बोले सीतापुर : कलाकारों को एक ऑडिटोरियम तक नहीं दे पा रहे हैं जिम्मेदार
Sitapur News - सीतापुर जिले में सांस्कृतिक गतिविधियों का संकट गहरा गया है। रंगमंच, नृत्य और गायन के कलाकारों को उचित मंच और सरकारी सहायता नहीं मिल रही है। स्थानीय कलाकार अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करने के लिए संघर्ष...
सांस्कृतिक गतिविधियां किसी भी समाज का आईना होती हैं। ये न केवल समाज की परंपराओं, संस्कृतियों और भावनाओं को संजोती हैं बल्कि लोगों के मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास में भी अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन जब कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने का मंच न मिले, तो धीरे-धीरे सांस्कृतिक गतिविधियां दम तोड़ने लगती हैं। सीतापुर जिले में यही स्थिति देखने को मिल रही है। कभी रंगमंच, नृत्य और गायन की परंपरा में अपनी पहचान रखने वाला सीतापुर जिला आज मंच और सुविधाओं के अभाव में सांस्कृतिक गतिविधियों से लगभग वंचित हो गया है। हालत ये है कि गग्रामीण इलाकों की बात तो छोड़िए शहर में इन विधाओं से जुड़ी प्रतिभाओं के लिए नियमित अभ्यास तक के लिए जगह नहीं है।
कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए न तो कोई मंच मिल रहा है और न ही सरकार की तरफ से कोई प्रोत्साहन या सुविधाएं। जिले में रंगमंच, नृत्य और गायन से जुड़े कलाकार इन विधाओं में अपना भविष्य नही देख रहे हैं। सांस्कृतिक गतिविधियां स्वस्थ समाज का एक अनिवार्य अंग हैं। लेकिन कलाकारों को उचित मंच न मिले तो धीरे-धीरे यह गतिविधियां खत्म होने लगती हैं। सीतापुर जिले में भी मंच और सुविधाओं के अभाव में रंगमंच की कला एक तरह से लुप्त हो चुकी है। आज रंगमंच के नाम पर गंवई गांवों के मेलों में ही कभी कभार रंगमंच सुड़े आयोजन देखने को मिल जाते हैं। वो भी फूहड़ता का लबादाओढ़ चुके है। मौजूदा समय में जिलें रंगमंच, नृत्य और गायन से कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने के लिए ना तो पर्याप्त अवसर हैं और ना ही कोई सरकारी सुविधाएं ही मिल रही हैं। वहीं तहसील स्तर पर तो इन कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने और निखारने के लिए किसी भी तरह की सरकारी सुविधाए मुहैया नहीं है। इसके अलावा जिले में सांस्कृतिक आयोजन के नाम पर सिर्फ एक नैमिष महोत्सव ही है। जिसमें भी स्थानीय कलाकारों के लिए अवसर ना के बराबर हैं। स्थानीय कलाकारों का कहना है कि जिले में जो आयोजन होते भी हैं, उन कार्यक्रम में बाहर के कलाकार अपनी प्रस्तुति देते हैं। शायद यही वजह है कि सीतापुर जिले में एक समय समृद्ध रहा रंगमंच आज अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। आज रंगमंच के नाम पर ग्रामीण मेलों में होने वाले फूहड़ और अश्लील आयोजनों को ही देखा जा सकता है, जो कला के मूल स्वरूप से बिल्कुल अलग हैं। ये आयोजन कला के नाम पर सिर्फ अश्लीलता परोसते हैं, और असली कला धीरे-धीरे हाशिये पर जा रही है। ऐसे में, जो कलाकार अपनी कला को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं, उनके पास अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए कोई जगह नहीं है। मौजूदा समय में जिले में केवल एक सरकारी प्रेक्षागृह है। शहर से सटे खैराबाद में बना ये प्रेक्षागृह इतना