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रामगंगा नदी के कारण बर्बादी की कगार पर तमाम गांव

रामगंगा नदी के कारण बर्बादी की कगार पर तमाम गांव

प्रशासन व नेताओं के ढुलमुल रवैये के कारण कटरी क्षेत्र के तमाम गांवों के बाशिन्दे बाढ़ व कटान की विभीषिका प्रति बर्ष झेलने को मजबूर हो रहे हैं। गंगा, रामगंगा व बहगुल नदी में आने वाली बाढ़ से हर साल क्षेत्र में भारी बर्बादी होती है। हजारों बीघा फसलें नष्ट हो जाती हैं। सैकडा़ेंं घर ढह जाते हैं। हजारों लोग बेघर हो जाते हैं। बाढ़ के पानी में डूबने से कई मौतें भी हो जाती है। कटरी के लोगों का विकास ठप हो जाता है। बाढ़ के दौरान लोगों को इधर उधर पलायन भी करने को मजबूर होना पड़ता है। अब ऐलान किया गया कि पांच जून से पहरूआं में तटबंध की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरना प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। रामगंगा नदी से कटान व बाढ़ कटरी क्षेत्र के मिर्जापुर विकास खण्ड को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। वैसे तो कटान का दंश क्षेत्रवासी दो दशक से झेल रहे हैं। विकास खण्ड का सबसे विकसित कीलापुर गाँव चार बार कटने के बाद खुर्द बुर्द हो गया है। रामगंगा ने इस विकास खण्ड में तबाही मचा कर रख दी है। कुनिया, पहरूआ, मौजमपुर, हरिहरपुर, मईखुर्दकलां में सैकड़ों मकान अपने में समा लेने के बाद भी रामगंगा की लहरे शांत नहीं हो रही है। रामगंगा की लहरों ने कुनिया स्थित जूनियर हाईस्कूल, सामुदायिक केन्द्र, हरिहरपुर प्राथमिक स्कूल को भी नहीं बख्सा और उनका अस्तित्व समाप्त कर दिया। रामगंगा की लहरें क्षेत्र के कुनिया, मौजमपुर, हरिहरपुर, अतरी निजामपुर, सोहड़, गहवरा, दहेलिया, कुड़रिया, पहरूआ, भरतापुर, पहाड़पुर, मड़ैया आदि गाँवों से सट कर निकल रही है। सैकड़ों हैक्टेएर भूमि लील लेने के बाद रामगंगा इन गाँवो के आस्तित्व को मिटाने पर तुली है। रामगंगा के कटान से 2008 में कुड़रिया गाँव के अस्तित्व को खतरा पैदा हुआ था। नहर विभाग द्वारा तत्काल गाँव में रेत की बोरियों से अस्थाई ठोकरों का निर्माण कराया गया था। उस वर्ष गाँव तो तबाह होने से बच गया, लेकिन ठोकरें रामगंगा की लहरों को नहीं झेल पाई और लाखों रूपया पानी में बह गया। उसके बाद से बर्बादी का सिलसिला शुरू हुआ। 2009 में रामगंगा ने भरतापुर से अपनी धारा को मोड़ दिया और सीधी कुनिया से जा टकराई। कुनिया, पहरूआ व मौजमपुर के सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया। बर्बादी की आहट मिलते ही तटवर्ती गाँवों के सैकड़ों लोग भाकियु के बैनर तले जिला मुख्यालय पर दिसम्बर 2009 में तटबन्ध की माँग को लेकर धरना प्रदर्शन को बैठ गए। एक पखवाड़े तक चले धरने के बाद जिलाधिकारी द्वारा तटबन्ध निर्माण को जल प्रबन्धन व नहर विभाग की संयुक्त टीम से सर्वे कराया गया, जो अभी तक लंबित है। 2010 में बाढ़ ने पूरे विकास खण्ड में तबाही मचा दी। ब्लाक का कोई गाँव नहीं बचा जो बाढ़ से अछूता रहा हो। प्रशासन के ढुलमुल रवैये से आहत ग्रामीण तटबन्ध की माँग को लेकर ब्लाक मुख्यालय पर धरने पर बैठ गए। चार दिन तक चले अनशन के बाद डीएम ने मौके पर जाकर अनशनकारियों से बात कर दुबारा सर्वे कराने का आश्वासन दिया। सर्वे कार्य दुबारा हुआ लेकिन पत्रावती आज भी शासन के पास लंबित है। कुनिया, पहरूआ, मौजमपुर, हरिहरपुर, अटा व कस्बा मिर्जापुर को बचाने के लिए शासन स्तर से ज्यादा मदद की जरूरत नहीं है, क्योंकि रामगंगा इस समय सर्पाकार आकार में बह रही है। नदी के इस विनाशकारी रूख को मोड़ने के लिए बचाव का एक मात्र साधन पहाड़पुर के समीप कुनिया की तरफ आने वाली धारा को रोकने के लिए पत्थर की ठोकर के साथ ही कोलाघाट पुल तक तटबन्ध बना दिया जाए और पहाड़पुर से कोलाघाट के बीच करीब एक किलोमीटर के नदी के पुराने बहाब के स्थान की खुदाई कराकर सीधा कर दिया जाए तो न केवल पहाड़पुर, कुनिया, बहरिया, हरिहरपुर, पहरूआ, मौजमपुर समेत दर्जनों गाँव सहित मुरादाबाद स्टेट हाइवे को बचाया जा सकता है। जिसके लिए 2009 में सिंचाई विभाग द्वारा सर्वे कराया जा चुका है जिसमें चार करोड़ का का प्रस्ताव शासन के पास भेजा गया था, जो आज तक लंबित है। यदि उस समय इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया गया होता तो इस क्षेत्र की दुर्गति नहीं होती। तटबंध संघर्ष समिति के सचिव सुरेश चन्द्र शर्मा ने बताया कि सांसद कृष्णाराज द्वारा पहरूआ मे बोरियां लगवाकर नदी की धारा मोड़ने के आदेश के बाद सिंचाई विभाग ने हजारो बोरिया भरवाई। लेकिन प्रदेश में सपा सरकार के कुछ नेताओं की राजनीति के चलते बोरिया नदी में नहीं लग सकी। तब सांसद ने कहा था कि प्रदेश में भाजपा सरकार बनने पर प्राथमिकता के आधार पर तबाही रोकने के प्रयास होंगे। ग्रामीणों ने कहा है सांसद अपना वादा पूरा करे। इस बारे में ग्रामीणों ने किसान युनियन के तहसील अध्यक्ष उदयवीर सिंह यादव ने पहरूआ में पंचायत कर तटवर्ती गांवों को तबाही से बचाने के प्रयास पर रणनीति तय की।

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  • Web Title:ramganga can be destructive to villagers