साथ जोड़कर पिछले विधानसभा चुनाव में अपनी सीटें 47 से बढ़ाकर 110 की थीं, वैसी कोशिश अब फलीभूत होती नहीं दिख रही। सुभासपा पहले ही साथ छोड़ चुकी है। सपा नेताओं का मानना है कि कांग्रेस से उन्हें फायदे की उम्मीद पहले भी नहीं थी क्योंकि उनका संगठन व आधार बहुत कमजोर है। 

कांग्रेस को बड़े नुकसान का अंदेशा 
सपा के मुकाबले कांग्रेस को अब ज्यादा नुकसान की संभावना है। गठबंधन होने की सूरत में कांग्रेस को सपा के वोट ट्रांसफर का फायदा होता। कांग्रेस को इससे राष्ट्रीय स्तर पर छवि का भी नुकसान होगा। पहले ही कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस से गठजोड़ से इंकार कर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इनमें पश्चिम बंगाल में टीएमसी व पंजाब में आम आदमी पार्टी प्रमुख हैं। ऐसे में अगर यहां यूपी में कांग्रेस को अकेले लड़ना पड़ा तो उसके लिए खासी मुश्किलें आ सकती हैं। कांग्रेस ने पहले बसपा को साथ लाने की काफी कोशिश की थी लेकिन मायावती ने विपक्षी गठबंधन में आने से इंकार करते हुए अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है।
 
अमेठी व रायबरेली में अब सपा उतारेगी अपने प्रत्याशी 
सपा की नाराजगी अगर बरकरार रही और गठबंधन बिखर गया तो सपा अमेठी व रायबरेली से प्रत्याशी उतारने से नहीं चूकेगी। कई सालों से सपा ने लोकसभा में इन दोनों सीटों पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा और कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन दिया। इस बार रायबरेली से सोनिया गांधी को भी नहीं लड़ना है। ऐसे में यह दोनों सीटें बचाना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती होगी।

सपा को लग रही भीतरी घात 
सपा ने इस चुनाव के लिए जीत का मंत्र बताते हुए पीडीए का नारा दिया लेकिन इस पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने ही सवाल उठा दिया। सपा के लिए यह अंसतोष खासा मुश्किलें पैदा कर सकता है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने अखिलेश यादव पर तीखा हमला करते हुए पार्टी छोड़ दी और वह अलग पार्टी बना कर किसकी राह में कांटे बोएंगे यह जल्द पता चलेगा। 

अपना दल कमेरावादी का साथ रखने की कोशिश 
सपा ने आपरेशन डैमेज शुरू करते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य को मनाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोविंद चौधरी को भेजा लेकिन स्वामी पहले ही सपा छोड़़ने का मन बना चुके थे। अपना दल कमेरावादी की नेता व सपा विधायक पल्लवी पटेल की नाराजगी दूर करने की कोशिशें हो रही हैं। सपा सांसद डिंपल यादव ने पहले तो पल्लवी पटेल को साधने की कोशिश की साथ ही यह भी बता दिया कि कैसे सपा ने पल्लवी पटेल को विधायक बनाने का काम किया।

फायदा और नुकसान का गणित
सपा और कांग्रेस के एक साथ आने पर मुस्लिम वोटों का बंटवारा काफी हद तक रुकता और इसका सीधा फायदा इंडिया गठबंधन को मिलता। प्रदेश में 13 सीटें मुस्लिम बाहुल्य हैं। इन पर मुस्लिम आबादी 30 से लेकर 50 फीसदी तक है। बसपा और सपा के गठबंधन में सबसे अधिक इसी गठबंधन ने चुनाव जीता था। इसके अलावा कानपुर कांग्रेस सीट पर भी फायदा मिलता। कांग्रेस यह सीट 1999 से 2009 तक तीन बार जीत चुकी है। फर्रुखाबाद सीट सपा दो बार और कांग्रेस एक बार जीत चुकी है। इलाहाबाद सीट सपा 2004 व 2009 में जीत चुकी है। कांग्रेस आखिरी बार 1984 में जीती थी। रायबरेली और अमेठी के साथ ही सुल्तानपुर सीट पर भी फायदा मिलता। दोनों की राह जुदा होने पर नुकसान से इनकार नहीं किया जा सकता है। दोनों के साथ आने पर 20 से 25 सीटों पर असर पड़ता।

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें