छोटे-बड़े देशी विदेशी प्राचीन व आधुनिक ताले और चाबियां को देख मंत्र मुग्ध हुए लोग
Orai News - उरई में एक विशेष ताला चाबी दीर्घा का उद्घाटन हुआ, जिसमें प्राचीन और आधुनिक ताले तथा चाबियां प्रदर्शित की गईं। इसमें जर्मनी, कंबोडिया और अन्य देशों के ताले शामिल हैं। डॉक्टर रेनू चंद्रा ने दीप प्रज्वलित किया और कहा कि यह संग्रह कला और संस्कृति का परिचय कराता है।
उरई। संवाददाता इन्टैक उरई अध्याय कानपुर बुंदेलखंड प्रान्त कला धरोहर समिति संस्कार भारती और भारत विकास परिषद स्वामी विवेकानंद शाखा उरई के संयुक्त तत्वावधान में ताला चाबी दीर्घा का उद्घाटन हुआ जिसमें तमाम आकार प्रकार के छोटे बड़े देसी विदेशी प्राचीन तथा आधुनिक ताले तथा चाबियां प्रदर्शित की गई है। दीर्घा में तारे के आकार का जर्मनी का , वीणा के आकार का, ड्रम के आकार का, गोल, चौकोर, आयताकार आदि देसी ताले बहुत सुंदर है। श्री गणेश लक्ष्मी ,श्री बुद्ध भगवान, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आकृति से युक्त पीतल के तालों के साथ-साथ लक्ष्मी वाहन उलूक, हाथी ,अश्व ,हिरण ,मत्स्य ,तथा कच्छप आकार के बड़े-बड़े पीतल के ताले अत्यंत मनमोहक रहे।

जनपद जालौन की वरिष्ठ महिला चिकित्सक डा रेनू चन्द्रा ने शंख ध्वनि के मध्य श्री गणेश जी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया। जिसमें जर्मनी व कंबोडिया सहित कई देशों के ताली चाबियां को देखकर आए हुए लोग मंत्र मुग्ध हो गए। इस दौरान हर देश के ताले चाबी की विशेषता के बारे में भी अहम जानकारी दी गई। डा रेनू चन्द्रा ने कहा कि इस दीर्घा में प्रदर्शित ताले एवं चाबियां अद्भुत है। ताला चाबी का ऐसा संग्रह वास्तव में दृष्टव्य है। यह दीर्घा हमें हमारी प्राचीन कला और संस्कृति से परिचित कराती है । इस दीर्घा में लोहे के बने साइकिल का ताला विभिन्न प्रकार के पैडलॉक्स आदि का प्रदर्शन भी किया गया है। इस अवसर पर डा हरीमोहन पुरवार ने बतलाया कि ताला और चाबियां का प्रयोग आज से 6000 साल से भी पहले किया जाता रहा है। प्राचीन मिस्र में लकड़ी के बने ताले चाबी होने के प्रमाण मिलते हैं। रोम में रोमन लोगों ने धातु के ताले व चाबियां बनाई। मध्यकाल में ताले और चाबियां का प्रयोग घरों ,मंदिरों तथा अन्य भवनों को सुरक्षित करने के लिए किया जाता था । पश्चिमी और पूर्वी दोनों ही देशों ने ताले और चाबी की अवधारणा को विकसित किया है। भाजपा की मन्जू रानी वर्मा ने कहा कि इस प्रकार की प्रदर्शनियों से बहुत सारी नई नई जानकारियां मिलतीं हैं जो कि बच्चों के मानसिक विकास को एक नई दिशा प्रदान करतीं हैं। इस दीर्घा में लगभग 300 से अधिक विभिन्न आकार प्रकार की छोटी बड़ी चाबियां भी प्रदर्शित की गई हैं। यहां लक्ष्मी जी की कुंजी ,बाटल ओपनर युक्त चाबी ,घड़ी युक्त चाबी आदि दीर्घा का विशेष आकर्षण रहीं है। इस दीर्घा में दीवार घड़ी की चाबी के साथ-साथ आज के लगभग 60 - 70 साल पूर्व संगीत का आनंद देने वाले ग्रामोफोन तथा उनकी चाबियों को भी इस दीर्घा में प्रदर्शित किया गया है। दीर्घा में प्रदर्शित समस्त सामग्री संध्या पुरवार व डॉक्टर हरीमोहन पुरवार के निजी संग्रह से प्रस्तुत की गई है । कार्यक्रम के प्रारम्भ में संध्या पुरवार तथा उषा सिंह निरंजन ने मुख्य अतिथि डा रेनू चन्द्रा को अंग वस्त्र उढाकर उनका स्वागत किया तथा अंत में डा हरीमोहन पुरवार ने स्मृति चिन्ह भेंट कर उनको सम्मानित किया। कार्यक्रम में प्रियन्का अग्रवाल, दर्श अग्रवाल, रश्मि प्रभा, राधेरमण पुरवार, राहुल पाटकर, मनीषा द्विवेदी सक्सेना, अनीता गुप्ता, काजल राजपूत, लाखन सिंह, राज बली सिंह, अखिलेश पुरवार, कविता पुरवार, अजय अग्रवाल, पुष्पा अग्रवाल, सुनीता राज, सन्तोषी गुप्ता, आदि की विशेष उपस्थिति रही। कंबोडिया, भूटान के साथ-साथ अपने भारत के पुराने तथा नए की रिंग्स भी प्रदर्शित उरई। दीर्घा में कुक आइलैंड देश द्वारा वर्ष 2018 में जारी पूर्ण राजतीय $10 मूल्य का एक चाबी छिद्र मुद्रा भी प्रदर्शित की गई है। पूरे विश्व हेतु इसके मात्र 777 नग ही बने हैं। अस्तु यह बडी दुर्लभ मुद्रा है। यह मुद्रा इस दीर्घा का विशेष आकर्षण का केंद्र रही है । दीर्घा में कंबोडिया, भूटान के साथ-साथ अपने भारत के पुराने तथा नए की रिंग्स भी प्रदर्शित किए गए हैं।

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