मंहगा है, कि स्थानीय कलाकारों के लिए इसका खर्च वहन करना काफी मुश्किल है। स्थानीय कलाकारों का कहना है कि सरकार को इसका शुल्का कम करना चाहिए। जिससे जिले के कलाकारों को इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके और स्थानीय कलाकारों को एक मंच मिल सके। कलाकारों का कहना है कि सरकार की उदासीनता ने इस समस्या को और भी गहरा कर दिया है। जिले में कला के विकास के लिए कोई सरकारी योजना या सुविधा नहीं है। जब तक कलाकारों को अपनी कला को प्रदर्शित करने के लिए सस्तेहर गीत मेरे लिए एक कहानी है, और मैं हर धुन के माध्यम से भावनाओं को जीवन देने का प्रयास करता हूँ। मेरे गानों में परंपरागत और आधुनिक संगीत का संगम देखने को मिलता है। यदि प्रैक्टिस आदि के लिए मुफ्त मंच नहीं मिलेंगे, तब तक हम अपनी कला को जीवित कैसे रखेंगे। इसके अलावा जिला स्तर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी घोर अभाव है। एक समय सीतापुर महोत्सव का आयोजन होता था, जो वर्ष 2009 के बाद से बंद हो गया है। यह महोत्सव स्थानीय कलाकारों के लिए अपनी प्रतिभा दिखाने का एक बड़ा अवसर था, लेकिन इसके बंद होने से यह अवसर भी समाप्त हो गया। सीतापुर में रंगमंच और अन्य कलाओं का यह संकट न केवल कलाकारों के लिए एक समस्या है, बल्कि यह जिले की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी एक बड़ा खतरा है। यदि जल्द ही इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो सीतापुर की समृद्ध कला और संस्कृति हमेशा के लिए लुप्त हो सकती है। युवाओं के प्रेरणास्रोत बने अश्वनी जिले में रंगमंच, नृत्स और गायन के क्षेत्र में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। किसी भी तरह की सरकारी और स्थानीय मदद या प्रेत्साहन के बाद भी कई युवाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। ऐसी ही एक प्रतिभा का नाम है अश्वनी निषाद। जिले की महोली तहसील के एक छोटे बड़ागांव से निकल कर गायन के क्षेत्र अपनी पहचान स्थापित की है। इनके संगीत के सफर की शुरूआत सीतापुर की गलियों से हुई है और आज इनकी बालीवुड में गूंज रही है। अश्वनी गाना गाने के साथ-साथ गीतकार और म्यूजिक कम्पोजर भी हैं। अब तक ये कई प्रतिष्ठित अवार्ड जीत चुके हैं। जिनमें बेस्ट लिरिसिस्ट अवॉर्ड, बेस्ट लिरिसिस्ट एवं कम्पोज़र अवॉर्ड 2025 और वायरल गीत बेवफा 2025 प्रमुख हैं। आज ये सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर भी काफी मशहूर हैं। एक संक्षिप्त बातचीत में इन्होंने बताया कि मेरी कोशिश हमेशा यही रहती है कि मेरे गीत और धुन लोगों के दिलों को छू सकें। अब तक मेरे कई गाने रिलीज हो चुके हैं, जो 150 से ज्यादा सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर उपलब्ध हैं। आज भी अगर स्थानीय कलाकारों को सरकारी प्रोत्साहन और उचित अवसर मिले, तो यहां के युवा भी रंगमंच, नृत्य और गायन के क्षेत्र में जिले का नाम रोशन कर सकते हैं। सही मायनों में आज अश्वनी जैसी प्रतिभाएं जिले युवाओं के लिए प्रेरणा हैं। कलाकारों की पीड़ा, नही मिल रही सरकारी मदद रंगमंच, नृत्य और गायन से जुड़े स्थानीय कलाकारों के लिए मौजूदा वक्त बेहद परेशान करने वाला है। आज जरूरत है कि जिले से लुप्त हो रही इन कलाओं को बचाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाए। स्थानीय कलाकार