कोई पट्टा नहीं कर सकेंगे प्रधान प्रशासक

हिन्दुस्तान, संतकबीरनगर
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संतकबीरनगर जिले में ग्राम पंचायतों में प्रशासक की जिम्मेदारी मिलने के बाद ग्राम प्रधानों की भूमिका और अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। अब विकास परियोजनाओं और वित्तीय प्रस्तावों पर प्रशासन की निगरानी बढ़ गई है। नई व्यवस्था से पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन इससे विकास की गति प्रभावित हो सकती है।

कोई पट्टा नहीं कर सकेंगे प्रधान प्रशासक

संतकबीरनगर, हिन्दुस्तान टीम। संतकबीरनगर जिले में ग्राम पंचायतों में प्रशासक की जिम्मेदारी मिलने के बाद ग्राम प्रधानों की भूमिका, अधिकार और कार्यशैली को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। पंचायत चुनाव में देरी के चलते सरकार ने निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी तो सौंप दी है, लेकिन अब उन्हें पहले की तरह स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं रहेगा। खासकर जमीन और तालाब के पट्टे, बड़े विकास कार्यों और वित्तीय प्रस्तावों पर प्रशासन की निगरानी बढ़ा दी गई है।

ग्राम प्रधानों की नई चुनौतियाँ

ग्राम प्रधानों का कहना है कि अब जिम्मेदारी पहले से अधिक बढ़ गई है, लेकिन अधिकार सीमित कर दिए गए हैं। गांवों में रोजमर्रा के विकास कार्य, सफाई व्यवस्था, पेयजल, स्ट्रीट लाइट और अन्य आवश्यक कार्य तो चलते रहेंगे, लेकिन नए विकास कार्यों की स्वीकृति और बड़े खर्च के मामलों में प्रशासनिक अनुमति जरूरी होगी। गांव में अन्नपूर्णा भवन निर्माण सहित कई विकास योजनाएं प्रस्तावित हैं, लेकिन अब हर प्रस्ताव को नियमों के तहत तैयार कर प्रशासन को भेजना पड़ेगा। पहले ग्राम सभा में प्रस्ताव पारित कर कई काम तेजी से हो जाते थे, लेकिन अब प्रक्रिया लंबी होने की संभावना है। कई प्रधानों का कहना है कि गांव में सड़क, नाली, स्वास्थ्य उपकेंद्र, सामुदायिक भवन और अन्य योजनाओं से जुड़े कई प्रस्ताव पहले से लंबित हैं। अब इन सभी प्रस्तावों को प्रशासनिक जांच के बाद ही मंजूरी मिलेगी। इससे विकास कार्यों की रफ्तार प्रभावित हो सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और नियमों के तहत कार्य होने की संभावना मजबूत होगी।

पट्टे आवंटन में बदलाव

सबसे बड़ा बदलाव जमीन और तालाब के पट्टों को लेकर माना जा रहा है। अब प्रशासक बने ग्राम प्रधान सीधे तौर पर पट्टा आवंटित नहीं कर सकेंगे। इसके लिए पहले प्रस्ताव तैयार होगा, फिर उसे संबंधित अधिकारियों के माध्यम से जिलाधिकारी के पास भेजा जाएगा। डीएम की अनुमति के बाद ही किसी प्रकार का पट्टा आवंटन संभव होगा। गांवों में चर्चा है कि इस व्यवस्था से मनमाने तरीके से पट्टा देने की शिकायतों पर रोक लग सकती है। पहले कई जगहों पर ग्राम सभा की बैठक कर प्रस्ताव पारित कर जमीन और तालाबों का पट्टा कर दिया जाता था, जिसको लेकर विवाद भी सामने आते रहे हैं। नई व्यवस्था में प्रशासनिक निगरानी बढ़ने से पारदर्शिता आने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके लिए जिलाधिकारी आलोक कुमार ने आवश्यक निर्देश जारी भी कर दिया है ।

सरकार की नई नीतियाँ

प्रधानों का कहना है कि सरकार ने नीतिगत निर्णय लेने के अधिकार सीमित जरूर किए हैं, लेकिन गांवों के सामान्य विकास कार्य पहले की तरह चलते रहेंगे। उन्होंने कहा कि ग्राम प्रधान गांव और जनता के सबसे नजदीकी प्रतिनिधि होते हैं, इसलिए विकास कार्यों में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में नई व्यवस्था को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं, जबकि कई प्रधानों का कहना है कि अधिकार सीमित होने से विकास कार्यों की गति प्रभावित हो सकती है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि प्रशासन और ग्राम पंचायतों के बीच तालमेल किस तरह काम करता है।

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डीएम से मंजूरी की आवश्यकता

पांच लाख से अधिक खर्च करने के लिए डीएम से मंजूरी जरूरी

जिले की ग्राम पंचायतों में अब पांच लाख रुपये से अधिक लागत वाले विकास कार्यों और भुगतान पर जिला प्रशासन की निगरानी बढ़ा दी गई है। शासन के निर्देशों के तहत ऐसे सभी प्रस्तावों और खर्चों के लिए जिलाधिकारी की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है। बताया जा रहा है कि पंचायतों में बड़े भुगतान और निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की शिकायतों के बाद यह व्यवस्था लागू की गई है। अब ग्राम पंचायतों को पांच लाख रुपये से अधिक के किसी भी कार्य, खरीद या भुगतान से पहले प्रस्ताव तैयार कर संबंधित एडीओ पंचायत, डीपीआरओ के माध्यम से डीएम कार्यालय भेजना होगा। मंजूरी मिलने के बाद ही कार्य शुरू हो सकेगा। इस नई व्यवस्था से पंचायतों में पारदर्शिता बढ़ाने और सरकारी धन के दुरुपयोग पर रोक लगाने की कोशिश मानी जा रही है। वहीं ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों में इस आदेश को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई प्रधानों का कहना है कि इससे विकास कार्यों में देरी हो सकती है, जबकि प्रशासन का मानना है कि इससे वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा।

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समितियों के अधिकार सुरक्षित

ग्राम पंचायतों में प्रशासनिक व्यवस्थाओं और वित्तीय नियंत्रण को लेकर भले ही नए दिशा-निर्देश लागू किए जा रहे हों, लेकिन ग्राम पंचायत की छह प्रमुख समितियों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे। पंचायत स्तर पर गठित समितियां पूर्व की तरह अपने दायित्वों का निर्वहन करती रहेंगी। गांवों में ग्राम विकास, निर्माण कार्य, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, जल प्रबंधन समेत विभिन्न योजनाओं की निगरानी के लिए गठित समितियों की जिम्मेदारियों में कोई कटौती नहीं की गई है। समितियां अपने क्षेत्र से जुड़े प्रस्ताव तैयार कर पंचायत को भेज सकेंगी और विकास कार्यों की निगरानी भी करती रहेंगी। अधिकारियों का कहना है कि समितियों की सक्रियता से पंचायतों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। ऐसे में उनके अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है ताकि गांवों में विकास कार्यों की गति प्रभावित न हो। वहीं पंचायत प्रतिनिधियों का मानना है कि समितियों की भागीदारी से योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक बेहतर तरीके से पहुंच सकेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्राम प्रधानों की नई भूमिका क्या है?
ग्राम प्रधानों को प्रशासक की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उनके अधिकार सीमित कर दिए गए हैं।
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