
बोले सीतापुर : जंगल-झाड़ी से गुजरते छात्र उपेक्षा से शिक्षा हो रही चौपट
संक्षेप: Sitapur News - सीतापुर जिले के प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति बेहद बदहाल है, जहां बच्चे गन्ने के खेतों से होकर स्कूल जाने को मजबूर हैं। शिक्षकों की लापरवाही और सुरक्षा की चिंता के चलते अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने...
शिक्षा विभाग की तमाम योजनाओं और सरकार के सख्त निर्देशों के बावजूद जिले के कई प्राथमिक विद्यालयों की स्थितियां काफी बदहाल है। पानी, टूटे शौचालय व गंदगी आदि की समस्याएं तो काफी परिषदीय प्राथमिक विद्यालयों में है। मगर कई स्कूल ऐसे हैं जहां एक-डेढ़ दशक बाद भी कई समस्याओं का समाधान नहीं हुआ है। मछरेहटा ब्लॉक की ग्राम पंचायत फतेहनगर के मजरा इंदलपुर में बना प्राथमिक विद्यालय और बेहटा ब्लॉक का प्राथमिक विद्यालय चौरा इस स्थिति की सच्ची तस्वीर पेश करते हैं। दोनों ही विद्यालयों में हालात ऐसे हैं कि शिक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है, कहीं बच्चों को स्कूल पहुंचने के लिए गन्ने के खेतों के बीच मेड़ों से होकर गुजरना पड़ रहा है, तो कहीं शिक्षकों की लापरवाही बच्चों के भविष्य पर भारी पड़ रही है।

इन तमाम दिक्कतों को लेकर इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों अभिभावक अब बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं। मजबूरी में उन्हे अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए निजी स्कूलों में दखिला दिलाना पड़ रहा है। जो जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। जिले में शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के सरकारी दावे हवा हवाई साबित हो रहे हैं। बावजूद, सीतापुर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों की जो हकीकत सामने आई है, वह सरकारी मशीनरी और शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही को उजागर करती है। एक तरफ मछरेहटा ब्लाक के ग्राम पंचायत फतेहनगर के मजरा में स्थित प्राथमिक विद्यालय इंदलपुर है। जहां बच्चे पिछले 16 वर्षों से जान जोखिम में डालकर गन्ने के खेतों और जंगली रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। वहीं दूसरी ओर बेहटा ब्लाक के प्राइमरी स्कूल चौरा में शिक्षकों की मनमानी और अनुपस्थिति ने बच्चों की शिक्षा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। इन दोनों विद्यालयों के अतिरिक्त कई अन्य विद्यालय हैं जहां पर बच्चों को सुविधाएं नहीं मिल रही है। स्कूल जाने का रास्ता तक नहीं : जिले के मछरेहटा ब्लाक की ग्राम पंचायत फतेहनगर के मजरा में वर्ष 2009 में प्राथमिक विद्यालय इंदलपुर की नींव रखी गई थी। निर्माण के 16 साल बाद भी यह स्कूल प्रशासन की विफलता का जीता-जागता प्रमाण बन गया है। इस विद्यालय में मौजूदा समय में कुल 65 बच्चे पंजीकृत हैं। इन नौनिहालों को शिक्षित करने की के लिए प्रधानाध्यापक सहित पांच शिक्षक तैनात हैं। अभिभावकों ने शिक्षकों की कर्तव्यनिष्ठा की तारीफ करते हुए बताया कि सभी शिक्षक समय से स्कूल आते हैं और स्कूल भी समय से खुलता है। यह स्कूल गांव से काफी दूरी पर स्थित है। इतना ही नहीं गांव से स्कूल तक जाने का कोई निर्धारित या पक्का रास्ता ही नहीं है। बीते करीब 16 सालों से स्कूल के बच्चे रोज अपने जीवन को दांव पर लगाकर शिक्षा ग्रहण करने जा रहे हैं। बच्चों को रोज गन्ने के खेतों के बीचों-बीच बनी पतली मेड़ों से होकर निकलना पड़ता है। बरसात के मौसम में यह मेड़ कीचड़ और फिसलन से भरी होने के कारण बच्चों की मुश्किलें और भी बढ़ा देती है। इसके अलावा, खेतों से होकर जंगल-झाड़ी वाले इलाकों से गुजरना उनकी रोजमर्रा