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सपा का वोट तो भाजपा ले उड़ी, बसपा हाथ मलती रह गई

सपा का वोट तो भाजपा ले उड़ी, बसपा हाथ मलती रह गई

2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा और सपा के अलग-अलग प्रत्याशी मैदान में थे। दोनों ही हार गए थे। पर दोनों के वोट जोड़े जाते तो वह भाजपा को हरा रहे थे। इसी आधार पर अखिलेश और मायावती ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन किया।

माना तो यही गया कि दोनों के वोटर गठबंधन प्रत्याशी को वोट देंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। शाहजहांपुर की सीट बसपा के खाते में गई, उनका प्रत्याशी मैदान में आया। सपा पदाधिकारियों ने सपोर्ट किया, लेकिन सपा का वोट बसपा को मिल नहीं पाया। सपा का वोट तो भाजपा ले उड़ी। तभी तो बसपा हाथ मलती रह गई। जीत का सेहरा भाजपा प्रत्याशी के सिर पर आ गया, सपा देखती रह गई।

बात 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम की पहले कर ली जाए। भाजपा की कृष्णाराज को अकेले 5 लाख 25 हजार 132 वोट मिले थे। बसपा के उम्मेद सिंह को 2 लाख 89 हजार 603 वोट मिले थे। सपा के मिथलेश कुमार को 2 लाख 42 हजार 913 वोट हासिल हुए थे। सपा और बसपा के वोट जोड़ लिए जाते तो वह 5 लाख 32 हजार 516 होता है। पर इस बार तो गठबंधन प्रत्याशी अमर चंद्र जौहर को उससे भी एक लाख से करीब दो हजार वोट कम मिले। अमर चंद्र जौहर को इस बार मिले 4 लाख 20 हजार 572 वोट। हुआ यह कि सपा का वोट तो भाजपा में गया ही, बसपा भी अपना वोट भाजपा में जाने से बचा नहीं पाई

मुस्लिम वोटर उत्साहहीन था, बसपा पर भरोसा न था

समाजवादी पार्टी प्रत्याशी को 2014 में दो लाख 42 हजार 913 वोट मिले थे। इस बार सपा का प्रत्याशी तो मैदान में था नहीं, माना तो यही जा रहा था कि सपा का वोटर बसपा प्रत्याशी को वोट करेगा। पर ऐसा कम हुआ। सबसे पहले बात करते हैं मुस्लिम वोटरों की। पहली बाद तो यह थी कि मुस्लिमों यह आशंका थी कि अगर बसपा जीत जाती है तो वह बाद में गठबंधन तोड़ कर भाजपा को सीटें कम पड़ने पर समर्थन दे सकती है। इसलिए मुस्लिमों पहला उत्साह तो इसी बात पर कम हो गया था। दूसरा मुस्लिम अब सपा का परंपरागत वोटर माना जाता है, सपा का प्रत्याशी तो नहीं, इसलिए मतदान के दिन मुस्लिम घर से भी बहुत कम निकले। यानी मुस्लिम इलाकों में मतदान प्रतिशत में कमी भी आई।

यादव वोटरों को रास नहीं आया बसपा से हाथ मिलाना

समाजवादी पार्टी के मुखिया ने बसपा से तो गठबंधन कर लिया, लेकिन सपा के परंपरागत वोटर माने जाने वाले यादव समाज को यह सब रास नहीं आया। वह अभी भी मुलायम सिंह को ही अपना नेता मानते हैं। पर मुलायम सिंह यादव की पार्टी में जो स्थिति है, उससे वह बहुत खुश नहीं हैं। फिर जब बसपा से गठबंधन हुआ तो सपा के परंपरागत वोटर भी उत्साह नहीं रहा। उनके अंदर भी अविश्वास पनप गया था। यादव वोटरों का भी मानना था कि अखिलेश यादव ने बड़ी गलती कर दी है, उन्हें बसपा से हाथ नहीं मिलाना चाहिए था। रैलियों में बसपा सुप्रीमों को मिल रही तवज्जो, खुद अखिलेश का रैलियों के मंच पर सिकुड़ा बैठना यह सब देखा जा रहा था। इसलिए यादव वोटरों ने अपना ज्यादा रुख बसपा की ओर नहीं किया। बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा को मिला है।

विधान सभावार सपा की स्थिति पर

ददरौल में सपा का लोध वोट ऐसे गया भाजपा में

2017 में ददरौल में सपा के राममूर्ति वर्मा विधानसभा चुनाव में महज 17 हजार 398 वोट से हारे थे। राममूर्ति वर्मा को 69 हजार 37 वोट मिले थे। इस लिहाज से देखा जाए तो 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी सपा और बसपा मिलाकर 70 हजार 173 वोट मिले। बसपा प्रत्याशी को 50 हजार से अधिक वोट मिला था। यहां आंकड़ों पर गौर करें तो सपा का करीब 50 हजार से ज्यादा वोट भाजपा में चला गया। यहां मौजूदा विधायक मानवेंद्र सिंह और भाजपा की मदद में आए पूर्व मंत्री अवधेश वर्मा की मेहनत दिखी। भाजपा को ददरौल विधानसभा क्षेत्र से 52 हजार 883 वोटों से जीत हासिल हुआ।

