गुनाहों से निजात पाने का सुनहरा अवसर है रमजान का दूसरा अशरा
Sitapur News - पवित्र रमजान का दूसरा अशरा, जिसे मगफिरत का अशरा कहा जाता है, 10 रमजान को शुरू हुआ। इस दौरान अल्लाह की रहमतों का विशेष महत्व है। मौलाना मोहम्मद आलम रज़ा के अनुसार, इस अशरे में सच्चे दिल से तौबा और इबादत करने की आवश्यकता है। रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है: रहमत, मगफिरत, और जहन्नुम से निजात।

गैड़ास बुजुर्ग, संवाददाता। पवित्र माहे रमजान का पहला अशरा संपन्न होने के बाद अब दूसरा अशरा शुरू हो चुका है। इसे मगफिरत यानी क्षमा का अशरा कहा जाता है। क्षेत्र के इस्लामी विद्वान मौलाना मोहम्मद आलम रज़ा ने रमजान की फजीलत बयान करते हुए बताया कि दूसरा अशरा 10 रमजान की मगरिब की अजान के बाद से शुरू होकर 20 रमजान की मगरिब तक रहता है। मौलाना मोहम्मद आलम रजा ने कहा कि रमजान का महीना अल्लाह की खास रहमतों और बरकतों का महीना है, जिसमें इबादत का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। पहले अशरे में बंदों पर रहमत की बारिश होती है, जबकि दूसरे अशरे में गुनाहों की मगफिरत का दरवाजा खुला रहता है।
इस दौरान बंदों को चाहिए कि वे सच्चे दिल से तौबा करें, ज्यादा से ज्यादा इबादत करें और अपने रब से अपने गुनाहों की माफी मांगें। मौलाना ने बताया कि जो शख्स ईमान और सवाब की नीयत से रोजा रखता है और अल्लाह की इबादत में लगा रहता है, उसके गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। रमजान को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला रहमत, दूसरा मगफिरत और तीसरा जहन्नुम से निजात का अशरा होता है। उन्होंने अपील किया कि रोजा, नमाज और कुरआन की तिलावत का सिलसिला पूरे रमजान जारी रखें, क्योंकि आखिरी अशरा भी बेहद अहम होता है, जिसमें इबादत करने वालों को खास इनाम की बशारत दी गई है।
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