बोले सीतापुर : बराबर मेहनत मगर मजदूरी कम, भेदभाव से सभी हैं दंग
Sitapur News - महिलाएं पुरुषों के साथ मिलकर मेहनत करती हैं, लेकिन उन्हें समान काम के लिए भी कम मजदूरी मिलती है। सरकारी योजनाओं की जानकारी न होने के कारण वे कई लाभ से वंचित रह जाती हैं। महिला श्रमिकों का कहना है कि उन्हें रोजगार के अवसर बढ़ाने और भेदभाव खत्म करने के लिए जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है।
घर-गृहस्थी को चलाने के लिए महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। खेतों में धूप-बारिश के बीच खड़े होकर कृषि कार्य हो या फिर भट्ठों की तपती भट्टियों के पास ईंट ढोने से लेकर अन्य कार्यों में कभी वह पुरुषों से कम कार्य नहीं करती हैं। इसके बावजूद जिले में महिला श्रमिकों की स्थिति अब भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। मेहनत में पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद उन्हें मजदूरी देने में भी भेदभाव किया जाता है। श्रमिकयों ने कहा कि जिले में अगर मजदूर वर्ग की बात करें, तो इसमें महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में बहुत कम ही रहती है।

इसके बावजूद न तो उन लोगों को उचित मजदूरी मिलती है और न ही सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ ही मिलता है। इतना ही नहीं मजदूरों के लिए चल रही योजनाओं की जानकारी भी सुदुर ग्रामीण क्षेत्र की महिला श्रमिकों को नहीं दी जाती है। जिससे वह योजना के लाभ से भी वंचित रहती हैं। सभी ने कहा कि उन्हें बीमा का लाभ देने के साथ बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा की उचित व्यवस्था की जाए। घर-गृहस्थी की गाड़ी को सुचारु रूप से चलाने के लिए महिलाएं आज पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत और मजदूरी करने में जरा भी पीछे नहीं हैं। वह न सिर्फ अपने परिवार का सहारा बन रही हैं, बल्कि जिले की अर्थव्यवस्था की बुनियाद को भी मजबूती दे रही हैं। एक ओर जहां महिला श्रमिकों को मजदूरी मिलने के कारण धन तो मिल रहा है मगर काम का दायरा काफी सीमित है। इसके अलावा उनके साथ होने वाला भेदभाव सभी को काफी अखरता है। श्रमिकों का कहना है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों की महिला श्रमिकों को सरकारी योजनाओं की जानाकारी तक नहीं मिल पाती है। काम के दायरे कम होने से नजर नहीं आतीं महिला श्रमिक : आमतौर पर जिले में मजदूरी के काम में महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम ही नजर आती हैं। इसके पीछे मुख्य कारण है महिला श्रमिकों के लिए काम का दायरा काफी कम है। पुरुषों की तुलना में उनके लिए रोजगार के अवसर बहुत सीमित हैं। महिला श्रमिक मुख्य रूप से कृषि कार्यों, निर्माण कार्य, ईंट भट्ठा उद्योग, और मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम) जैसी योजनाओं तक ही सीमित हैं। इन क्षेत्रों को छोड़कर अन्य औद्योगिक या श्रम-प्रधान कार्यों में महिला श्रमिक यदा-कदा ही दिखाई देती हैं। शहर से लेकर छोटे कस्बों तक में दुकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और सेवा क्षेत्र में महिला श्रमिकों का नियोजन हैं। जहां उनकी भागीदारी सर्वाधिक है। लेकिन इस सबके बाद भी जिले में महिला श्रमिकों के लिए काम की संभावनाए पुरुषों की अपेक्षा काफी कम हैं, जो सीधे तौर पर उनके आर्थिक सशक्तीकरण में बाधा डालता है। सभी का कहना है कि कार्यस्थल पर महिला श्रमिकों के साथ होने वाला भेदभाव एक गंभीर सामाजिक मुद्दा है। अक्सर यह देखा जाता है कि बराबर काम करने के बाद भी महिला श्रमिकों को पुरुषों की तुलना में कम मेहनताना मिलता है। समान काम के लिए समान मजदूरी का सिद्धांत यहा दम तोड़ता नजर आता है। यह न केवल उनके संवैधानिक और श्रम अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि उनके स्वाभिमान पर भी एक गहरा आघात है। कम मजदूरी से नहीं चलता परिवार : एक ही काम के लिए कम मजदूरी मिलने से उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रभावित होती है और वे गरीबी के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल पातीं। श्रम विभाग और प्रशासन के लिए यह एक बड़ा सवाल है कि इस वेतन भेदभाव को दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं। इसके अलावा सरकार की ओर से विभिन्न कौशल विकास कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जो उन्हें मजदूरी के सीमित दायरे से बाहर निकालकर अधिक वेतन वाले स्थायी रोजगार की ओर ले जा सकते हैं। लेकिन इन कार्यक्रमों में महिला श्रमिकों की भागीदारी न के बराबर है। अशिक्षा, समय की कमी और कार्यक्रमों की जानकारी न होने के कारण वे अवसरों का लाभ नहीं उठा पातीं। योजनाओं की जानकारी के लिए लगे गांव-गांव शिविर : महिला श्रमिकों का कहना है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी देने के लिए गांव-गांव विशेष शिविर लगाने चाहिए। जहा श्रम कानूनों, न्यूनतम वेतन और सरकारी योजनाओं (जैसे मातृत्व लाभ, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन) की जानकारी सरल और स्थानीय भाषा में दी जाए। वहीं श्रम विभाग को कार्यस्थलों पर नियमित