बोले सीतापुर- स्कूलों में बेटियों के लिए बने शौचालयों की स्थिति
जिले के सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए बनाए गए शौचालय बदहाल स्थिति में हैं। नियमित सफाई, पानी और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण ये शौचालय उपयोग के लायक नहीं हैं। इसका छात्राओं की पढ़ाई और उपस्थिति पर गंभीर असर पड़ रहा है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।
जिले के ज्यादातर सरकारी स्कूलों में छात्राओं के लिए बनाए गए शौचालय बदहाल स्थिति में हैं। नियमित सफाई, पानी, रोशनी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने इन शौचालयों को उपयोग के लायक नहीं छोड़ा है। इसका सीधा असर छात्राओं की पढ़ाई और उनकी उपस्थिति पर पड़ रहा है, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिले के अधिकांश प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में छात्राओं के लिए शौचालय तो बनाए गए हैं, लेकिन उनकी स्थिति इतनी खराब है कि छात्राएं उनका उपयोग करने से कतराती हैं। जिले के लहरपुर, महोली, बिसवां, बेहटा और सकरन ब्लाकों में सरकारी स्कूलों में शौचालयों की हालत बेहद चिंताजनक है।
शहर के कंपोजिट विद्यालय गांधीनगर और बिसवां के कंपोजिट विद्यालय देवकलिया में तो हालत ये है, कि शौचालय किसी भी तीह इस्तेमाल योग्य नही हैं। सरकारी स्कूलों में बने इन शौचालयों की नियमित सफाई नहीं होती। कई जगहों पर महीनों से सफाई नहीं हुई है, जिससे बदबू और गंदगी के कारण छात्राएं वहां जाना ही नहीं चाहतीं। कुछ स्कूलों में तो शौचालयों के बाहर ही गंदगी का ढेर लगा रहता है। इससे संक्रमण और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। पानी की व्यवस्था भी एक बड़ी समस्या है। अधिकांश स्कूलों में शौचालयों में पानी नहीं पहुंचता। टंकियां खाली पड़ी रहती हैं या नल खराब होते हैं। ऐसे में छात्राओं को मजबूरी में खुले में जाना पड़ता है या फिर वे शौच को रोककर बैठी रहती हैं, जो उनकी सेहत के लिए बेहद नुकसान दायक है। साबुन की उपलब्धता भी लगभग शून्य है। हाथ धोने के लिए साबुन न होना स्वच्छता के बुनियादी नियमों की अनदेखी है। इससे न केवल संक्रमण का खतरा बढ़ता है, बल्कि बच्चों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी विकसित नहीं हो पाती। कई स्कूलों में शौचालयों के दरवाजे टूटे हुए हैं या ठीक से बंद नहीं होते। इससे छात्राओं की निजता प्रभावित होती है। किशोरावस्था में यह समस्या और अधिक संवेदनशील हो जाती है, जब उन्हें सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण की जरूरत होती है। ऐसे में छात्राएं शौचालय का उपयोग करने से बचती हैं। शौचालयों में रोशनी की कमी भी एक गंभीर मुद्दा है। कई शौचालयों में पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था नहीं है। अंधेरे और गंदे शौचालय छात्राओं में डर पैदा करते हैं, जिससे वे उनका इस्तेमाल नहीं करना चाहतीं। जिले में शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्कूलों में शौचालयों पर ताले लटके रहते हैं। यह स्थिति और भी विचित्र है, क्योंकि शौचालय बने होने के बावजूद उनका उपयोग नहीं हो पा रहा। कई जगह शिक्षकों या कर्मचारियों द्वारा शौचालयों को बंद रखा जाता है, जिससे छात्राओं को परेशानी होती है। यह समझना होगा कि स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय केवल सुविधा नहीं, बल्कि छात्राओं का अधिकार है। जब तक स्कूलों में यह बुनियादी जरूरत पूरी नहीं होगी, तब तक ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे नारे केवल कागजों तक ही सीमित रहेंगे।