थुरंडा गांव में मूलभूत सुविधाओं का अभाव
Mar 02, 2026 10:09 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, संतकबीरनगर
Santkabir-nagar News - संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले के विकास खंड सेमरियावां क्षेत्र के थुरंडा गांव
संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले के विकास खंड सेमरियावां क्षेत्र के थुरंडा गांव में ग्रामीणों को मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ रहा है। सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच पा रहा है। गांव में सरकारी स्कूल न होने के कारण निजी स्कूलों का ही सहारा है। अधिकांश बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं। वे केवल जूनियर या प्राइमरी स्तर तक ही शिक्षा प्राप्त कर पाते हैं। मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण ग्रामीण आज भी कठिनाई भरा जीवन जीने को विवश हैं। विकास केवल कागजों तक सीमित रहा है, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी है। गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली चार सौ मीटर लंबी सड़क जर्जर हालत में है, जिसमें जगह-जगह गड्ढे हैं।
गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र न होने से ग्रामीणों को इलाज के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है। मुख्यालय तक पहुंचने के लिए उन्हें 12 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे आपात स्थिति में बड़ी परेशानी होती है। विवाह घर की अनुपलब्धता भी ग्रामीणों के लिए एक बड़ी समस्या है, खासकर गरीब परिवारों के लिए। उन्हें अक्सर खेतों में फसल कटने के बाद ही शादी समारोह आयोजित करने पड़ते हैं। या फिर सड़क के किनारे टेंट लगाना पड़ता है। हालांकि बारिश होने पर ऐसे आयोजनों में बाधा आती है, फिर भी उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं होता। सरकारी गोदाम न होने के कारण कोटेदार को सरकारी गल्ला निजी मकान में रखने को मजबूर होना पड़ता है। इस गांव की आबादी लगभग 4 हजार से अधिक है। कई सरकारी योजना से ग्रामीण आज भी वंचित हैं।
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थुरंडा गांव में सरकारी इंटर कॉलेज नहीं
गांव में सरकारी इंटर कॉलेज न होने से छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने में भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। इस कमी के कारण कई छात्र-छात्राओं को मैट्रिक के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। कॉलेज के अभाव में कुछ छात्र-छात्राएं दूसरे शहरों या जिलों में जाकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। इससे शिक्षा के क्षेत्र में यह पिछड़ा हुआ है। जहां सामान्य आय वर्ग के परिवार किसी तरह अपने बच्चों को बाहर भेजकर पढ़ा लेते हैं, वहीं गरीब परिवारों के बच्चों के लिए यह संभव नहीं हो पाता। इसी वजह से गांव के अधिकांश बच्चे मैट्रिक या उससे भी कम, प्राइमरी या जूनियर स्तर तक की पढ़ाई के बाद रोजी-रोटी के लिए दूसरे शहरों में मजदूरी करने चले जाते हैं। गांव से सरकारी इण्टर कालेज की पढ़ाई के लिए जिला मुख्यालय या बस्ती जनपद के मुंडेरवा बाजार जाना पड़ता है लेकिन अधिक दूरी की वजह से छात्र नहीं जा पाते है।
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सैकड़ों ग्रामीण चिकित्सा सेवा से वंचित
ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं की बदहाली एक गंभीर समस्या बनी हुई है। कई गांवों के ग्रामीण मूलभूत स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसों दूर हैं, जिसके कारण उन्हें प्राथमिक उपचार के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर रहना पड़ता है। शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में सरकारी चिकित्सा सेवाओं की स्थिति कहीं अधिक खराब है। कई गांवों में तो स्वास्थ्य केंद्र ही नहीं हैं। जहां हेल्थ सब-सेंटर खुले भी हैं, वहां सुविधाओं का घोर अभाव है। इन केंद्रों पर न तो पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध है और न ही आवश्यक दवाइयां। ऐसी स्थिति में ग्रामीण जनता के पास प्राथमिक उपचार के लिए कोई विश्वसनीय विकल्प नहीं बचता। अधिकांश ग्रामीण आबादी अपनी स्वास्थ्य जरूरतों के लिए झोलाछाप डॉक्टरों पर ही निर्भर है। रात के समय किसी के बीमार पड़ने पर तो झोलाछापों के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं होता। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में लोग केवल बच्चों को पोलियो की दवा पिलाने और टीके लगवाने के लिए आते हैं। इसके बाद वे चले जाते हैं जो इन केंद्रों पर अन्य चिकित्सा सेवाओं की अनुपलब्धता को दर्शाता है।
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