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पीलीभीतकोरोना: दर्द की थी इंतहा... दवा पहुंचाकर समस्या की थी फना

हिन्दुस्तान टीम,पीलीभीतPublished By: Newswrap
Sat, 27 Mar 2021 03:22 AM
कहने को तो लॉकडाउन लग गया था। बेटे दूर परदेस में नौकरी पर थे। पर अचानक परिवार पर मुश्किल आ पड़ी। चाह कर भी अपनों तक पहुंच पाने का कोई जरिया नहीं...
1 / 2कहने को तो लॉकडाउन लग गया था। बेटे दूर परदेस में नौकरी पर थे। पर अचानक परिवार पर मुश्किल आ पड़ी। चाह कर भी अपनों तक पहुंच पाने का कोई जरिया नहीं...
कहने को तो लॉकडाउन लग गया था। बेटे दूर परदेस में नौकरी पर थे। पर अचानक परिवार पर मुश्किल आ पड़ी। चाह कर भी अपनों तक पहुंच पाने का कोई जरिया नहीं...
2 / 2कहने को तो लॉकडाउन लग गया था। बेटे दूर परदेस में नौकरी पर थे। पर अचानक परिवार पर मुश्किल आ पड़ी। चाह कर भी अपनों तक पहुंच पाने का कोई जरिया नहीं...

पीलीभीत। वरिष्ठ संवाददाता

कहने को तो लॉकडाउन लग गया था। बेटे दूर परदेस में नौकरी पर थे। पर अचानक परिवार पर मुश्किल आ पड़ी। चाह कर भी अपनों तक पहुंच पाने का कोई जरिया नहीं बना। तब ऐसे में वो काम आए जिनसे हमारा दूर दूर तक रिश्ता नहीं था। खून के रिश्ते बने और जन्म जन्मांतर के लिए संबंधों की प्रगाढ़ दास्तां लिखी गईं। कहीं दर्द में कोई दवा बना तो कहीं कोई टूटती सांसों के बीच देवदूत बन गया और समस्या को फना कर दिया। ऐसा ही समाज ऐसी ही नई दुनिया तब कोरोना ने असली जिंदगी में दिखाई दी। सही मायनों में कहें तो यही जीवन का असली मर्म था जब इंसान इंसान का दुश्मन नहीं बल्कि खेवनहार हो गया था।

कोरोना बढ़ रहा था दवा खत्म हो रही थी

मार्च के बाद महामारी ने ऐसा रूप ले लिया था कि इंसान को इंसान से डर लगता था। मिलना जुलना याराना दोस्ताना सब बंद था। रह गई थी तो केवल इंसानियत या फिर एक दूसरे की जिंदगी बचाए रखने की जुगत। कोरोना समय में सबसे अधिक परेशानी अगर हुई तो वह क्षय रोगियों को हुई। दवा खत्म हो रही थी और क्षय अस्पताल के स्टाफ को जिला अस्पताल से संबद्ध कर दिया गया था। तब क्षय रोगियों को दवा पहुंचना मुश्किल काम हो गया था। ऐसे में यहां के जिम्मेदारों ने न केवल कोरोना दायित्वों को निभाया बल्कि जरूरतमंद रोगियों तक उनके घर घर पहुंच कर दवा मुहैया कराई और सौ-सौ हजार- हजार शुभाषीष संबंधित परिजनों से पाया। सुपरवाइजर राजेश गंगवार पर इन दिनों बड़ा दायित्व रहा और सबके घर तक दवा पहुंचाई।

रक्तदान कर दिया था नया जीवन

बीना श्रीवास्तव मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली थी। संक्रमण काल में उन्हें चोट लग गई और काफी रक्त बह गया।जिससे उनकी हालत बिगड गई थी। दोनों बेटे नोएडा दिल्ली में काम करते थे औरयहां पहुंच पाना संभव नहीं था। ऐसे में व्यापारी नेता अभिषेक सिंह गोल्डी तक हिन्दुस्तान ने बात पहुंचाई तो बिना किसी जान पहचान के भी बीना को रक्तदान कर जीवन बचाया गया। यह तब का समय था कि जब परदेस में बेटे अपनी मां के लिए परेशान और बेचैन थे। यहां एक बुजुर्ग पति अपनी पत्नी के जीवन के लिए परेशान था। ऐसे में हिन्दुस्तान की पहल पर बीना श्रीवास्तव को रक्तदान कर उनका जीवन बचाया गया और इंसानियत की जीत हुई।

अनजान लोगों से बना नया रिश्ता

दर्द से कराह रहे पूरनपुर के व्यापारी अंबरीश गुप्ता की दवा अमेरिका से दिल्ली आती थी। वहां से पीलीभीत होकर पूरनपुर पहुंचती थी। पर उनकी दवा आने में लॉकडाउन एक बड़ा रोडा बन गया। तब बात हिन्दुस्तान अखबार के जरिए डीआई बबिता रानी के कानों तक पहुंची और बबिता रानी ने दिल्ली से दवा मंगवा कर उनके घर तक पहुंचाई। इन भावुक लंबों में अंबरीश ने बबिता रानी से माथे पर तिलक करा कर कलाई पर राखी बंधवाई और एक नए रिश्ते की डोर बांधी। यह अलग बात है कि कि लॉकडाउन के बाद अंबरीश गुप्ता का निधन हो गया पर जीवन बचाने के प्रयासों में यह अध्याय सदा सदा के लिए अतीत बन गया।

तन मन और धन सब कुछ रहा अर्पण

प्रशासन ही नहीं कुछ समाजसेवी भी ऐसे सामने आए कि जिन्होंने अपने निजी तन मन और धन से खादय सामग्री जुटाई और लोगों को भोजन कराया। यही नहीं कुछ लोगों ने तो आर्थिक धन भी मुहैया करा कर लोगों को संबल दिया। घर घर सब्जी नमक और तैयार भोजन भी प्रशासन द्वारा जांचे जाने के बाद घरों तक पहुंचाया गया। इनमें कई नाम ऐसे हैं जिन्होंने लीक से हटकर लोगों के लिए प्रयास किए। न केवल कोरोना योद्धाओं का ध्यान रखा बल्कि निर्धन और जरूरतमंदों के घरों की दहलीज तक पहुंच कर उनकों संसाधन मुहैया कराए। सांसद वरुण गांधी की तरफ से सांसद रसोई ने भी इसमें अहम योगदान दिया और लोगों के दुखदर्द को महसूस करते हुए अहम भूमिका अदा।

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