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शौचालय तो बने फिर भी गांवों में गंदगी का अंबार

शौचालय तो बने फिर भी गांवों में गंदगी का अंबार

संक्षेप:

Santkabir-nagar News - संतकबीरनगर जिले में स्वच्छ भारत मिशन के तहत लाखों शौचालय बनाए गए, लेकिन गंदगी की स्थिति बदतर है। कई सार्वजनिक शौचालय बंद हैं और व्यक्तिगत शौचालय भी उपयोग में नहीं आ रहे हैं। सरकारी धन की बर्बादी के बावजूद योजना का सही तरीके से कार्यान्वयन नहीं हुआ है, जिससे ग्रामीण आज भी खुले में शौच करने को मजबूर हैं।

Nov 19, 2025 10:45 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, संतकबीरनगर
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संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले में स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले में साढ़े चार लाख से अधिक व्यक्तिगत शौचालय और प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक-एक सार्वजनिक शौचालय का निर्माण कराया जा चुका है। इसके साथ ही व्यक्तिगत शौचालय बनाने का कार्य अनवरत चल भी रहा है। लेकिन उसके बाद भी गांवों में गंदगी का अंबार है। तमाम लोग आज भी खुले में शौच के लिए जाते हैं। इसका कारण है कि ज्यादातर व्यक्तिगत शौचालय बदहाल हो चुके हैं। वहीं सार्वजनिक शौचालयों पर ताला लटका रहता है। जिले का कोई भी ऐसा गांव नहीं है जहां की शत प्रतिशत आबादी शौचालय का उपयोग करती हो।

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यही कारण है कि गांव के बाहरी सड़कों पर गन्दगी पसरी रहती है। मेंहदावल कस्बे के बहबोलिया मोहल्ले में आबादी से दूर नगर पंचायत द्वारा लगभग सात वर्ष पूर्व बनाए गए सार्वजनिक शौचालय पर आज भी ताला ही लगा है। निर्माण के समय ही स्थानीय लोगों ने इसके स्थान चयन पर आपत्ति जताई थी। झाड़-झंखाड़ से घिरे इलाके में शौचालय बनवाने को लोगों ने अव्यवहारिक बताया था, लेकिन विरोध के बावजूद अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। परिणामस्वरूप लाखों रुपये खर्च कर बनाया गया शौचालय शुरुआत से ही उपयोग में नहीं आ सका। वर्तमान में इसकी स्थिति और भी बदतर हो चुकी है। चारों ओर फैली गंदगी, झाड़ियों का घेरा और सुनसान स्थान के कारण वहां कोई झांकने तक नहीं जाता। स्थानीय लोगों का कहना है कि धन का बंदरबांट कर निर्माण तो करा दिया गया, पर रखरखाव और उपयोग सुनिश्चित कराने की किसी को परवाह नहीं रही। वहीं कस्बे में बनाए गए अधिकांश व्यक्तिगत शौचालयों का लोग नियमित उपयोग कर रहे हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत शौचालय होने के बावजूद उनका उपयोग बेहद कम देखने को मिलता है। नाथनगर ब्लाक के समस्त ग्राम पंचायतों में स्वच्छ भारत मिशन के तहत खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए घर-घर शौचालय का निर्माण कराया गया था। इसी तरह लाखों रुपए खर्च करके सामुदायिक शौचालय बनाया गया था। लेकिन देखरेख के अभाव में डोर टू डोर शौचालय अधिकतर गांवों में जमीदोंज हो गया है। सामुदायिक शौचालय बदहाली की हालत में चला गया है। क्षेत्र के अधिकतर गांवों में आज के समय भी ग्रामीण खुले में शौच जा रहे हैं। सरकार के करोड़ों खर्च के बाद भी योजना सही ढंग से धरातल पर उतर नही सकी। ग्राम भिटकिनी में बना सामुदायिक शौचालय क्षतिग्रत हो गया है। बगल में ग्रामीण कूड़ा रखे हुए हैं। प्लास्टर टूट गया है। पानी टंकी नही लगी है। बदहाली हालत में चल गया है। विकास खण्ड सेमरियावां क्षेत्र के भेलवासी गांव में स्वच्छ भारत मिशन की वास्तविकता सामने आई है। बने शौचालय आज बेकार पड़े हैं। 12,000 रुपये की सहायता राशि से बने इन शौचालयों में न तो दरवाजे हैं और न ही इनका कभी इस्तेमाल किया गया। सरकारी सहायता राशि तो मिल जाती है लेकिन इतनी कम राशि में उचित शौचालय का निर्माण संभव नहीं है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली यह राशि केवल प्रोत्साहन स्वरूप है, न कि पूर्ण शौचालय निर्माण के लिए, लेकिन यह जानकारी ग्रामीणों तक नहीं पहुंच पाई। पूर्व पंचवर्षीय योजना में मिले शौचालयों की स्थिति खराब है और इस बार कई लोगों को योजना का लाभ ही नहीं मिला। बेलहर क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में शौचालय व्यवस्था बदहाली की ओर हैं। जहां एक तरफ व्यक्तिगत शौचालय उपयोग के अभाव या अधूरे में जर्जर होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गांवों में बने सामुदायिक शौचालय या तो पूरी तरह बंद पड़े हैं या ग्रामीणों को कोई सुविधा नहीं मिल रही हैं। कुछ जगहों पर ना पानी है और ना ही बिजली की व्यवस्था। कुछ गांवों में सुनसान जगह पर बना दिया गया है। बेलहर क्षेत्र मंझरिया पठान गांव का सार्वजनिक शौचालय आबादी से काफी दूर है। वहां कोई सुविधा भी नहीं है। इसी तरह कुल्हाड़िया, मीरापुर, बरदगवा, भगौसा, लोहरौली, पजराभीरी सहित कई स्थानों पर सामुदायिक शौचालय केवल शोपीस बनकर रह गए हैं। इन गांवों की गलियों और सड़कों के किनारे गंदगी फैली रहती है। … पौली ब्लाक के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता की बयार बहाने व गांवों को खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए सरकार की ओर से व्यक्तिगत शौचालयों के साथ हर गांव में सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करवाया गया है। जिम्मेदारों की उदासीनता के चलते अधिकतर सामुदायिक शौचालय बन्द व खराब पड़े हुए हैं। मानक विहीन बने व्यक्तिगत शौचालय निष्प्रयोज बेकार पड़े हुए हैं।