की मजबूरी बन चुका है। अभिभावकों के अनुसार, इन दुश्वारियों के बावजूद बच्चों को मध्याह्न भोजन सहित सरकार की ओर से दी जा रही सभी सुविधाएं स्कूल में उपलब्ध हैं, लेकिन रास्ते की यह समस्या हर सुविधा पर भारी पड़ रही है। खेत-झाड़ियों से होकर जाते बच्चे जंगली जानवरों का रहता खतरा : खेतों और जंगल-झाड़ियों के बीच से होकर रोज गुजरने से स्कूली बच्चों को जंगली जानवरों का खतरा भी लगातार बना रहता है। इस स्कूल के बच्चों के अभिभावकों का दर्द शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उनका कहना है कि जब तक बच्चे स्कूल से घर वापस नहीं आ जाते, तब तक उन्हें हर पल डर लगा रहता है। इस भयावह स्थिति का परिणाम यह हुआ है कि गांव के तमाम अभिभावकों ने अपने बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए उनका स्कूल जाना ही बंद करवा दिया है। शिक्षा पाने की ललक जान के खतरे के सामने गौण हो गई है। शासन के स्पष्ट आदेश के बावजूद अधिकारियों की ओर से नौनिहालों की सुरक्षा को पूरी तरह नजरंदाज किया जा रहा है। 16 सालों में प्रशासन एक प्राथमिक विद्यालय के लिए डेढ़-दो किलोमीटर का रास्ता नहीं बनवा पाया। यह बच्चों के मौलिक अधिकार का हनन है। इसे लेकर अभिभावक राम लखन ने बताया कि स्कूल में बच्चों की उपस्थिति इसलिए कम है क्योंकि पढ़ाई का माहौल ही नहीं है। आए दिन शिक्षक अनुपस्थित रहेंगे, तो बच्चों की पढ़ाई कैसे होगी। बच्चों का भविष्य खराब हो रहा है। मेरी गुजारिश है कि स्कूल की शिक्षण व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाए। बाघ के खौफ से उबरा महोली शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आई जिले के महोली क्षेत्र में बाघ की दहशत से दहले गांवों में अब हालात सामान्य हो गए हैं। कठिना नदी की तलहटी में बसे नरनी और आसपास के गांवों में बाघ के आने-जाने से लोगों में डर का माहौल था। बाघ के खौफ ने लोगों को एक तरह से घरों में कैद कर दिया था। सबसे ज्यादा प्रभावित प्राथमिक शिक्षा रही, क्योंकि अभिभावकों ने बच्चों को सुरक्षा के डर से स्कूल भेजना बंद कर दिया था। कई महीनों तक बच्चे घरों में ही कैद रहे और कक्षाएं पूरी तरह ठप पड़ी रहीं। इलाके के लोगों को बाघ की दहशत से मुक्ति दिलाने के लिए वन विभागों की वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट के साथ महीनों तक क्षेत्र में कैंप किया। इस दौरान वन विभाग ने अपना कंट्रोल रूम नरनी गांव को ही बनाया। हालांकि वन विभाग की टीम ने लगातार अभियान चलाकर बाघ और उसके कुनबे को सुरक्षित रेस्क्यू कर लिया। अब क्षेत्र में फिर से सामान्य माहौल है। बच्चे रोजाना स्कूल जा रहे हैं और शिक्षा व्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है। अभिभावक और शिक्षक दोनों ही राहत महसूस कर रहे हैं। छह शिक्षक-शिक्षामित्र फिर भी बच्चे आते कम जिले के ब्लाक बेहटा का प्राइमरी स्कूल चौरा तक पहुंचने का रास्ता बेहतर है। तमाम सुविधाएं भी बच्चों को मिल रही हैं, लेकिन समस्या है शिक्षकों की गैर जिम्मेदारी। इस स्कूल में कुल 91 बच्चे पंजीकृत हैं। लेकिन शिक्षकों की गैर मौजूदगी के कारण बच्चों की उपस्थिति बेहद खराब है। पड़ताल के दिन पंजीकृत बच्चों के सापेक्ष महज 40 छात्र ही उपस्थित थे। यह स्थिति रोजाना की रहती है जब स्कूल में 50 प्रतिशत से भी कम बच्चे आते हैं। इस प्राइमरी स्कूल में प्रधानाध्यापक सहित तीन शिक्षकों की तैनाती है, वहीं तीन शिक्षा मित्र भी बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। कुल छह लोगों की टीम शिक्षण व्यवस्था के लिए तैनात है। शिक्षकों की उपस्थिति बच्चों की उपस्थिति से भी अधिक चिंताजनक है। पड़ताल के दिन सहायक अध्यापक अभिमन्यु सिंह और शिक्षामित्र पंकज मिश्रा ही मौके पर मौजूद मिले। प्रधानाध्यापक, एक सहायक अध्यापिका और दो शिक्षा मित्र बिना पूर्व सूचना के नदारद थे। शिक्षकों की इस लापरवाही पर अभिभावकों का गुस्सा जायज है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षक आएं तो बच्चों की उपस्थिति ठीक हो जाए। इंदलपुर में स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं, रास्ता तक नहीं जिले के इंदलपुर में स्कूल तक पहुंचने का रास्ता तक नहीं है। जिससे उनकी शिक्षा बाधित हो रही है। 