ऐसा केस जिसकी कोई पुलिसकर्मी नहीं करना चाहता विवेचना, सरकारी भत्ते की जगह अपनी जेब से भरते हैं बिल
बेटी लापता हो जाए तो घरवालों की नींद उड़ जाती है। मामला दर्ज होने पर खासकर पुलिस पर भी दबाव बढ़ जाता है। पुलिस ढूंढकर लाती भी है लेकिन सच यह है कि ऐसे मामलों को कोई पुलिसकर्मी लेना नहीं चाहता है। इसकी वजह भी हैरान कर देने वाला है।

बेटी लापता हो जाए तो घरवालों की नींद उड़ जाती है। मामला दर्ज होने पर खासकर नाबालिग लड़की के मामले में पुलिस पर भी दबाव बढ़ जाता है। पुलिस ढूंढकर लाती भी है लेकिन सच यह है कि ऐसे मामलों को कोई पुलिसकर्मी लेना नहीं चाहता है। कारण, लोकेशन प्रदेश से बाहर मिलने पर वहां से लाने में हजारों का खर्च आता है। इसके लिए पुलिस को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती है। भत्ते की व्यवस्था है लेकिन अमूमन वह मिल नहीं पाता या समय पर नहीं मिलता। कानूनी पेचीदगियों के कारण पुलिसकर्मी दावा भी नहीं करते।
गुमशुदा लड़की की लोकेशन यूपी से बाहर मिलने पर उसे लाने में कम से कम 20 से 25 हजार रुपये का खर्च आता है। नियम है कि आने-जाने का खर्च एक मानक के अनुसार मिले, लेकिन जो रकम मिल सकती है, उसके लिए कोई आवेदन नहीं करता है। इसकी मॉनिटरिंग होती है। दूसरे, असल जगह पर बरामदगी दिखाने पर ट्रांजिट रिमांड की प्रक्रिया और तमाम कागजी खानापूरी से गुजरना होता है। इससे बचने के लिए खुद ही व्यवस्था करते हैं। पुलिसकर्मियों के इस दर्द को अधिकारी भी समझते हैं।
गोरखपुर से गायब ज्यादातर लड़कियां हैदराबाद और मुंबई में मिली हैं। इन्हें वापस लाने वाले पुलिसकर्मी बताते हैं कि जिस लड़की के माता-पिता सक्षम हैं, वे तो अपनी इज्जत बचाने और बेटी को जल्द बरामद करने के लिए टीम के आने-जाने का खर्च और गाड़ी का इंतजाम कर देते हैं। नहीं तो विवेचक इसके लिए गलत-सही रास्तों से खर्चों का इंतजाम करता है। लोकेशन ट्रेस होने पर पहली बार में अगर लड़की मिल गई तो ठीक, नहीं तो यह खर्च और बढ़ता जाता है।
एक साल में 400 से अधिक लड़कियां लापता
जिले में दर्ज केसों पर नजर डालें तो 400 से अधिक लड़कियां बीते एक वर्ष में गोरखपुर जिले से लापता हुई थीं। इनमें से 313 को पुलिस ने घर पहुंचा दिया तो 89 को दोबारा खोजना पड़ा। अब भी 27 लड़कियां लापता हैं, जिन्हें ढूंढने के खर्च के जुगाड़ में पुलिस खामोश बैठी है।
सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर की थी नाराजगी
बेलीपार इलाके से एक किशोरी लापता हो गई थी। केस दर्ज होने के बाद उसकी लोकेशन दिल्ली में मिली थी, मगर इसी बीच पीड़िता के परिजन सुप्रीम कोर्ट चले गए। कोर्ट ने गोरखपुर पुलिस को फटकार लगाते हुए मामले की विवेचना दिल्ली पुलिस के सुपुर्द कर दी। इसके बाद किशोरी मिल गई। विवेचक पर एसएसपी ने कार्रवाई की थी। उसके बाद से पुलिस जैसे-तैसे पैसों का इंतजाम करके बरामदगी करने में ही अपना भला समझती है।
इस वजह से ट्रांजिट रिमांड से बचती है पुलिस
किशोरी की बरामदगी पर अगर पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी दूसरे जनपद में दिखा देगी तो नियमत: उसे वहीं की कोर्ट में पेश करना होगा। इसके लिए केस डायरी और अन्य कागजात की औपचारिकता पूरी करनी होती है। कोर्ट में पेश करने पर मजिस्ट्रेट एक निर्धारित समय देते हैं। नियत समय पर घटना वाली जगह के स्थानीय कोर्ट में लड़की को पेश करना होता है। बड़ा पेच यह है कि कागजी कार्रवाई में थोड़ी भी कमी मिली तो आरोपित को वहीं दाखिल करना पड़ता है और प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
केस मिलते ही सकते में आ जाते हैं पुलिसकर्मी
यही एक ऐसा केस है, जिसकी विवेचना कोई पुलिसकर्मी नहीं करना चाहता। केस मिलते ही वे सकते में आ जाते हैं और उनकी कोशिश होती है कि किसी तरह से केस से छुटकारा मिल जाए। अगर उन्हें लाइन हाजिर करने के लिए कोई अफसर बोल दे तो बचाव की भी कोशिश नहीं करते हैं। हालांकि, पुराने दारोगा यह सीख चुके हैं कि ऐसे मामलों को कैसे संभालना है।
लेखक के बारे में
Pawan Kumar Sharmaपवन कुमार शर्मा पिछले चार वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान से जुड़े हैं। डिजिटल मीडिया में काम करते हुए वह उत्तर प्रदेश की राजनीति, क्राइम, सरकारी योजनाओं और टूरिज्म से जुड़े मुद्दों पर नियमित रूप से लिखते हैं। इससे पहले पवन एबीपी न्यूज के साथ बतौर फ्रीलांसर काम कर चुके हैं। पवन ने नई दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से रेडियो एवं टेलीविजन पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इससे पहले क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर से राजनीति विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन किया। ग्राउंड रिपोर्टिंग और अकादमिक समझ के साथ पवन तथ्यात्मक, संतुलित और पाठक-केंद्रित समाचार लेखन करते हैं।
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