
मराठी घट रहे लेकिन बढ़ रही बप्पा की धूम, प्रयागराज में 50 सालों से चल रहा है गणपति महोत्सव
पचास साल पहले मराठियों ने प्रयागराज में शुरू किया था गणेश महोत्सव का आयोजन। तब के इलाहाबाद के दारागंज मोहल्ले में आकर बसे थे 250 मराठी परिवार। अब उनकी संख्या घटकर 50 रह गई है लेकिन बप्पा का त्योहार पूरी भव्यता से मनाते हैं।
गणेश महोत्सव का आयोजन महाराष्ट्र और मुंबई से निकलकर उत्तर प्रदेश कई शहरों में भी बड़े पर्व का रूप ले चुका है। प्रयागराज में तो गणपति बप्पा की पूजा 50 साल पहले शुरू हो गई थी। तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। बुधवार को गणेश चतुर्थी पर गजानन की मूर्तियां पंडालों में विराजमान की जाएगी। प्रयागराज में गणेश महोत्सव की नींव स्थानीय नागरिकों ने नहीं, बल्कि महाराष्ट्र से 50 वर्ष पहले आए 250 मराठी परिवारों ने डाली थी। तब इलाहाबाद रहे इस शहर में गणपति के महोत्सव की शुरुआत का श्रेय महाराष्ट्र लोक सेवक मंडल और लोकमान्य तिलक सेवा ट्रस्ट को जाता है।

ट्रस्ट के 60 वर्षीय ट्रस्टी विवेक पौराणिक बताते हैं कि दारागंज के नगाड़ खाना में मराठी परिवार आकर बसे थे। अब इनकी संख्या घटकर 50 के करीब ही रह गई है। इसमें भी 60 फीसदी लोग दारागंज और बाकी अन्य मोहल्लों में रहते हैं। पौराणिक ने बताया कि 46 वर्षों से अलोपीबाग के ट्रस्ट परिसर में 10 दिवसीय सार्वजनिक गणेशोत्सव धूमधाम से मना आ रहे हैं। महाराष्ट्र की तर्ज पर गणेशोत्सव के सातवें दिन सहस्त्रमोदक हवन मुख्य आकर्षण होता है।
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प्रयागराज में ऐसा आयोजन कोई नहीं करता है, जिसमें 1008 मोदक से गजानन का हवन किया जाता है। हवन के दौरान गणपति अथर्व शीष का पाठ किया जाता है। एक पाठ में 15 मिनट का समय लगता है। हवन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर मराठी परिवार के घर में शुद्ध देसी घी से निर्मित पंच खाद्य से मोदक तैयार किया जाता है। पंच खाद्य में पोश्ता दाना, चीनी, चिरौंजी किशमिश और गरी (नारियल) का इस्तेमाल किया जाता है।
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मोदक से हवन के बाद उसे परिजनों के बीच वितरित किया जाता है। जिस परिसर में गणेशोत्सव का आयोजन होता है, उसे सेना ने ट्रस्ट को 99 वर्षों की लीज पर दिया था। इसके लिए दो हजार रुपये ट्रस्ट की ओर से सेना को प्रतिमाह दिया जाता है।





