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27 अक्तूबर, 2020|9:13|IST

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करकौर के चौबारों में आज भी हैं1992 के आंदोलन की यादें

करकौर के चौबारों में आज भी हैं1992 के आंदोलन की यादें

1 / 2उस दिन जब अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराया गया था, तब शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर ब्लाक के गांव करकौर गांव के भी दो लोग कारसेवा करने पहुंचे...

करकौर के चौबारों में आज भी हैं1992 के आंदोलन की यादें

2 / 2उस दिन जब अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराया गया था, तब शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर ब्लाक के गांव करकौर गांव के भी दो लोग कारसेवा करने पहुंचे...

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उस दिन जब अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा गिराया गया था, तब शाहजहांपुर जिले के जैतीपुर ब्लाक के गांव करकौर गांव के भी दो लोग कारसेवा करने पहुंचे थे। दोनों लोग बचते बचाते अयोध्या पहुंचे थे, उनमें एक बेचेलाल गुर्जर और दूसरे पेशकार गुर्जर थे। जिन्होंने वहां सब कुछ अपनी आंखों से देखा था।बेचेलाल बताते हैं कि 6 दिसंबर 1992 को भीषण ठंडक थी, लेकिन राम मंदिर आंदोलन बहुत गर्म था। किसी के पास साल थी, कोई कोट पहने था, कोई बिना चप्पल ही ढांचे की ओर बढ़ा जा रहा था। लोगों के जोश के आगे ठंड बेअसर थी। सभी लोग जयश्रीराम का नाम लेकर ढांचे की ओर बढ़ते चले जा रहे थे। फिर पेशकार और बेचेलाल ने उस विवादित ढांचे की गुंबद के ऊपर कुछ लोगों को चढ़ते हुए देखा, कुछ देर के लिए दोनों दोस्त रुक गए। पेशकार बताने लगे कि उनकी आंखों के सामने ही पूरा ढांचा गिराया गया, हर ओर जयश्रीराम के नारों की गूंज हो उठी। लोग ढांचा गिरने के बाद तेजी से लौटने लगे, उस वक्त बेचेलाल और पेशकार एक दूसरे का हाथ पकड़कर ढांचे की ओर बढ़े । अब आंदोलन में दिए गए योगदान पर गर्व होता है, क्योंकि राम मंदिर निर्माण शुरू हो चुका है। बताया कि इस दौरान उन्होंने किसी नेता को तो नहीं देखा था, लेकिन राम भक्तों को देखा था, जिन्होंने एक आंदोलन का रूप ले रखा था। बेचेलाल कहते हैं कि उस समय लोगों के अंदर इतना जोश था कि बड़े बड़े से बड़ा तूफान भी आ जाता तो वह भी हार जाता। अगस्त में जब राम मंदिर निर्माण शुरू हुआ उसके बाद से आज तक बेचेलाल और पेशकार गुर्जर को गांव में जगह-जगह लोग रोककर अयोध्या के उन किस्सों के बारे में पूछते हैं। कभी कहानी के अंदाज में, कभी किस्सों के अंदाज में, दोनों बुजुर्ग अयोध्या के 1992 के आंदोलन कथा सुनाते हैं।

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  • Web Title:Karkour 39 s Chaubars still have memories of 1992 movement