प्रधानी के कार्यकाल को लेकर असमंजस गहराया
संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले में ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल

संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले में ग्राम पंचायत के ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त होने की तय तारीख नजदीक आ रही है। इसी के साथ गांवों की सियासत और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज होती जा रही है। लेकिन इसके बाद की स्थिति को लेकर अब भी तस्वीर साफ नहीं है। कार्यकाल बढ़ेगा या पंचायतों की कमान प्रशासन संभालेगा, इन सवालों ने प्रधानों, ग्राम पंचायत सदस्यों और ग्रामीणों को असमंजस में डाल रखा है।
पंचायत चुनावों की स्थिति
सूत्रों की मानें तो यदि निर्धारित समय सीमा में पंचायत चुनाव नहीं कराए जाते हैं, तो ग्राम पंचायतों का संचालन अस्थायी रूप से प्रशासन के हाथ में जा सकता है। ऐसी स्थिति में ग्राम पंचायत सचिव, एडीओ पंचायत और बीडीओ की निगरानी में विकास कार्य संचालित होंगे। हालांकि, यह व्यवस्था पूरी तरह कागजी न होकर जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी होगी, इसे लेकर सवाल उठने लगे हैं। विकास कार्यों पर असर पड़ सकता है। गांवों में पहले से चल रहे नाली-खड़ंजा, पंचायत भवन, शौचालय के निर्माण कार्य और आवास योजनाओं की प्रगति प्रभावित हो सकती है। प्रधानों का कहना है कि बिना जनप्रतिनिधियों के सक्रिय सहयोग के योजनाओं का क्रियान्वयन धीमा पड़ सकता है। खासकर प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा और स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाओं में स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने में देरी संभव है।
प्रधानों में असंतोष, बढ़ी बेचैनी
कई ग्राम प्रधानों ने कार्यकाल बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। उनका तर्क है कि पांच वर्षों में शुरू किए गए कई विकास कार्य अभी अधूरे हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया जाना चाहिए। वहीं, कुछ प्रधानों का यह भी कहना है कि यदि अचानक जिम्मेदारी छिनती है, तो इससे उनकी छवि और गांव में भरोसे पर भी असर पड़ेगा।
ग्रामीणों की चिंता कहीं काम न रुक जाए
गांवों में रहने वाले लोग भी इस स्थिति से चिंतित हैं। उनका कहना है कि अगर प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है, तो छोटे-छोटे कामों के लिए भी ब्लॉक के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। इससे समय और संसाधन दोनों की बर्बादी होगी। ग्रामीण चाहते हैं कि या तो जल्द चुनाव कराए जाएं या फिर वर्तमान व्यवस्था को कुछ समय के लिए जारी रखा जाए।
राजनीतिक गलियारों में भी हलचल
इस मामले को लेकर राजनीतिक सरगर्मी भी बढ़ गई है। विभिन्न दलों के स्थानीय नेता अपने-अपने स्तर पर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटे हैं। माना जा रहा है कि सरकार कोई ऐसा निर्णय ले सकती है, जिससे न तो विकास कार्य ठप हों और न ही प्रशासनिक अव्यवस्था पैदा हो। ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारी फिलहाल इस मुद्दे पर खुलकर कुछ भी कहने से बच रहे हैं। उनका कहना है कि शासन स्तर से जैसे ही कोई दिशा-निर्देश प्राप्त होंगे, उसी के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल गांव-गांव में एक ही चर्चा है-26 मई के बाद क्या होगा? क्या प्रधानों को राहत मिलेगी या प्रशासन पूरी तरह से कमान संभालेगा? इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में ही स्पष्ट हो पाएगा, लेकिन तब तक अनिश्चितता का माहौल बना रहना तय है।
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