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कब्जा वस्तुओं का लिया जाता है इंसानों का नहीं, फर्द पर ये लिखे जाने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

कब्जा वस्तुओं का लिया जाता है इंसानों का नहीं, फर्द पर ये लिखे जाने पर हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी

संक्षेप:

मुजफ्फरनगर की सानिया और अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने कहा कि ‘कब्जा’ ऐसा शब्द है, जो कानूनी और आम बोलचाल में अंग्रेजी शब्द ‘पज़ेशन’ के सबसे करीब है। इसका इस्तेमाल इंसानों के लिए नहीं, संपत्ति के लिए किया जाता है।

Dec 02, 2025 04:08 pm ISTAjay Singh विधि संवाददाता, प्रयागराज
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की फर्द में महिला को हिरासत में लेने की जगह ‘कब्ज़ा में लेने’ लिखे जाने पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने आपत्ति जताते हुए कहा कि यूपी पुलिस ने एक महिला से जुड़ी फर्द या पज़ेशन का मेमो तैयार किया, जिसमें दावा किया गया कि उसे ‘कब्जा’ में लिया जा रहा था ताकि यह दिखाया जा सके कि उसे ‘अरेस्ट’ नहीं किया जा रहा है।

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मुजफ्फरनगर की सानिया व अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने कहा कि ‘कब्जा’ ऐसा शब्द है, जो कानूनी और आम बोलचाल में अंग्रेजी शब्द ‘पज़ेशन’ के सबसे करीब है। इसका इस्तेमाल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि संपत्ति के लिए किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में समाज का कोई व्यक्ति, जो पुलिस में काम करता है, यह सोच सकता है कि किसी इंसान को मेमोरेंडम ऑफ़ पज़ेशन या फर्द के आधार पर कब्जा किया जा सकता है। इससे लगता है कि कम से कम इस कार्य में शामिल लोग ड्रेड स्कॉट बनाम सैंडफ़ोर्ड के दिनों से बहुत आगे नहीं बढ़े हैं। वर्ष 1856 के ड्रेड स्कॉट केस में यूएस सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि गुलाम बनाए गए लोग यूनाइटेड स्टेट्स के नागरिक नहीं थे इसलिए उन्हें फ़ेडरल सरकार या कोर्ट से किसी भी सुरक्षा की उम्मीद नहीं की जा सकती थी।

याचिका के अनुसार सानिया ने विकास उर्फ रामकृष्ण से अपनी मर्जी से शादी की थी। दोनों अलग धर्म के हैं। परिवार वालों ने सानिया को नाबालिग बताते हुए मुकदमा दर्ज कराया, जिस पर विकास को पुलिस ने जेल भेज दिया। बाद में वह जमानत पर रिहा हुआ। सानिया को पुलिस ने नारी संरक्षण गृह भेज दिया। उसे वहां से रिहा कराने के लिए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई। कोर्ट ने इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग को मामले की जांच करने और गलती करने वाले पुलिसवालों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान लड़की के पिता ने स्कूल के रिकॉर्ड के आधार पर, जिसमें उसकी जन्मतिथि 25 अप्रैल 2009 दिखाई एवं आरोप लगाया कि वह नाबालिग (17 साल की) है और उसका अपहरण किया गया। हालांकि कोर्ट ने मेडिको-लीगल सर्टिफिकेशन के आधार पर उसे बालिग पाया और उसे अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जाने की अनुमति दे दी।

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Ajay Singh

लेखक के बारे में

Ajay Singh
अजय कुमार सिंह दो दशक से अधिक अनुभव वाले वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से की और टीवी होते हुए अब डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं। राजनीति, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण से जुड़ीं खबरों को गहराई से कवर किया है। फिलहाल लाइव हिन्दुस्तान में असिस्टेंट एडिटर हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति और क्राइम खबरों पर विशेष फोकस रखते हैं। और पढ़ें
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