जलालाबाद में सपा का खिसका करीब 48 हजार वोट

2017 में जलालाबाद में भी सपा के विधानसभा चुनाव में शरदवीर सिंह को 75 हजार 326 वोट मिले थे। वह 9 हजार 297 वोट से जीते थे। बसपा के नीरज मौर्या को 58 हजार 337 वोट मिले थे। इस लिहाज से इस बार गठबंधन को जलालाबाद से कुल सवा लाख के आसपास वोट मिलने चाहिए थे। पर लोकसभा चुनाव में गठबंधन को जलालाबाद से उतने भी वोट नहीं मिले, जितने सपा विधायक को अकेले मिले थे। लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को जलालाबाद से महज 65 हजार 531 मिले। यहां से सपा का करीब 48 हजार वोट खिसक कर भाजपा के पास पहुंच गया।

शाहजहांपुर में ही सपा की लाज बच सकी

2017 में शाहजहांपुर में विधानसभा चुनाव में सपा को कुल 81 हजार 531 वोट मिले थे। सपा यहां 19 हजार 208 वोट से हारी थी। बसपा को तब 16 हजार 546 वोट मिले थे। अब 2019 के लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को सपा का ही वोट ट्रांसफर हुआ। गठबंधन प्रत्याशी को 80 हजार 462 वोट शाहजहांपुर सीट पर हासिल हुए। यहां बसपा हमेशा से कमजोर रही। यही एक ऐसी विधानसभा रही है, जहां पर सपा के परंपरागत वोटर ने बसपा को वोट दिया है। शाहजहांपुर सीट पर गठबंधन प्रत्याशी की हार का आंकड़ा बेहद कम 17 हजार 682 वोट रहा है।

पुवायां में सपा का 15 हजार वोट भाजपा के खाते में गया

2017 में पुवायां विधानसभा सीट पर सपा को 54 हजार 218 वोट मिले थे। सपा यहां 72 हजार 417 वोट से हारी थी। बसपा को विधानसभा चुनाव में 38 हजार 797 वोट मिले थे। इस बार लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को पुवायां में सपा का करीब 20 हजार वोट ही मिल सका है। यहां गठबंधन प्रत्याशी को कुल 60 हजार 522 वोट मिल सका है। भाजपा यहां पहले से स्ट्रांग थी उसे विधानसभा चुनाव में 1 लाख 26 हजार वोट मिले थे। इस बार लोकसभा चुनाव में सपा का करीब 15 हजार वोट भाजपा के पास आ गया और लोकसभा के भाजपा प्रत्याशी को पुवायां क्षेत्र में 1 लाख 40 हजार 814 वोट मिले।

कटरा में बसपा का ही वोट भाजपा में चला गया

2017 के विधानसभा चुनाव में कटरा सीट पर सपा को 59 हजार 779 वोट मिले थे। सपा यहां भाजपा से 16 हजार 730 वोटों से हारी थी। बसपा को 47 हजार 471 वोट मिले थे। पर इस लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को महज 65 हजार 109 वोट मिले। यहां सपा का करीब 15 हजार वोट भाजपा में चला गया। कटरा क्षेत्र में भी गठबंधन प्रत्याशी नुकसान उठाना पड़ गया। यहां बसपा का अपना करीब 20 हजार से अधिक वोट भाजपा में चला गया, ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि कश्यप वोट पहले बसपा को मिलता था, पर इस बार यह वोट भाजपा में गया है।

तिलहर में सपा और बसपा का वोटर भाजपा में भागा

2017 के विधानसभा चुनाव में तिलहर सीट पर सपा और कांग्रेस का गठबंधन था। जितिन प्रसाद प्रत्याशी थे। बसपा का प्रत्याशी भी यहां खड़ा था। इस सीट पर कांग्रेस का कोई वजूद नहीं था, केवल जितिन प्रसाद का अपना प्रभाव और सपा के वोटर थे। जितिन का अपना प्रभाव घटा दिया जाए तो सपा को इस सीट पर विधानसभा चुनाव मेंं करीब 50 हजार वोट मिले थे। बसपा के प्रत्याशी को 31 हजार वोट मिले थे। उस लिहाज से देखा जाए तो इस बार लोकसभा चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी को 75 हजार से ज्यादा वोट मिले हैं। यहां तो पहले ही गठबंधन को नुकसान ही होना था। भाजपा को यहां सपा और बसपा का करीब 32 हजार वोट हासिल हुआ।

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