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बोले सहारनपुर: बाढ़-बारिश ने छीन ली कामगारों की दिहाड़ी

Saharanpur News - बाढ़ और बारिश ने मजदूर वर्ग के लिए संकट पैदा कर दिया है। करीब 5000 मजदूरों का कामकाज प्रभावित हुआ है, जिससे उनकी आय 50-70% तक घट गई है। दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों को महीने में मुश्किल से कुछ दिन...

Newswrap हिन्दुस्तान, सहारनपुरMon, 8 Sep 2025 12:56 AM
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बोले सहारनपुर: बाढ़-बारिश ने छीन ली कामगारों की दिहाड़ी

बाढ़ और बारिश गरीब और मजदूर तबके के लिए संकट का कारण बनकर आती है। जिले में लगातार हो रही भारी बारिश और बाढ़ से मजदूरों का कामकाज पूरी तरह से प्रभावित है। भवन निर्माण, सड़क निर्माण, ईंट-भट्ठा, लघु उद्योग और खेतिहर मजदूरी से जुड़े करीब 5000 मजदूरों के सामने रोजगार और जीविका का संकट खड़ा हो गया है। 50 से 70 फीसदी तक रोजगार प्रभावित हुआ है। दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर महीने में गिनती के दिन ही काम पा रहे हैं। परिवार चलाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। मजदूर की रोज की दिहाड़ी 500 रुपये तक होती है।

