शाहजहांपुर में निकला 'लाट साहब' का जुलूस; बरसे चप्पल-जूते, होली पर अनोखी परंपरा
शाहजहांपुर में होली पर ‘लाट साहब’ की परंपरा के तहत ऐतिहासिक जुलूस निकाला गया। भैंसा गाड़ी पर सवार लाट साहब पर लोगों ने जूते बरसाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध जताया। भारी पुलिस सुरक्षा के बीच करीब 10 हजार लोगों की मौजूदगी में जुलूस शांतिपूर्वक संपन्न हुआ।

शाहजहांपुर में होली की पारंपरिक धूम के बीच बुधवार को बड़े लाट साहब का तीन सौ साल पुराना ऐतिहासिक जुलूस पूरे विधि-विधान के साथ निकाला गया। जुलूस की शुरुआत चौक कोतवाली थाने से हुई। यहां से लाट साहब का काफिला चौक क्षेत्र से होते हुए अंटा चौराहा, जेल रोड, खिरनीबाग, बिस्मिल पार्क, सदर थाना मार्ग से आगे बढ़ता हुआ विश्वनाथ मंदिर पहुंचा। जुलूस के दौरान शहर के कई स्थानों पर पुलिस और सुरक्षा बलों का फूल-मालाओं से स्वागत किया गया। परंपरा के अनुसार विश्वनाथ मंदिर परिसर में लाट साहब को उतारकर अंदर ले जाया गया, जहां उन्हें दारू पिलाने और नाश्ता कराने की रस्म निभाई गई।
जुलूस पर बरसे जूते-चप्पल
करीब आधे घंटे के विश्राम के बाद लाट साहब को पुनः जुलूस के साथ आगे के मार्ग के लिए रवाना किया गया। जुलूस में 10 हजार से अधिक लोगों की भीड़ शामिल रही। बड़ी संख्या में लोग गाड़ियों, बाइकों और अन्य वाहनों के साथ जुलूस के पीछे-पीछे चलते नजर आए। परंपरा के तहत श्रद्धालु लाट साहब को जूते मारते हुए उत्सव में सहभागिता करते दिखे। पूरे आयोजन को सकुशल संपन्न कराने के लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद है।
एसपी सिटी देवेंद्र कुमार, सिटी मजिस्ट्रेट प्रवेंद कुमार और सीओ सिटी पंकज पंत स्वयं मौके पर मौजूद रहे। भारी पुलिस बल तैनात रहा, जबकि संवेदनशील स्थानों पर विशेष निगरानी रखी गई। वहीं एसपी और डीएम अपने मोबाइल के माध्यम से लाइव कैमरों की निगरानी करते रहे, जिससे पूरे जुलूस पर प्रशासन की पैनी नजर बनी रही।
ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनता के आक्रोश का प्रतीक
'लाट साहब' का जुलूस 1857 की क्रांति के समय ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनता के आक्रोश का प्रतीक बना। भैंसा गाड़ी पर सवार ‘लाट साहब’ पर जूते-झाड़ू बरसाकर लोग प्रतीकात्मक रूप से अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपना तिरस्कार जताते हैं। सुरक्षा के कड़े घेरे में निकलने वाला यह जुलूस न केवल इतिहास की याद दिलाता है, बल्कि शहर के सांप्रदायिक सौहार्द को भी दर्शाता है, जहां शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए संवेदनशील स्थलों और मस्जिदों को तिरपाल से ढका जाता है।
भैंसा गाड़ी पर निकलते हैं 'लाट साहब'
शाहजहांपुर में होली का स्वरूप 1857 की क्रांति के दौरान पूरी तरह बदल गया। क्रांतिकारियों का प्रभाव यहां अधिक समय तक रहने के कारण, अंग्रेजों के नियंत्रण के बाद जनता ने अपनी भड़ास निकालने के लिए ‘लाट साहब’ की कल्पना की। भैंसा गाड़ी पर लाट साहब को बिठाकर उन पर जूते और झाड़ू बरसाना, दरअसल तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत को नीचा दिखाने का एक तरीका था। आज भी यह ऐतिहासिक परंपरा उसी शिद्दत और सुरक्षा व्यवस्था के साथ निभाई जाती है।
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