रेप पीड़िता को समय पर नहीं मिला अबॉर्शन का अधिकार; हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग को लगाई फटकार

विधि संवाददाता, प्रयागराज
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हाईकोर्ट ने एक दुष्कर्म पीड़िता गर्भसमापन कराने से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए स्वास्थ्य, पुलिस और बाल संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कहा है कि यदि कानून के बावजूद पीड़ित को उसका वैधानिक अधिकार न मिल सके, तो ऐसी व्यवस्था कानून को व्यवहार में निष्प्रभावी बना देती है।

रेप पीड़िता को समय पर नहीं मिला अबॉर्शन का अधिकार; हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग को लगाई फटकार

UP News: इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता का अवांछित गर्भ समाप्त कराने से जुड़े मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। साथ ही उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य, पुलिस और बाल संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी उठाए हैं। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा कि यदि कानून के बावजूद पीड़ित को उसका वैधानिक अधिकार न मिल सके, तो ऐसी व्यवस्था कानून को व्यवहार में निष्प्रभावी बना देती है।

दरअसल, मेरठ की 17 साल की मानसिक रूप से अस्वस्थ नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता की देखभाल उसके नाना कर रहे थे। नाबालिग लगभग 22 सप्ताह की गर्भवती पाई गई। पीड़िता ने अपने नाना को दुष्कर्म की जानकारी दी। जिसके बाद 11 जून साल 2023 को एफआईआर दर्ज हुई। मेडिकल जांच में 22 सप्ताह 6 दिन का गर्भ पाया गया। नाना ने पहले मुख्य चिकित्साधिकारी मेरठ से गर्भ समापन की मांग की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। बाद में विशेष पॉक्सो न्यायालय में आवेदन दिया गया, जिसे यह कहते हुए लौटा दिया गया कि हाई कोर्ट जाएं। एफआईआर से हाईकोर्ट पहुंचने तक 54 दिन बीत गए। इस पर अदालत ने इस देरी को प्रशासनिक संवेदनहीनता का परिणाम बताया।

24 करोड़ आबादी वाले राज्य में 11 वर्षों में केवल 106 मामले

अदालत ने कहा कि 2013 से 2023 तक पूरे यूपी में मेडिकल बोर्ड व्यवस्था के तहत केवल 106 मामले सामने आए, जबकि राज्य में बाल यौन अपराधों की वास्तविक संख्या कहीं अधिक है। न्यायालय के अनुसार यह आंकड़ा स्वयं साबित करता है कि व्यवस्था वर्षों तक काम ही नहीं कर रही थी और न्यायिक हस्तक्षेप के बाद ही कुछ हरकत हुई।

7 से 13 वर्ष तक की बच्चियां भी गर्भवती मिलीं

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि राज्य के विभिन्न जिलों में 7, 11, 12 और 13 साल की बच्चियों तक को दुष्कर्म के कारण गर्भधारण करना पड़ा और उन्हें मेडिकल बोर्डों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 21, पॉक्सो अधिनियम की धारा 39 तथा मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन को दर्शाती है।

चाइल्ड वेलफेयर सिस्टम की कड़ी आलोचना

इलाहाब हाईकोर्ट ने कहा कि 2022-23 में पूरे प्रदेश में 28,351 मामले बाल कल्याण समिति के समक्ष आए। कई जिलों में सपोर्ट पर्सन की संख्या अत्यंत कम थी। गोरखपुर में 1,142 मामलों पर केवल 2 सपोर्ट पर्सन थे। लखनऊ में 1,632 मामलों पर केवल 3 सपोर्ट पर्सन थे। वहीं, औरैया जिले में तो एक भी सपोर्ट पर्सन नहीं था।

Pawan Kumar Sharma

लेखक के बारे में

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पवन कुमार शर्मा पिछले चार वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े हैं। डिजिटल मीडिया में काम करते हुए वह उत्तर प्रदेश की राजनीति, क्राइम, सरकारी योजनाओं और टूरिज्म से जुड़े मुद्दों पर नियमित रूप से लिखते हैं। इससे पहले पवन एबीपी न्यूज के साथ बतौर फ्रीलांसर काम कर चुके हैं। पवन ने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। ग्राउंड रिपोर्टिंग और अकादमिक समझ के साथ पवन तथ्यात्मक, संतुलित और पाठक-केंद्रित समाचार लेखन करते हैं।

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