शहर में तालाब के साथ भूगर्भ जल हो रहा प्रदूषित
Santkabir-nagar News - संतकबीरनगर के खलीलाबाद शहर में तालाबों की संख्या डेढ़ दर्जन से अधिक है, जो पहले पानी के स्रोत थे। लेकिन अब जल निकासी की कमी और प्रदूषण के कारण ये तालाब गंदगी और मच्छरों के लिए शरणस्थली बन गए हैं। स्थानीय निवासियों को स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और रोजगार के अवसर भी घट रहे हैं।
संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले के खलीलाबाद शहर को तालाबों का शहर कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। शहर में डेढ़ दर्जन से अधिक तालाब हैं। यह तालाब भू-गर्भ जल को संरक्षित करने का काम करते थे। शहर का विकास नहीं हुआ था तो फसलों की सिंचाई का भी काम करते थे। 80 के दशक में नोटीफाइड एरिया से नगरपालिका खलीलाबाद का गठन होने के बाद से ही शहर का विकास तेजी के साथ होने लगा, लेकिन जल निकासी का शहर में सही तरीके से इंतजाम नहीं किया गया। शहर के एक मुख्य नाले को छोड़ दिया जाए तो शहर के सभी मोहल्लों को नालों से नहीं जोड़ा गया।
आबादी बढ़ने के साथ खेती का दायरा सिकुड़ता गया। नगर की आबादी धीरे धीरे बढ़ती गई। 1997 में खलीलाबाद शहर जिले का आकर लेने लगा। शासन से संतकबीरनगर जिले की घोषणा होने के बाद जिला स्तरीय अधिकारियों का आना शुरू हो गया। शुरू में सीएचसी खलीलाबाद को जिला अस्पताल घोषित कर दिया गया, लेकिन संयुक्त जिला चिकित्सालय बनने में डेढ़ दशक का समय लग गया। जिले का गठन होने के बाद शहर की आबादी तेजी के साथ बढ़ने लगी। खेती वाली जमीन को कंक्रीट के जंगल निगल गए। शहरी आबादी बढ़ने से शहर की आवोहवा भी तेजी के साथ बदलने लगी। पेड़ों की कटान तेज हो गई और नाला निकासी की समुचित व्यवस्था करने के बजाए शहरी तालाबों में नगर का पानी गिराया जाने लगा। मड़या, अचकवापुर के तालाब पूरी तरह से प्रदूषित हो गए। उस्का कला, मटिहना और विधियानी मोहल्ले का पानी भी सीधे तौर पर तालाबों में गिराया जाने लगा। इसी प्रकार मोतीनगर, बंजरिया, अंसार टोला, पठान टोला और बरई टोला का पानी भी तालाबों में ही गिराया जा रहा है। भिटवा टोला और पुरानी सब्जी मंडी मोहल्ले में भी जल निकासी का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। इन दोनों मोहल्लों का भी अधिकतर पानी तालाब में ही गिराया जाता है। शुरुआती दौर में तो पता नहीं चला। लोगों के घरों से निकलने वाला गंदा पानी तालाब में लगातार गिरने से तालाबों का पानी पूरी तरह से काला पड़ गया है। इन तालाबों का पानी पूरी तरह से प्रदूषित होने की वजह से जलीय जीव पूरी तरह से समाप्त हो गए। पानी प्रदूषित होने की वजह से तालाबों से दुर्गंध उठती है। आसपास के लोगों का जीवन भी मुश्किल हो गया है। लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नातेदार रिश्तेदार आते हैं तो आसपास के घर के लोगों को झेप लगती है। लोग भले ही यह कहते हैं कि वह शहर में हैं, लेकिन प्रदूषण और गंदगी के चलते लोग अपने को असहज महसूस करते हैं। तालाब के निकट रहने वाले लोगों की अक्सर तबियत खराब हो जाती हैं। गरीब लोगों को टायफाइड और डायरिया जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इन लोगों को अक्सर अस्पतालों का चक्कर लगाना पड़ता है। शहर में सबसे खराब स्थिति मटिहना, उस्का कला, पठान टोला, अंसार टोला और धोबी टोला के निवासियों की है। रोजगार की हैं अपार संभावनाएं शहर के दायरे में आये तालाब जीवन दायिनी थे। यह तालाब शहर के लोगों को रोजगार भी मुहैया कराने में