Pests and diseases threaten crops with moisture increase - आर्द्रता बढ़ने के साथ फसलों को कीट व रोगों से खतरा DA Image

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आर्द्रता बढ़ने के साथ फसलों को कीट व रोगों से खतरा

आर्द्रता बढ़ने के साथ फसलों को कीट व रोगों से खतरा

वातावरण में आर्द्रता बढ़ने के साथ फसलों में हानिकारक कीट व रोग लगने की संभावनाएं भी बढ़ गई है। जिससे किसानों की फसलों पर खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में फसलों का प्रबंधन जरूरी हो गया है।

जिला कृषि रक्षा अधिकारी शिवशंकर के मुताबिक वर्तमान समय में धान की फसल में मुख्यत: गन्धी बग, भूरा फुदका, तना टेदक, सैनिक कीट तथा खैरा रोग का प्रकोप निम्न स्तर पर दिखाई देता है। गन्धी बग, इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ पीले रंग के होते हैं तथा दोनों ही बालियों की दुग्धावस्था में दानों से रस चूस लेते हैं जिसके फलस्वरूप बालियों में दानें नहीं बनते हैं। इस कीट से बचाव के लिए उन्होंने प्रबंधन करने की सलाह दी है।

प्रबन्धन- (अ) किसान भाई खेतों को खरपतवार मुक्त रखें तथा मेडों को साफ रखें। (ब) कीट के प्रकोप की दशा में एजाडिरैक्टिन 0़15 प्रतिशत ईसी 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। इसके अलावा मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल की 20-25 किग्रा-मात्रा का प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव कर सकते हैं।

यह रोग व कीट भी खतरनाक, करें प्रबंधन

भूरा फुदका कीट - इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पौधों के किल्लों के बीच रहकर तने के निचले भाग और पत्ती आवरण के रस चूसते रहते हैं। जरूरत से अधिक चूसा हुआ रस निकलने के कारण पत्तियों पर काला कंचुल उग आता है। जो प्रकाश संश्लेषण से बाधक होता है। जिस कारण पौधे छोटे रह जाते हैं, इसे हापर बर्न कहते हैं। बाद में प्रकोप अधिक होने पर पौधे गिर जाते हैं तथा धान में दाने नहीं बनते हैं।

प्रबन्धन- कीट के प्रकोप की दशा में एजाडिरैक्टिन 0़15 प्रतिशत ईसी 2़5 लीटर या इमिडाक्लोप्रिड 17़ 8 प्रतिशत ईसी 125 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें। विप्रोदेंजिन 25 प्रतिशत एससी की 1़ 25 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

तना बेधक - इस कीट की सूडियां ही हानिकारक होती है। पूरी तरह से विकसित सूंडी हल्के पीले शरीर वाली नारंगी-पीले सिर वाली होती है। मादा पतंगा के पंख पीले होते हैं। इसके आक्रमण के फलस्वरूप फसल की वानस्पतिक अवस्था में मृत गोभ तथा बाद में प्रकोप होने पर सफेद बाली बनती है।

प्रबन्धन- इस कीट के नियंत्रण के लिए कारटाप हाइड्रोक्लोराइड 4 प्रतिशत दानेदार रसायन का 17-18 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग विशेष लाभकारी है। जो एक सुरक्षित रसायन भी है। (ब) इस कीट की सूड़ियों के नियंत्रण के लिए 1़ 5 लीटर नीम आयल प्रति हेक्टेयर ही दर से 800 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें।

सैनिक कीट- इस कीट की सूड़ियां ही हानिकारक होती हैं। ये सूडियां दिन में किल्लों, दरारों में छिपी रहती हैं। शुरूआत में यह पत्तियों को खाती हैं, लेकिन धान के पकने के समय शाम को पौधों पर चढ़कर बालों से 2-3 या कई धान वाले टुकड़े काटकर जमीन पर गिरा देती हैं।

प्रबन्धन- कीट के प्रकोप की दशा में फेनवेलरेट 0़ 04 प्रतिशत धूल या मैलाथियान 5 प्रतिशत धूल 20-25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से शाम को बुरकाव करें।

खैरा रोग- यह रोग जस्ते की कमी के कारण होता है। इसमें पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, जिसमें बाद में कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।

प्रबन्धन- फसल पर 5 किग्रा जिंक सल्फेट का 10 किग्रा यूरिया या 2़ 5 किग्रा बुझे हुए चूने को 800 लीटर पानी के साथ मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें।

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