यही आय उसके पूरे मजदूर वर्ग का जीवन दिहाड़ी पर ही टिका होता है। एक सामान्य मजदूर परिवार की जरूरतों को पूरा करती है-राशन, किराया, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य खर्च। लेकिन इस समय लगातार हो रही बारिश ने उनके सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। भारी बारिश और बाढ़ के कारण अधिकांश निर्माण कार्य, सड़क मरम्मत और मकान बनाने जैसे कामकाज रुक गए हैं। खेतिहर मजदूरी भी प्रभावित हो गई है, क्योंकि खेतों में पानी भर जाने से काम करना मुश्किल हो गया है। मजदूरों का कहना है कि इस मौसम में उन्हें महीने भर में मुश्किल से गिनती के दिन ही काम मिल पा रहा है। पहले जहां उन्हें लगभग रोज काम मिल जाता था, वहीं अब उन्हें हफ्ते में दो-तीन दिन ही रोजगार मिलता है। इसका सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ा है। मजदूरों की आमदनी 50 से 70 फीसदी तक घट गई है। उदाहरण के लिए, जो मजदूर पहले महीने में 15 हजार रुपये तक कमा लेता था, अब उसकी आय घटकर केवल 5 से 7 हजार रुपये रह गई है। यह रकम किसी भी परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद कम है। रोजगार का यह संकट मजदूरों की जेब ही नहीं खाली कर रहा, बल्कि उनके बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाल रहा है। कई परिवार स्कूल फीस समय पर नहीं दे पा रहे, जिसके चलते बच्चों की पढ़ाई अधर में लटक गई है। भोजन की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा है, क्योंकि मजदूर अब पेट भरने के लिए कर्ज लेने को मजबूर हो गए हैं। बारिश की वजह से आई यह स्थिति मजदूरों के लिए केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक संकट भी है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो मजदूर वर्ग पर कर्ज का बोझ और गहराता जाएगा और उनका जीवन और अधिक कठिन हो जाएगा। ठेकेदारों की मनमानी पर लगनी चाहिए लगाम मजदूर वर्ग की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है ठेकेदारी प्रथा। मजदूरों का कहना है कि काम मिलने पर भी उन्हें उनकी मेहनत का पूरा मूल्य नहीं मिल पाता। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी मजदूर की दिहाड़ी 500 रुपये तय होती है तो ठेकेदार उसमें से 100-150 रुपये तक अपनी जेब में रख लेता है। इस तरह मजदूर को महज 350 से 400 रुपये ही मिलते हैं। यह स्थिति मजदूरों के लिए बेहद अन्यायपूर्ण है, क्योंकि वे दिनभर कड़ी मेहनत करते हैं लेकिन उनकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदार खा जाते हैं। मजदूरों का कहना है कि ठेकेदारी प्रथा ही उनके शोषण की जड़ है। ठेकेदार मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं, क्योंकि उन्हें काम की आवश्यकता होती है और वे मजबूरी में कम दाम पर भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। मजदूरों का सुझाव है कि यदि उन्हें सीधे भुगतान की व्यवस्था मिल जाए, तो उन्हें उनकी मेहनत की पूरी दिहाड़ी मिल सकेगी। इसके लिए सरकार या स्थानीय प्रशासन को ठेकेदारों की मनमानी पर रोक लगानी होगी और मजदूरों को पारदर्शी तरीके से भुगतान सुनिश्चित करना होगा। तभी मजदूर अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य की उम्मीद कर पाएंगे। सरकारी योजनाओं की जानकारी न मिलना सरकार की ओर से मजदूरों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें श्रमिक पंजीकरण, बीमा कवर, स्वास्थ्य सुविधा, बच्चों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति और आवास योजनाएं शामिल हैं। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश मजदूर इनसे अनजान हैं। जानकारी और मार्गदर्शन के अभाव में वे इन योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते। पंजीकरण की प्रक्रिया भी जटिल और समय लेने वाली होने के कारण मजदूर हतोत्साहित हो जाते हैं। कई बार उनसे आवश्यक दस्तावेज़ पूरे न होने या तकनीकी कारणों से आवेदन खारिज कर दिए जाते हैं। इस वजह से मजदूरों को सरकारी सहायता का लाभ नहीं मिल पाता। मजदूरों का कहना है कि उन्हें सरकारी योजनाओं की सही और सरल जानकारी दी जाए। इसके लिए गांवों और बस्तियों में विशेष शिविर लगाए जाएं, ताकि मजदूर आसानी से पंजीकरण करा सकें। श्रमिक कल्याण बोर्ड, बीमा योजना, स्वास्थ्य सुविधा और आवास योजनाओं का लाभ सीधे मजदूरों तक पहुंचे। यदि मजदूरों तक ये योजनाएं पारदर्शी तरीके से पहुँचाई जाएं तो उनका जीवन स्तर बेहतर हो सकता है। इससे न केवल उनकी आजीविका सुरक्षित होगी