निरीक्षण कर समान काम के लिए समान मजदूरी तय कराया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जाए। वहीं ईंट भट्ठा व निर्माण स्थलों पर अनिवार्य रूप से शिशु देखभाल केंद्र और पीएचसी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। योजनाओं की जानकारी देने के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी इसलिए भी है क्योंकि इन महिला श्रमिकों को सरकारी योजनाओं को लेकर जागरुक करने के लिए सरकारी स्तर से प्रयास भी कम ही दिखाई देते हैं। योजनाओं का प्रचार-प्रसार केवल कागजो तक या शहरी क्षेत्रों तक सीमित रहता है, जबकि ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र की महिलाओं के बीच व्यक्तिगत संपर्क, स्थानीय भाषा में प्रचार और शिविरों की सख्त जरूरत है। ईंट भट्ठा, निर्माण कार्य या कृषि कार्य से जुड़ी अधिकतर महिलाए असंगठित क्षेत्र से आती हैं। उनके पास पहचान पत्र, बैंक खाता या आवश्यक दस्तावेज पूरे नहीं होते हैं, जो सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की पहली शर्त होती है। बिचौलियों की सक्रियता और जटिल आवेदन प्रक्रिया भी उन्हें योजनाओं से दूर रखती है। महिला श्रमिकों का कहना है कि सशक्तीकरण के लिए केवल कागजों में नीतियां बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना जरूरी है। स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं कम महिला श्रमिकों के जीवन में स्वास्थ्य और शिक्षा सबसे सबसे बड़ा मुद्दा है। खासकर उन महिलाओं के लिए जो असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं। कई महिला श्रमिकों का कहना है कि ईंट भट्ठा जैसे अत्यधिक श्रम और धूल भरे वातावरण में काम करने वाली महिलाओं को गर्भावस्था या अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के दौरान किसी भी तरह की आवश्यक सहूलियतें या मातृत्व अवकाश नहीं मिल पाता है। खतरनाक कामकाजी माहौल, अपर्याप्त पोषण और चिकित्सा सुविधाओं की कमी उनके और उनके अजन्मे बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है। स्वास्थ्य चिंताओं के कारण, ये महिलाए अक्सर काम छोड़ने या अपने स्वास्थ्य से समझौता करने के लिए मजबूर होती हैं। इस निरंतर संघर्ष के चलते उनके लिए अपने बच्चों की शिक्षा और पढ़ाई-लिखाई का उचित प्रबंध कर पाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है। ईंट भट्ठों के पास न तो उचित स्कूल होते हैं और न ही माता-पिता के पास इतना समय या साधन होता है कि वे बच्चों को नियमित शिक्षा प्रदान कर सकें। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी अशिक्षा और मज़दूरी का यह दुष्चक्र जारी रहता है। जागरूकता का अभाव, महिला श्रमिकों की राह में बड़ी बाधा जिले में महिला श्रमिकों के लिए सबसे बड़ी समस्या, उनके कल्याण और आर्थिक विकास के लिए बनी सरकारी योजनाओं को लेकर जागरूकता का अभाव है। महिला श्रमिको का कहना है कि इन महिला श्रमिकों को सरकारी योजनाओं में कोई खास सुविधा नहीं मिल रही है, जिसका मुख्य कारण इन योजनाओं की जानकारी उन तक न पहुंचना है। महिला श्रमिकों के लिए केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न योजनाए चलाती हैं। इनमें प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना, विभिन्न कौशल विकास कार्यक्रम, मातृत्व लाभ योजनाए, और महिला आर्थिक विकास निगमों द्वारा संचालित ऋण और प्रशिक्षण योजनाए शामिल हैं। सैद्धांतिक रूप से, ये योजनाए उनके आर्थिक विकास में बड़ा सहारा बन सकती हैं, उनके बुढ़ापे को सुरक्षित कर सकती हैं और उन्हें स्वास्थ्य सुरक्षा भी प्रदान कर सकती हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन योजनाओं के बारे में अधिकांश महिला श्रमिकों में जागरूकता की भारी कमी है। जिसके कारण भारी संख्या में महिला मजदूरों को जानकारी ही नहीं है कि उन लोगों का पंजीकरण कैसे होगा और उन्हें योजनाओं का लाभ कैसे मिलेगा। जानकारी के अभाव के कारण असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं भी योजनाओं से वंचित रह जाती हैं। हमारी भी सुनिए हम पुरुषों के साथ दिन भर उतनी ही मेहनत करते हैं, ईंटें ढोते हैं, सीमेंट मिलाते हैं, लेकिन जब मजदूरी की बारी आती है तो हमें उनसे सौ-डेढ़ सौ रुपये कम मिलते हैं। - श्यामकली जागरूकता के लिए कोई खास प्रयास नहीं होता। अगर गांव-गांव नुक्कड़ सभाएं करके हमें योजनाओं के बारे में बताएं तो उनका लाभ मिले। - कल्पना हमारे आर्थिक विकास में सहायक सरकारी योजनाओं हो सकती हैं। अगर हमें जानकारी मिले तो शायद हम खुद का काम शुरू कर सकें। - सीमा देवी हमें अधिकारों के बारे में कोई नहीं बताता। बराबर काम, बराबर दाम सिर्फ कहने की बात लगती है। हमारी समस्या कोई सुनता नहीं। - हीरा देवी असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिला श्रमिकों के लिए कई योजनाएं चल रही है। पंजिकृत महिला श्रमिकों को इसका लाभ भी मिल रहा है। वहीं महिला श्रमिको को अधिकारों व योजनाओं की जानकारी देने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाये जाते है। उमेश, उपायुक्त श्रम प्रस्तुति: अविनाश दीक्षित

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