
बार कौंसिल से बरी होने पर रद्द नहीं होगा आपराधिक मुकदमा
Prayagraj News - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बार कौंसिल की अनुशासनात्मक कार्रवाई में किसी वकील का बरी होना आपराधिक मामले को समाप्त करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने बताया कि अनुशासनात्मक और आपराधिक कार्यवाही की प्रकृति अलग है। यह आदेश गाजियाबाद के वकील योगेश कुमार भेटवाल की याचिका पर सुनाया गया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बार कौंसिल की अनुशासनात्मक कार्यवाही में किसी वकील का बरी या दोषमुक्त होना अपने आप में उसके खिलाफ दर्ज किसी वैध आपराधिक मामले को समाप्त करने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कार्यवाही और अनुशासनात्मक कार्यवाही अलग-अलग प्रकृति की होती हैं और दोनों एकसाथ चल सकती हैं क्योंकि उनके उद्देश्य प्रक्रिया और प्रमाण के मानक भिन्न होते हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति जय प्रकाश तिवारी ने गाजियाबाद के एडवोकेट योगेश कुमार भेटवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। भेंटवाल ने याचिका दाखिल कर गाजियाबाद के एसीजेएम अदालत से जारी सम्मन आदेश को चुनौती दी थी।

यह आदेश उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 420 के तहत दर्ज एक मामले में जारी किया गया है। मामले के तथ्यों के अनुसार अगस्त 2012 में महावीर सिंह ने एडवोकेट एक्ट 1961 की धारा 35 के तहत बार कौंसिल में शिकायत कर आरोप लगाया कि भेंटवाल ने अनुकूल निर्णय दिलाने का आश्वासन देकर छह लाख 36 हजार रुपये बतौर फीस लिए और धोखाधड़ी की। फरवरी 2014 में बार कौंसिल की अनुशासन समिति ने एकतरफा आदेश करते हुए उन्हें दोषी ठहराया और पांच वर्ष के लिए वकालत का लाइसेंस निलंबित कर देशभर में अदालतों में प्रैक्टिस करने से वंचित कर दिया। हालांकि अक्टूबर 2014 में भेंटवाल की पुनर्विचार याचिका पर उक्त आदेश और मूल शिकायत दोनों निरस्त कर दी गई। इसके बाद शिकायतकर्ता ने वही आरोप लगाते हुए सीजेएम गाजियाबाद की अदालत में आपराधिक वाद दाखिल किया, जिस पर आईपीसी की धारा 420 के तहत वर्ष 2017 में सम्मन आदेश जारी किया गया। सम्मन आदेश को चुनौती देते हुए भेंटवाल ने याचिका में कहा कि बार कौंसिल की अनुशासन समिति ने शिकायत खारिज कर उन्हें दोषमुक्त कर दिया इसलिए उन्हीं तथ्यों पर आपराधिक मामला दुर्भावनापूर्ण है और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है। कहा गया कि मामला पूरी तरह सिविल प्रकृति का है और यह तहसील कोर्ट के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों के इशारे पर दर्ज कराया गया, जिनके खिलाफ उन्होंने आपत्ति की थी। राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री है, जिसके आधार पर मुकदमे की कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सकती है। कोर्ट ने याची की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में बरी होना आपराधिक मुकदमे को रद्द करने का स्वतः आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट एक्ट के तहत कार्यवाही अर्ध-दंडात्मक प्रकृति की होती है, जिसका उद्देश्य विधि व्यवसाय की गरिमा और नैतिकता की रक्षा करना है, जबकि आपराधिक मुकदमे का उद्देश्य अपराध की जवाबदेही तय करना होता है।

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