बल्कि उनके परिवारों को भी सामाजिक और आर्थिक मजबूती मिलेगी। महानगर में उद्योग लगाने की आवश्यकता मजदूरों का मानना है कि यदि शहर और उसके आसपास छोटे-बड़े उद्योग लगाए जाएं तो उन्हें पूरे साल रोजगार के अवसर मिल सकेंगे। इस समय उनका जीवन मुख्य रूप से निर्माण कार्यों पर निर्भर है, जो बारिश या मौसम की अन्य बाधाओं के चलते अक्सर रुक जाते हैं। ऐसे में उनकी आमदनी पर सीधा असर पड़ता है और परिवार चलाना कठिन हो जाता है। इंडस्ट्री लगाने से न केवल मजदूरों को लगातार काम मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर नए रोज़गार भी पैदा होंगे। इससे पलायन की समस्या भी कम होगी, क्योंकि मजदूरों को अपने ही शहर में रोजगार उपलब्ध हो सकेगा। मजदूरों का कहना है कि यदि सरकार और स्थानीय प्रशासन इस दिशा में ठोस कदम उठाएं तो उनका भविष्य अधिक सुरक्षित और स्थिर हो सकता है। ------------- समस्याएं -भारी बारिश के कारण रोजगार का संकट पैदा हो गया है -बारिश के चलते दिहाड़ी नहीं मिल रही है -महीने में गिनती के दिन ही काम मिल रहा है -परिवार चलाने का संकट खड़ा हो गया है -ठेकेदार भी कमीशन काटकर दिहाड़ी दे रहा है सुझाव -महानगर में इंडस्ट्री लगाने की आवश्यकता है -मजूदरों को रोजगार भत्ता देने की आवश्यकता है -ठेकेदारी प्रथा पर लगाम लगाने की आवश्यकता है -सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ मिले -मजूदरों को मिलने वाली दिहाड़ी की राशि बढ़ाई जाए ------------------- मजदूरों की प्रतिक्रियाएं 1-बरसात के दिनों में काम बिल्कुल ठप हो जाता है। पहले महीने में 25 दिन काम मिल जाता था, अब मुश्किल से 8-10 दिन ही काम मिलता है। इतनी कमाई में घर का खर्च चलाना बहुत मुश्किल हो गया है। आशीष 2-ठेकेदार काम तो दिलाते हैं, लेकिन दिहाड़ी में से 100-150 रुपये काट लेते हैं। मेहनत हम करें और पैसा कोई और खा जाए, यह सबसे बड़ा अन्याय है। ठेकेदारी पर रोक लगानी चाहिए। मोनू कुमार 3-बच्चों की फीस जमा करना मुश्किल हो गया है। कई बार स्कूल से नोटिस आता है। बारिश ने हमारी कमाई का बड़ा हिस्सा छीन लिया है। हमें रोजगार भत्ता मिलना चाहिए ताकि परिवार संभल सके। प्रवीण 4-हमारे पास सरकारी योजनाओं की कोई जानकारी नहीं होती। न तो कोई समझाता है और न ही सही जगह पर मार्गदर्शन मिलता है। अगर योजना का लाभ मिले तो हमारी स्थिति काफी सुधर सकती है। प्रीतम 5-हमारी दिहाड़ी 500 रुपये है, लेकिन बढ़ती महंगाई में यह बहुत कम पड़ती है। सरकार को न्यूनतम दिहाड़ी 700-800 रुपये करनी चाहिए। तभी हम अपने परिवार की जरूरतें पूरी कर पाएंगे। वीरमपाल 6-बारिश से काम रुकता है तो पूरा परिवार परेशान हो जाता है। घर का किराया, बिजली बिल, दवा सबकुछ उधार पर लेना पड़ता है। अगर उद्योग लगें तो हमें सालभर रोजगार मिलेगा। सावन 7-कई मजदूर कर्ज में डूबते जा रहे हैं। काम न मिलने से साहूकारों से पैसा लेना पड़ता है और फिर चुकाना मुश्किल हो जाता है। सरकार को मजदूरों के लिए सस्ती दर पर कर्ज की सुविधा देनी चाहिए। विक्की 8-अगर शहर में छोटे-बड़े उद्योग लगाए जाएं तो हमें गांव छोड़कर बाहर पलायन नहीं करना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि अपने शहर में ही हमें स्थायी काम मिले। मोहित 9-दिहाड़ी समय पर नहीं मिलती। ठेकेदार कई-कई दिन बाद पैसा देते हैं। कभी-कभी आधा ही पैसा मिलता है। हमें सीधी भुगतान की व्यवस्था चाहिए ताकि हमें पूरा हक मिल सके। मंदीप 10-रोजगार भत्ता की बहुत जरूरत है। जैसे किसानों को सहायता मिलती है, वैसे ही मजदूरों को भी राहत दी जाए। इससे बारिश या आपदा के समय हम परिवार चला सकेंगे। सुलेख चंद 11-हमारी सबसे बड़ी दिक्कत जानकारी की कमी है। श्रमिक कल्याण बोर्ड की योजनाएं हैं, पर हमें पता ही नहीं चलता। यदि बस्तियों में शिविर लगें तो हमें भी इसका लाभ मिलेगा। शिव कुमार 12-हम रोज मेहनत करते हैं, फिर भी भविष्य सुरक्षित नहीं लगता। बच्चे पढ़-लिख लें, यही हमारी सबसे बड़ी इच्छा है। सरकार को मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य पर खास ध्यान देना चाहिए। संजय भारती बोले जिम्मेदार पंजीकृत निर्माण श्रमिकों के लिए निर्माण कामगार मृत्यु व दिव्यांगता सहायता योजना, निर्माण कामगार गंभीर बीमारी सहायता योजना, अटल आवासीय विद्यालय योजना इत्यादि अनेक कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही है। निर्माण श्रमिकों को इस संबंध में जागरूक किया जा रहा है। मनीष बंसल, जिलाधिकारी

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