सक्षम हैं। मत्स्य पालन की यहां पर अपार संभावनाएं हैं। यहां डेढ़ दर्जन तालाब हैं। सभी तालाब मत्स्य पालन योग्य हैं। शहर के इन तालाबों में मछली पालन किया जाए तो यहां के लोगों को आसानी से रोजगार मिल जाएगा। मछआ समुदाय की आबादी इस शहर में अधिक है। जिला मत्स्य अधिकारी का कार्यालय भी है। स्थानीय मछुआरों को तकनीकी ज्ञान भी मुहैया हो जाता है। सब कुछ रोजगार के अनुकूल होने के बाद भी यहां पर मत्स्य पालन नहीं किया जता है। रोजगार का अपार संभावनाएं होने के बाद भी किसी भी तालाब में मछली पालन नहीं किया जा रहा है। मछली पालन होता तो लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मुहैया हो सकता और लोगों के थाली में प्रोटीन मुहैया हो जाती। भूगर्भ जल भी हो रहा प्रदूषित जल निकासी का मुकम्मल इंतजाम न होने की वजह से मोहल्लों का पानी सीधे तौर पर तालाबों में गिराया जाता है। शुरुआती दौर में तो पता नहीं चला। दो दशक बीतते-बीतते लोगों को पता चलने लगा कि धरती के अंदर का पानी जो पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता था वह अब पूरी तरह से प्रदूषित हो गया है। तितौवा मोहल्ले में रामराज के घर से निकलने वाला पानी थोड़ी देर बाद पीला पड़ जाता है। तालाब के किनारे के नल के पानी से बदबू आ रही है। स्थानीय नागरिक अपने घरों में आरओ लगवा रहे हैं। जो लोग गरीब हैं वे अपन नल को गहराई तक गलवाते हैं, ताकि वह अपने नल के पानी का उपयोग कर सकें। डिब्बा वाले पानी का चमका व्यापार भूगर्भ जल प्रदूषित होने के चलते लोग न तो देशी नल का पानी पीते हैं और न ही इंडिया मार्का नल के पानी का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि डिब्बा बंद पानी का का प्रयोग स्थानीय शहर में खूब किया जाता है। 45 स्थानों पर डिब्बा बंद पानी आपूर्ति करने के लिए प्लांट लगा रखा है। शहर का कोई मोहल्ला नहीं है्, जहां पर दो से तीन टाईम डिब्बा बंद पानी की अपूर्ति न की जाती हो। लोग इंडिया मार्का नल से पानी पीने के बजाए डिब्बा बंद पानी खरीदने के लिए मजबूर हो रहे हैं। मच्छरों की शरणस्थली बना तालाब शहर के तालाब रोजगार सृजन नहीं कर रहे हैं। अधिकारियों की लापरवाही के चलते अब यह तालाब मच्छरों के लिए शरणस्थली बन गए हैं। इन तालाबों में गंदगी भरे पानी के साथ मच्छरों का प्रकोप तेजी के साथ बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि मच्छरों के नियंत्रण के लिए नगरपालिका स्तर से जितने भी उपाय किए जाते हैं वह पूरी तरह से नाकाफी साबित होते हैं। शहर में फागिंग की जाती है, लेकिन मच्छरों का प्रकोप कम नहीं होता है। यही नहीं मच्छरों के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए एंटी लार्वा का छिड़काव किया जाता है। फिर भी मच्छर शहर में कम नहीं होते हैं। एंटी लार्वा का छिड़काव नालियों में किया जाता है, जबकि मच्छरों की ऐशगाह तालाब बने हुए हैं। अब ऐसे में मच्छरों का प्रकोप रोकने के लिए जो भी उपाय किए जाते हैं वह सफल नहीं हो रहे हैं। ईओ अवधेश कुमार भारती ने कहा कि तालाबों को स्वच्छ बनाने के लिए खाका खींचा जा रहा है। सभी मोहल्लों में जल निकासी का बेहतर इंतजाम किया जा रहा है। आगे आने वाले समय में तालाब पूरी तरह से नीट एंड क्लीन होंगे। अध्यक्ष जगत जायसवाल ने कहा कि खलीलाबाद नगरपालिका क्षेत्र को स्वच्छ बनाने, रोजगार सृजन करने के लिए खाका खींचा जा रहा है। जल्द ही तालाब स्वच्छ होने के साथ मत्स्य पालन के लिए भी प्रयोग किए जाएंगे।
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