16 साल से रास्ता ना बना पाने वाले अधिकारी बच्चों की सुरक्षा को नजरंदाज कर रहे हैं। इंदलपुर में शिक्षा ग्रहण करने वाले अभिभावक कहते हैं कि रास्ता ठीक न होने के कारण बच्चों को वहां पहुंचने की बच्चे खेतों से होकर गुजरते हैं। ऐसे में तत्काल प्रभाव से स्कूल तक पहुंचने के लिए पक्के रास्ते का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर शुरू किया जाना चाहिए, ताकि बच्चे सुरक्षित माहौल में शिक्षा ग्रहण कर सकें। वहीं चौरा में शिक्षकों की लापरवाही से बच्चों का भविष्य अंधकारमय बना रही है। प्राइमरी स्कूल चौरा में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों ने कहा कि वहां पर तैनात शिक्षक अक्सर गैर हाजिर रहते हैं। जिसके कारण बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पा रही है। सभी ने कहा कि प्रशासन एक ओर कायाकल्प योजना के तहत स्कूल को संवारने का दावा करता है। मगर ऐसे स्कूलों तक पहुंचने का रास्ता तक नहीं बनाया जा रहा है। अधिकारी यह नहीं सोचते हैं कि जब बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंचेंगे तो पढ़ाई कैसे होगी। सभी ने कहा कि इसी प्रकार शिक्षकों की शत प्रतिशत उपस्थिति कराई जाए। सभी ने कहा कि शिक्षण व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए नियमित निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए। होगी। शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में प्रवेश लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने तक है। जब तक जिम्मेदार अधिकारी अपनी कुर्सी से उठकर इन जमीनी सच्चाइयों को नहीं देखेंगे, तब तक सीतापुर के हजारों नौनिहालों का भविष्य इसी तरह दांव पर लगा रहेगा। उम्मीद है कि यह खबर जिम्मेदारों की नींद तोड़ेगी और बच्चों को वह शिक्षा का माहौल मिल सकेगा, जिसके वे हकदार हैं। बोले अभिभावक इंदलपुर के प्राइमरी स्कूल में बुनियादी ढांचे की कमी से बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा दोनों प्रभावित हो रही है, जिससे अभिभावक डरकर बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर रहे हैं। - अंबर 16 साल से जब से स्कूल बना हम देख रहे है। बच्चे खेतों से होकर जा रहे हैं। बरसात में कई बार कीचड़ में कई बार बच्चे गिर जाते हैं। - उर्मिला देवी गन्ने के खेत होकर स्कूल जाना पड़ता है। जंगली जानवर, सांप का डर बना रहता है। बच्चा वापस नहीं आ जाता तब तक डर रहता है।-केशव राम स्कूल अच्छा है, मास्टर साहब लोग भी समय से आते हैं, लेकिन रास्ता ही बड़ी समस्या है। बच्चे जंगल व खेतों की मेढ़ से कैसे निकलेंगे। - मंजू देवी बोले जिम्मेदार जिले के प्राइमरी स्कूलों में व्यवस्थाओं को परखने के लिए समय-समय पर जांच की जाती है। स्कूल जाने का रास्ता न होने की जानकारी नहीं है। जल्द ही इसकी जांच करी जाएगी। वहीं स्कूलों में शिक्षकों के न आने के मामले में संबंधित बीईओ को निरीक्षण करने का निर्देश दिया जाएगा। स्कूलों की समस्याओं के लिए वह भी लगातार भ्रमण करके जानकारी लेते रहते हैं और समस्याएं दूर की जाती है। अखिलेश प्रताप सिंह, बीएसए प्रस्तुति: अविनाश दीक्षित

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