बिटिया गई, खेती छूटी... अब मजदूरी की तैयारी
ककराकला गांव में 24 मई को एक कुत्ते के झुंड ने 11 वर्षीय लड़की सवालिया पर हमला किया, जिससे उसकी मौत हो गई। परिवार अब दहशत में जी रहा है और खेती करना भी मुश्किल हो गया है। नईम, उसके पिता, ने प्रशासन से मदद की गुहार लगाई है, लेकिन हालात नहीं बदले हैं।

जिस खेत से घर का चूल्हा जलता था, अब वहां जाने में जान निकलती है। बिटिया चली गई, अब खेती भी छूटने की नौबत आ गई है... ककराकला गांव निवासी नईम की आंखें यह कहते हुए भर आती हैं। बीते 24 मई को नदी किनारे खेत से लौट रही उनकी 11 वर्षीय बेटी सवालिया पर कुत्तों के झुंड ने हमला कर दिया था। गंभीर रूप से घायल बच्ची की बाद में मौत हो गई। घटना के दो हफ्ते बाद भी परिवार दहशत में जी रहा है। नईम बताते हैं कि घटना के बाद अफसर गांव पहुंचे थे। तत्कालीन सीओ सिटी पंकज पंत और एसडीएम संजय पांडेय ने मदद का भरोसा दिया था। राशन कार्ड भी बनवा दिया गया, लेकिन उसके बाद केवल 20 किलो चावल मिला। हमें कहा गया था कि हर महीने राशन मिलेगा, मदद होगी, लेकिन फिर कोई पूछने नहीं आया।
खेत में जाने में डर
नईम बटाई पर करीब दो बीघे जमीन लेकर खेती करते हैं। खेत में लौकी, तरोई और खीरा लगा है। यही खेती परिवार की आय का सहारा थी, लेकिन अब खेत तक पहुंचना भी मुश्किल हो गया है। उनका कहना है कि खेत जाने वाले रास्ते और आसपास करीब 50 कुत्तों का आतंक है। अकेला आदमी निकलता है तो कुत्ते दौड़ पड़ते हैं।
खेत जाने के लिए मदद की जरूरत
अब मैं अकेले खेत नहीं जा पाता। लड़के और मोहल्ले के दो-तीन लोगों को साथ लेकर जाना पड़ता है। कई लोग डर के कारण मना कर देते हैं। डंडे लेकर किसी तरह खेत तक पहुंचते हैं। रोज हमला होने का डर बना रहता है।
बच्चों को काम पर भेजने की चिंता
यही हालत रही तो बच्चों को भी बाहर भेजना पड़ेगा। बेटी को खोने का दर्द झेल रहा परिवार अब रोजी-रोटी के संकट से भी जूझ रहा है। नईम कहते हैं कि अगर यही हाल रहा तो खेती छोड़नी पड़ेगी। फसल लगी है, लेकिन जान बचाना जरूरी है। लगता है अब बाहर मजदूरी करने जाना पड़ेगा। बच्चों को भी काम पर भेजना पड़ेगा।
आर्थिक दबाव और शादी की चिंता
परिवार पर बढ़ रहा आर्थिक दबाव, शादी की भी चिंता। परिवार पर आर्थिक दबाव भी बढ़ता जा रहा है। नईम को दूसरी बेटी की शादी की चिंता सता रही है। वह कहते हैं कि पहले बिटिया चली गई, अब खेती भी हाथ से निकल रही है। समझ नहीं आ रहा आगे घर कैसे चलेगा, बेटी की शादी कैसे होगी। ऐसे में परदेस ही सहारा बनेगा।
प्रशासनिक हलचल और कुत्तों का आतंक
घटना के कुछ दिन बाद तक रही प्रशासनिक हलचल। मोहल्ले का कहना है कि घटना के बाद कुछ दिन प्रशासनिक हलचल रही, लेकिन अब हालात फिर पहले जैसे हो गए हैं। मोहल्ले के लोग आज भी कुत्तों के डर में जी रहे हैं। खेत, नदी किनारा और रास्ते असुरक्षित बने हुए हैं। नगर निगम की टीम अब यहां आती भी नहीं।
लोगों की सुरक्षा का सवाल
-बोले मोहल्ले के लोग- घटना के बाद एक दिन अभियान चला, लेकिन फिर सब बंद हो गया। कुत्तों का आतंक जस का तस बना है। खेतों तक जाने में डर लगता है। प्रशासन को चाहिए कि इन कुत्तों को जल्द पकड़वाकर कहीं दूर भिजवाए, ताकि लोग सुरक्षित तरीके से काम पर जा सकें और परिवार चला सकें।
फोटो : 04 माशूक अली
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इतनी बड़ी घटना के 10 दिन से अधिक होने के बाद भी नदी किनारे कुत्तों का आतंक खत्म नहीं हुआ। कई परिवारों की रोजी-रोटी खेतों से चलती है, लेकिन लोग डर में काम करने जा रहे हैं। बच्चे तक साथ नहीं ले जाते। प्रशासन जल्द कुत्तों को पकड़वाकर वहां से हटवाए, तभी लोगों को राहत मिलेगी।
फोटो : 03, नसीम
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