जिले में अपनी उपेक्षा को लेकर काफी परेशान हैं। उनका कहना है कि कम से कम जिला स्तर पर कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए सस्ते या मुफ्त सरकारी प्रेक्षागृह उपलब्ध कराए जाएं। कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का मौका नहीं मिलता जिले में सांस्कृतिक आयोजनों के नाम पर केवल एक नैमिष महोत्सव ही है। लेकिन यहां भी स्थानीय कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का मौका नहीं मिलता। कलाकारों कहना है कि इस महोत्सव में बाहर से आए कलाकार ही अपनी प्रस्तुतियां देते हैं, जिससे स्थानीय कलाकारों को अपनी कला को निखारने या प्रदर्शित करने का मंच कम मिल पाता है। कलाकारों ने निराशा व्यक्त करते हुए बताया कि नैमिष महोत्सव जिले का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन है, लेकिन इसमें अपनी कला का प्रदर्शन करने स्थानी कलाकों को अवसर नहीं मिल पाता है। जिसकी वजह से स्थानीय कलाकार सिर्फ दर्शक बनकर व्यवस्था को कोसते रहते हैं। जिले में भी रंगमंच, नृत्य और गायन से जुड़ी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। लेकिन यहां स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए पर्याप्त अवसर नहीं हैं। जिसकी वजह से ये तमाम प्रतिभाएं घरों की चाहरदीवारी में ही दम तोड़ रही हैं। इनका साफ तौर पर कहना है कि जिले के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों में स्थानीय प्रतिभाओं का इस्तेमाल करने के बजाय बाहरी कलाकारों को मौका दिया जाता है। शायद यही वजह है कि आज इन विधाओं से जुड़ी तमाम युवा प्रतिभाएं इसमें अपना कैरियर नही देख रही हैं। बयां किया दर्द यहां स्थानीय कलाकारों को मंच मिलना आसान नहीं है। इसी वजह से अनेक प्रतिभाएं ठोकरें खाते-खाते दम तोड़ देती हैं। यहां तक कि सरकारी आयोजनों पर भी मात्र कुछ लोगों का कब्जा है जिससे नई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलता है। - माही ठाकुर शहर में रंगमंच और नृत्य जैसी कलाओं से जुड़े कलाकारों अवसर और मंच नहीं मिल पाते हैं। सीतापुर का युवा मंच के लिए दौड़ कर दूसरे शहर जाता है। मंच और अवसरों की कमी की वजह से स्थानीय कलाकारों का पारंपरिक कलाओं से मोह भंग हो रहा है। - चियादि चौधरी हमारे सीतापुर में रंगमंच, नृत्य और गायन जैसे टैलेंट कोई कद्र नहीं है। खास कर यहां की साझा संस्कृति को पसंद करने वाले बहुत कम लोग हैं। इसके अलावा सरकारी प्रोत्साहन और सहायता के अभाव में लोकनृत्य जैसी कलाओं से युवाओं का रूझान कम हो रहा है। - रूद्र दीक्षित संगीत नाटक अकादमी लखनऊ ने दिया 30 दिवसीय ग्रीष्मकालीन संगीत कार्यशाला का मौका दिया था। लेकिन जिले में अभी भी संगीत के कार्यक्रम को लेकर सजगता की बहुत जरूरत है। हम लोगों के लिए सरकार द्वारा अन्य कोई योजना भी नहीं। - हसीन खान बोले जिम्मेदार स्थानीय कलाकारों की स्थिति से मैं भलीभांति अवगत हूं। सीतापुर का होने की नाते मैं भी चाहता हूं कि स्थानीय कलाकारों के लिए कुछ बेहतर हो सके। लेकिन इनके लिए स्थानीय निकाय या किसी जनप्रतिननिधि की तरफ से अगर प्रस्ताव आता है तो निश्चित रूप से कारवाही की जाएगी। गिरीश चन्द्र मिश्र, अध्य्क्ष राज्य कला अकादमी प्रस्तुति - अविनाश दीक्षित फोटो - रितिक सक्सेना
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