सरकारी स्कूलों के शौचालय बदहाल, छात्राओं को हो रही परेशानीजिले के सरकारी स्कूलों में शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों में तक छात्राओं के लिए बने शौचालय बदहाल हैं। शहर के कांपेजिट विद्यालय गांधीनगर और बिसवां के कंपोजिट विद्यालय देवकलिया में शैचालय व्यवस्था बहुत ही दयनी है। कंपोजिट विद्यालय गांधीनगर मे कुल पंजीकृत छात्रों में 15 छात्राएं हैं। लेकिन बदहाल शौचालय व्यवस्था के चलते छात्राएं कम ही स्कूल आती हैं। यहां शैचालय पर ताल लटका रहता है, जबकि हांथ धोने के लिए लगी पानी की टोंटियां टूटी पड़ी है। इसके अलावा हांथ धोने के लिए साबुन भी उपलब्ध नही है। वहीं कंपोजिट विद्यालय देचकलिय में तो स्थिति और भी खराब है। यहां शौचालय इस्तेमाल करने की हालत में नही हैं। शौचरलयों के दरवाजे टूटे पड़े हैं। इसके अलावा महीनों से शौचालयों की सफाई नही हुई है। जिसकी वजह से दूर से बदबू आती है। पानी और हांथ धोन के लिए साबुन के इंतजाम भी नही हैं। जिसकी वजह से स्कूल आने वाली छात्राओं को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।सरकारी स्कूलों में नही है सेनेट्री नेपकिन की व्यवस्थासबसे बड़ी कमी सेनेट्री नैपकिन की उपलब्धता को लेकर है। किशोरी छात्राओं के लिए मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बेहद जरूरी होती है, लेकिन अधिकांश स्कूलों में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। इससे छात्राएं उन दिनों स्कूल आना ही छोड़ देती हैं या बीच में घर लौट जाती हैं। इस समस्या का सीधा असर छात्राओं की शिक्षा पर पड़ रहा है। कई बच्चियां शौचालय की सुविधा न होने के कारण स्कूल जाना बंद कर देती हैं। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर है, जहां सामाजिक झिझक और सुविधाओं की कमी मिलकर लड़कियों की पढ़ाई में बाधा बनती है। शिक्षकों का कहना है कि कई बार उन्होंने इस समस्या को उच्च अधिकारियों के सामने उठाया है, लेकिन समाधान नहीं निकल पाया। बजट की कमी और निगरानी के अभाव में यह समस्या जस की तस बनी हुई है। छात्राओं के अभिभावकों में भी इसको लेकर नाराजगी है। उनका कहना है कि वे अपनी बेटियों को स्कूल भेजते हैं ताकि उनका भविष्य बेहतर हो सके, लेकिन बुनियादी सुविधाओं की कमी उनके विश्वास को कमजोर कर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों में शौचालयों की बेहतर व्यवस्था केवल सुविधा का मुद्दा नहीं, बल्कि यह छात्राओं के सम्मान, स्वास्थ्य और शिक्षा का सवाल है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो यह लड़कियों की शिक्षा दर पर नकारात्मक असर डाल सकता है।शौचालयों की सफाई के तैनात हों सफाईकर्मी और मजबूत हो निगरानी व्यवस्थाप्रशासन की ओर से समय-समय पर दावे किए जाते हैं कि स्कूलों में सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। जरूरत है कि इन दावों की सच्चाई जांची जाए और वास्तविक स्थिति के अनुसार सुधारात्मक कदम उठाए जाएं। समाधान के तौर पर सबसे पहले स्कूलों में शौचालयों की नियमित सफाई सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए अलग से सफाई कर्मियों की नियुक्ति या जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। पानी और साबुन की उपलब्धता हर हाल में सुनिश्चित होनी चाहिए। इसके अलावा शौचालयों की मरम्मत कर उन्हें उपयोग योग्य बनाया जाना जरूरी है। दरवाजे, नल, टंकियां और रोशनी की व्यवस्था तुरंत ठीक की जानी चाहिए। साथ ही, सेनेट्री नैपकिन वेंडिंग मशीन और उनके सुरक्षित निपटान की व्यवस्था भी स्कूलों में होनी चाहिए। निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना भी जरूरी है। समय-समय पर अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शौचालयों की स्थिति ठीक है और छात्राओं को किसी तरह की परेशानी नहीं हो रही।शिकायतें और सुझावशिकायतेंदेवकलिया के स्कूल में शौचालयों की नियमित सफाई नहीं होती, जिससे गंदगी और बदबू बनी रहती है।कई स्कूलों में हाथ धोने के लिए साबुन की व्यवस्था लगभग हर जगह नदारद है।कंपोजिट विद्यालय देवकलिया में शौचालयों के दरवाजे टूटे हैं, जिससे छात्राओं की निजता प्रभावित होती है।शहर के कंपोजिट विद्यालय गांधीनगर में शौचालय बने होने के बावजूद उन पर ताला लटका रहता है।देवकलिया के स्कूल में छात्राओं के लिए मासिक धर्म के दौरान जरूरी सेनेट्री नैपकिन की व्यवस्था नहीं है।