7 दिन बात नहीं कर पाऊंगा, फिर आ गई मौत की खबर; रूसी सेना में तैनात रामपुर के शावेद का सच क्या?
रूसी सेना में तैनात रामपुर के शावेद की मौत के बाद उसका शव जब घर पहुंचा तो परिजनों में कोहराम मच गया। कब्रिस्तान में शव को दफनाया गया। वहीं परिजनों का आरोप है कि बेटे ने 7 दिन तक बात नहीं हो पाने की बात कही थी। मगर सात दिन बाद मौत की खबर आ गई। गोली लगने से शावेद की मौत हुई थी।

रामपुर जिले के शावेद की रूसी सेना में मौत हो जाने के बाद परिजनों ने आरोप लगाते हुए कहा कि सितंबर माह में बेटे ने फोन कर सात दिन तक बात नहीं हो पाने की बात कही थी। मगर यह सात दिन का इंतजार सात माह बाद मौत की सूचना लेकर आया। इसके बाद परिजनों ने जिलों के कई युवा भी वहां होने की जानकारी दी है। जिसके बाद खुफिया विभाग भी जानकारी जुटाने में जुट गया है। विभाग की ओर से रूस सेना में भर्ती, जिले के युवाओं के बारे में डाटा जुटाया जा रहा है। मसवासी क्षेत्र के गांव भूबरा मुस्तेहकम के मझरा फतेहगंज निवासी शावेद रूस फर्नीचर का कार्य करने गया था। मगर वह कार्य के दौरान रूस सेना में भर्ती हो गया था। उसने खुद फोटो भेजकर पिता से सात दिन तक बात नहीं हो पाने की जानकारी दी थी। मगर यह सात दिन का इंतजार सात माह बाद मौत की सूचना लेकर आया।
रामपुर में सुपुर्द-ए-खाक हुआ शावेद
शनिवार को उसका शव जब घर पहुंचा तब परिजनों में कोहराम मच गया था। लकड़ी के ताबूत में बंद शव के पास वर्दी भी रखी हुई थी। शव क्षत-विक्षत हालत में था, इसलिए लोग ताबूत बिना खोले ही कुछ देर बाद कब्रिस्तान ले गए थे। वहां शावेद के शव को सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। इस बीच परिजनों ने कई तरह के आरोप लगाए। उनका कहना था कि जिले के कई और युवा वहां पर फंसे हुए है। इन सभी जानकारी के बाद अब खुफिया विभाग रूस जाने वाले लोगों की जानकारी जुटाने में लग गया है।
रूसी सेना में तैनात था शावेद
आपको बता दें रामपुर के मजरा फतेहगंज निवासी शावेद(22) पुत्र दूल्हे हसन की रूस में गोली लगने से मौत हो गई थी। वो रूस की आर्मी में तैनात था। शावेद करीब नौ महीने पहले परिजनों को स्टील फर्नीचर का काम करने की बात कहकर रूस गया था। वह रूस के एक हॉस्टल में रुका और दो माह फर्नीचर का काम करने के बाद आर्मी में भर्ती हो गया था। ड्यूटी के दौरान उसे गोली लग गई, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
गोली लगने से शावेद की हुई थी मौत
घटना की सूचना रूस की आर्मी बटालियन के द्वारा फोन पर शावेद के पिता दूल्हे हसन को दी गई। सूचना से परिजनों में कोहराम मच गया था। शावेद अपने परिवार का मुख्य सहारा था। उसका एक छोटा भाई नावेद मानसिक रूप से पीड़ित है, ऐसे में घर की पूरी जिम्मेदारी शावेद के ही कंधों पर ही थी। उसकी मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। शावेद के परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उसके पिता दुल्हे हसन ग्रामीणों के घर से दूध खरीद कर होटलों पर बेचने का काम करते हैं। वह पिता का सहारा बनने के लिए विदेश चला गया था। वहां रूस की सेना में भर्ती हो गया। इससे स्वजन भी खुश थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि एक दिन उनके घर का चिराग बुझ जाएगा।


