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8 अप्रैल, 2020|8:40|IST

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अंग्रेजों के जमाने से शाहजहांपुर में निकलता है लाट साहब का जुलूस

lot of sahab procession in shahjahanpur since british era

शाहजहांपुर में होली पर निकलने वाले लाट साहब के जुलूस की चर्चा दूर-दूर तक हमेशा होती रही है। इस जुलूस का पिछले साल शाहजहांपुर के नवादा दरोबस्त आने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अपने भाषण में उल्लेख किया था। शाहजहांपुर के लॉट साहब के जुलूस की शुरुआत अंग्रेजों के शासन काल से शुरू हुई थी। तब गधे पर लाट साहब को बैठाकर रंग खेलते हुए शहर में घुमाया जाता था, फिर उन्हें हाथी पर बैठाकर घुमाए जाने लगा। अब लाट साहब को भैंसा गाड़ी पर बैठा कर शहर का चक्कर लगवाया जाता है।  

लाट साहब की कुर्सी पर बैठने वाले की कई दिन पहले से खातिरदारी की जाती है, उन्हें होली के जुलूस के बाद बड़ी रकम, कपड़े और मिठाइयां उपहार स्वरूप दी जाती हैं। शाहजहांपुर का लाट साहब का जुलूस बेहद संवेदनशील माना जाता है, इस कारण कुछ धार्मिक स्थलों को तिरपालों से ढक दिया जाता है। गलियों में बैरिकेडिंग कर दी जाती है। बड़ी संख्या में फोर्स बाहर से बुलाया जाता है, तब कहीं जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हो पाता है। शाहजहांपुर में होली का जुलूस जिला प्रशासन और पुलिस की यह सबसे बड़ी परीक्षा होती है।

नवाब की वापसी पर पहली बार निकाला गया था जुलूस

शाहजहांपुर में सवारी लाट साहब का जुलूस ब्रिटिश काल से हुई थी, ऐसा जानकारों का कहना है। वह बताते हैं कि शहर के नवाब के खिलाफ विद्रोह की साजिश रची गई थी, तब नवाब को कुछ समय के लिए शाहजहांपुर छोड़ना पड़ा था। इसके बाद जब सबकुछ ठीक हो गया, नवाब वापस आए तब लोगों ने खुशियां मनाईं। तब नवाब साहब बैलगाड़ियों में पकवान, मिठाइयां लेकर शहर में निकले थे, सभी को पकवान और मिठाइयां बांटी गईं थीं।इसके बाद नवाब समर्थकों ने धीरे-धीरे जुलूस की परंपरा ही डाल दी।

बाद में गधे पर लाट साहब बना कर एक व्यक्ति को बैठा कर पूरे शहर में जुलूस की शक्ल में घुमाया जाने लगा। लाट साहब को गधे पर बैठाने के पीछे नवाब समर्थकों का अपने गुस्से को इजहार करना बताया जाता है, क्योंकि नवाब के खिलाफ विद्रोह हुआ था, इसलिए गुस्से का इजहार करने के लिए हर साल जुलूस निकाला जाने लगा। 

अंग्रेजों ने जुलूस पर लगा दी थी पाबंदी

एक व्यक्ति को गधे पर बैठाकर जुलूस निकालने की परंपरा को अंग्रेजों ने काफी खराब माना था, उन्होंने जुलूस पर पाबंदी लगा दी थी। कुछ दिनों तक जुलूस नहीं निकाला गया, लेकिन उसके बाद फिर से लाॅट साहब की सवारी निकलना शुरू हो गई। फिर यह जुलूस होली पर निकाला जाने लगा। नवाब के समर्थकों के बाद यह जुलूस होली पर निकाले जाने की परंपरा बन गई। शाहजहांपुर में होली के दिन छोटे लाॅट साहब का भी जुलूस निकलता है। जुलूस सराइकाइयां, रेती इलाके से होकर गुजरता है। शाहजहांपुर के प्रतिष्ठित समाजसेवी अपनी जिम्मेदारी को निभा कर जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न कराते हैं।

कोतवाली में इंस्पेक्टर देता है लॉट साहब को सलामी

शाहजहांपुर के चौक स्थित फूलमती मंदिर से लाॅट साहब के जुलूस का शुभारंभ होता है। बैलगाड़ी पर लाॅट साहब को बैठाकर चौक कोतवाली ले जाया जाता है, जहां पर कोतवाल लाॅट साहब को सलामी अौर उपहार देते हैं। इसके बाद कच्चा कटरा, इस्लामियां कालेज, सदर बाजार होते हुए बाबा विश्वनाथ मंदिर यह जुलूस पहुंचता है, जहां पर देव प्रतिमाओं के सामने लाॅट साहब माथा टेकते हैं, फिर यह जुलूस पंखी होटल, सदर चौराहा, घंटाघर, कच्चा कटरा, बंगला सिरोदी होते हुए समाप्त हो जाता है।

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