इन समस्याओं के कारण छात्राएं स्कूल छोड़ने या बीच में घर लौटने को मजबूर होती हैं।सुझावस्कूलों के शौचालयों की रोजाना सफाई के लिए जिम्मेदारी तय की जाए।टंकियों की मरम्मत और नियमित जल आपूर्ति सुनिश्चित की जाए।सभी स्कूलों के शौचालय में हाथ धोने के लिए साबुन रखा जाए।जिन स्कूलों के शौचालय के दरवाजे टूटे हैं, उन्हे तत्काल ठीक कराया जाए।छात्राओं के लिए बने शौचालयों पर ताला लगाने की प्रथा समाप्त की जाए।सभी स्कूलों में सेनेट्री नैपकिन वेंडिंग मशीन लगाई जाए।नंबर गेम3511 स्कूल हैं जिले में4,75,000 बच्चे हैं इन स्कूलों में18,000 शिक्षक हैं जिले मेंबोले जिम्मेदारजिले के सभी स्कूलों में खासकर छात्राओं के लिए सुविधाओं का विशेष ख्याल रखा जाता है। जिसे जांचने के लिए समय-समय पर मेरे द्वारा स्कूलों का निरीक्षण भी किया जाता है। फिर भी अगर कहीं कोई कमी है, तो उसे ठीक किया जाएगा।अखिलेश सिंह, बीएसएबोली छात्राएं और अभिभावकजिले के स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालयों की खराब स्थिति ने न सिर्फ उनकी दिनचर्या को प्रभावित किया है, बल्कि उनकी शिक्षा पर भी गंभीर असर डाला है। जिम्मेदार अधिकारियों को इस पर ध्यान देना चाहिए।रामकली, अभिभावककई स्कूलों के शौचालय इतने गंदे रहते हैं कि वहां जाना मुश्किल होता है। लेकिन हमारे स्कूल में ऐसी कोई दिक्तत नही हैं। यहां शौचालय से लेकर सभी सुविधाएं हैं।क्रांति,सरकारी स्कूलों के शौचालयों की हालत ठीक नही हैं। हम अपनी बेटी को पढ़ने भेजते हैं, लेकिन वहां बुनियादी सुविधा तक नहीं है। यह बहुत चिंता की बात है।सचिन, अभिभावकहमारे हसनापुर के स्कूल में सभी व्यवस्थाएं दुरूस्त हैं। शौचालय साफ सुथरे हैं। साबुन भी रहता है। अगर कहीं कोई परेशानी होती है, तो शिक्षक उस पर तुरंत धयान देते हैं।लक्ष्मी, छात्राबेटियों की शिक्षा को लेकर सरकार तमाम दावे करती है। लेकिन स्कूलों की हालत देखकर डर लगता है। बेटियां सुरक्षित माहौल में पढ़ें, यह जरूरी है।रामपाल, अभिभावकसुनने में आता है कि कई स्कूलों में छात्राओं के शौचालयों में ताला पड़ा रहता है। इससे स्कूल जाने वाली छात्राओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।सोनम, छात्रासरकारी स्कूलों में शौचालय आदि की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से दुरूस्त की जानी चाहिए। इससे बच्चियों की सेहत और पढ़ाई दोनों प्रभावित हो रही हैं, लेकिन कोई ध्यान नहीं दे रहा।अंकित, अभिभावकहमारे आस-पास के कई स्कूल ऐसे हैं, जहां के शौचालयों की हालत बहुत ही खराब है। शौचालय में बहुत बदबू आती है, इसलिए वहां पढ़ने वाली छात्राएं जाने से बचती हैं।वंशिकाकंपोजिट विद्यालय देवकलिया में शौचालय बदहाल हालत में हैं। हम लोगों ने कई बार इसे लेकर स्कूल प्रशासन से शिकायत की। लेकिन कोई ध्यान नही देता है।राजू, अभिभावकहमारे हसनापुर के स्कूल का शौचालय काफी साफ सुथरा है। इसके अलावा हांथ धोने के लिए पानी और हैंडवॉश की भी व्यवस्था है। सभी स्कूलों में इसी तरह के इंतजाम होने चाहिए।निधि वर्मा, छात्रादेवकलिया स्कूल के शौचालय की हालत बहुत ही खराब है। अगर यही हाल रहा तो बच्चियां पढ़ाई छोड़ देंगी। यह बहुत गंभीर समस्या है। जिम्मेदार अधिकारियों को इस पर ध्यान देना हिए।मनोहर लाल, अभिभावकबेटियों की शिक्षा को लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन कई स्कूलों में जिम्मेदारों की अनदेखी की वजह से स्कूल में पढ़ने वाली छात्राओं को बुनियादी सुविधाएं तक नही मिल पाती हैं।शीतल, छात्रासरकारी स्कूलों में शौचालयों की खराब स्थिति केवल एक सुविधा की कमी नहीं, बल्कि यह छात्राओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुकी है।शिवरानी, अभिभावकशहर के गांधीनगर स्कूल के शौचालय की हालत ये है, कि यहां शौचालय की व्यवसथाओं के अभाव में छात्राएं कम ही स्कूल आती हैं। जबकि इस स्कूल के बगल में ही विभग के एक अधिकारी का उफ्तरीाी है।अंकुर, अभिभावक
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