मकोई के फल-पौधे पर शोध में बढ़ी कई देशों की दिलचस्पी
प्रयागराज में मकोई (फिजालिस) पर शोध कार्य में तेजी आई है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय और शुआट्स के वैज्ञानिकों के अध्ययन में यह पाया गया कि अमेरिका इस पर सबसे ज्यादा रिसर्च करता है, जबकि भारत चौथे स्थान पर है। मकोई के औषधीय गुणों के कारण यह पौधा भविष्य में चिकित्सा और पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

प्रयागराज। ग्रामीण इलाकों में आसानी से मिलने वाला मकोई (फिजालिस) का फल और पौधा अब दुनिया भर के वैज्ञानिकों की रुचि का केंद्र बन गया है। इसके औषधीय और पोषण संबंधी गुणों के कारण पिछले दो दशकों में इस पर शोध कार्य में तेजी से वृद्धि हुई है। यह तथ्य इलाहाबाद विश्वविद्यालय के फैमिली एंड कम्युनिटी साइंस डिपार्टमेंट (पूर्व में गृह विज्ञान विभाग) और शुआट्स के वैज्ञानिकों के हालिया अध्ययन में सामने आया है। विभागाध्यक्ष प्रो. नीतू मिश्रा के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन में जो तथ्य सामने आए उसे दुनिया की सबसे बड़े और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, तकनीकी और चिकित्सा संबंधी जर्नल एल्सेवियर ने प्रकाशित किया है। प्रो. नीतू मिश्रा ने मकोई पर 2023 तक प्रकाशित हुए 1932 वैज्ञानिक शोध पत्रों का विश्लेषण किया। पता चला कि मकोई पर पहला शोध पत्र 118 साल पहले 1908 में प्रकाशित हुआ था, लेकिन तब से वर्ष 2000 तक इस पर काफी कम शोध हुआ। वर्ष 2000 के बाद इसके औषधीय महत्व को लेकर वैज्ञानिकों की रुचि तेजी से बढ़ी। उन्होंने पाया कि मकोई पर शोध के मामले में अमेरिका सबसे आगे है। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने इस पर सबसे ज्यादा रिसर्च पेपर प्रकाशित किए हैं। मकोई पर हुए शोध का हवाला (उद्धरण) देने के मामले में भी अमेरिका सबसे आगे है।
मकोई पर शोध में भारत चौथे स्थान पर
मकोई पर होने वाले शोध के मामले में चीन दूसरे तो ब्राजील तीसरे स्थान पर है जबकि भारत का चौथा स्थान है। ब्रिटेन के शोधपत्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम है। वैज्ञानिकों की सबसे ज्यादा रुचि इसकी प्रजाति पेरुवियाना (केप गूजबेरी/गोल्डन बेरी) और एंगुलाटा में रही है। इन पौधों में पाए जाने वाले विथेनोलाइड्स, फिसालिन, फ्लेवोनॉयड और पॉलीफेनॉल जैसे तत्वों में एंटीऑक्सीडेंट, सूजनरोधी, रोगाणुरोधी और कैंसररोधी गुण पाए गए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि मकोई भविष्य में दवा विकास, पोषण सुरक्षा और टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत में मकोई की कुछ प्रजातियां सदियों से पारंपरिक चिकित्सा का हिस्सा रही हैं। आयुर्वेद में इसे ‘काकतिक्ता’ या ‘टंकारी’ के नाम से जाना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इसके मूत्रवर्धक गुणों का उल्लेख मिलता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसके पत्तों, फलों और जड़ों का उपयोग घरेलू उपचार के रूप में किया जाता है। यही पारंपरिक ज्ञान अब वैज्ञानिक शोध का विषय बन रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


