
वन विभाग की कार्रवाई से ग्रामीणों में भय, न्यायाधिकरण से राहत की उम्मीद-बेदखली पर रोक की अपील
Shamli News - शामली के गांवों में वन भूमि पर कथित अतिक्रमण को लेकर एनजीटी में कार्यवाही चल रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यह उनके अस्तित्व और आजीविका पर हमला है। उन्होंने मानवीय आधार पर पक्षकार बनने की मांग की है। एनजीटी में अगली सुनवाई 9 जनवरी को होगी।
शामली के आधा दर्जन गांवों में कथित वन भूमि अतिक्रमण को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में चल रही कार्यवाही अब एक संवेदनशील सामाजिक और मानवीय मुद्दे का रूप लेती जा रही है। इस मामले में जहां एक ओर वन विभाग द्वारा वन भूमि संरक्षण के उद्देश्य से सर्वे, सीमांकन, नोटिस जारी करने और बेदखली की प्रक्रिया शुरू की गई है, वहीं दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीणों ने इसे अपने अस्तित्व, आवास और आजीविका पर सीधा हमला बताया है। बरनावी के नौ लोगो ने अपने वकील के माध्यम से शपथपत्र दाखिल करते हुए मानवीय आधार पर पक्षकार बनाने की मांग की है।न्यायाधिकरण
मे अलगी सुनवाई नौ जनवरी को होगी। एनजीटी में लंबित वन विभाग की भूमि पर चले आ रहे अतिक्रमण के मामले मे शामली जिले के बरनावी,अकबरपुर सुनहैटी,बीबीपुर हटिया,दभेडी बुजुर्ग, बीबीपुर जलालाबाद,पावटी खुर्द व रतौंद गांव में वन भूमि पर अतिक्रमण किया गया है। जिसको लेकर न्यायाधिकरण मे पॉच जनवरी को सुनवाई होनी थी। लेकिन किन्ही कारणो के चलते सुनवाई नहीं हो सकी। वहीं, दूसरी ओर लम्बित मामले में वन विभाग की कार्यवाही के खिलाफ बरनावी के मैनपाल, पुत्र श्री सहराम, मामचंद, पुत्र श्री परकाशा,राजू, पुत्र श्री प्रकाश, रिंकू, पत्नी श्री विनोद, नफेदीन, पुत्र श्री अलीजान, मनवर, पुत्र श्री सिन्ना, अफसर, पुत्र श्री आलमदीन, सजलौन, पुत्र श्री मुंशी, मेहराज, पुत्र श्री हकीमू, ने अपने वकील के माध्यम से पक्षकार होने का शपथपत्र दाखिल किया।जिसमे बताया गया कि वन विभाग, ने मौके पर कार्रवाई तेज कर दी है। विभाग द्वारा भूमि का सीमांकन, कथित अतिक्रमण की पहचान और कई ग्रामीणों को बेदखली व ध्वस्तीकरण के नोटिस जारी किए गए हैं। शपथपत्र मे कहा गया कि वे कोई हालिया या व्यावसायिक अतिक्रमणकर्ता नहीं हैं, बल्कि दशकों से अपने पुश्तैनी और एकमात्र आवासीय मकानों में रह रहे हैं। प्रभावित पक्षकारों ने एनजीटी में हस्तक्षेप याचिका दायर कर कहा है कि उनके घरों को बिना सुने ही अतिक्रमण बताकर हटाने की तैयारी की जा रही है, जो प्राकृतिक न्याय और संविधान के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें न तो एनजीटी में चल रही कार्यवाही की कोई पूर्व जानकारी दी गई और न ही किसी सार्वजनिक सूचना, ग्राम सभा बैठक या व्यक्तिगत नोटिस के माध्यम से यह बताया गया कि उनके घर इस मामले में प्रभावित हो सकते हैं। कई आवेदकों को पहली बार इस कार्यवाही की जानकारी तब हुई जब वन विभाग के अधिकारियों ने उनके घरों पर अतिक्रमण का नोटिस चस्पा किया। इससे ग्रामीणों में भय, असुरक्षा और असहायता का माहौल बन गया। आवेदकों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि लंबे समय से बसे मानव आवासों को बिना सुनवाई उजाड़ दिया जाए। उन्होंने दलील दी कि बेदखली और मकानों का ध्वस्तीकरण केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि इससे परिवारों का विस्थापन, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और आजीविका पर गहरा असर पड़ता है। एक बार घर टूट जाने के बाद कोई भी फैसला उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। सामुहिक अतिक्रमण का विरोध, शपथ पत्र दाखिल चौसाना। हस्तक्षेप याचिका में यह भी कहा गया है कि वन विभाग द्वारा सामूहिक रूप से पूरे क्षेत्र को अतिक्रमण मान लिया गया है, जबकि प्रत्येक परिवार की स्थिति अलग-अलग है। कानून के अनुसार किसी को अतिक्रमणकर्ता घोषित करने से पहले व्यक्ति-विशेष के स्तर पर जांच, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन आवश्यक है। ग्रामीणों ने एनजीटी से मांग की है कि जब तक उन्हें पूर्ण, प्रभावी और सार्थक सुनवाई का अवसर न दिया जाए, तब तक किसी भी प्रकार की बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगाई जाए। साथ ही उन्होंने यह भी आग्रह किया है कि वन विभाग से गांव-वार, खसरा-वार और व्यक्ति-वार विवरण तलब किया जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।यह मामला अब केवल वन भूमि संरक्षण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि पर्यावरण और मानवाधिकारों के संतुलन का प्रश्न बन गया है। एनजीटी में आने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि पर्यावरणीय उद्देश्यों को मानवीय गरिमा और न्याय के साथ कैसे साधा जाएगा।

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