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रवि की लॉक बुक खोलेगी मौत के राज

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को चूमने का सपना लेकर इसे पूरा करने वाला एक जांबाज पर्वतारोही इस दुनिया से बहुत दूर चला गया, लेकिन उसकी मौत के कई सवाल अनसुलझे हुए हैं। जिनके जवाब रवि की लॉक बुक में छिपे हो सकते हैं। यह राज अप्पा साहब ने खोला। रवि के दिल में पर्वतारोहण की ख्वाहिश पैदा करने वाले पैराशूटर अप्पा साहब गुरुवार को उसकी अंत्येष्टि में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने रवि से जुड़े कई पहलुओं पर विस्तार से रोशनी डाली। तीन दिन पहले रवि के परिजनों से मिलने आईं दुनिया की सबसे पहली विकलांग महिला एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिन्हा की तरफ से रवि की मौत को लेकर उठाई गईं आशंकाओं पर अप्पा साहब ने अपनी मुहर लगाई। बताया कि दोपहर को जिस समय रवि ने एवरेस्ट की चोटी पर कदम रखा वह जिन्दगी के लिए सबसे खतरनाक समय होता है। उस समय पर एवरेस्ट फतह करने वालों के सुरक्षित लौट पाने की संभावना बहुत ही कम मानी जाती है। शेरपा इस वजह से उस समय पर एवरेस्ट की चोटी के लिए आगे बढ़ने ही नहीं देते। यह एक बड़ा सवाल है कि रवि के शेरपा ने उसे क्यों नहीं रोका? उसी दिन एवरेस्ट पर पहुंचने की क्या उसकी जिद थी? तमाम पर्वतारोहियों की तरह वह उस दिन वापस आकर अगले दिन भी जा सकता था। इन सबकी पड़ताल के लिए रवि की लॉक बुक की जांच होनी चाहिए। जिसमें मिशन के दौरान मिनट टू मिनट विवरण दर्ज किया जाता है। यह लॉक बुक निश्चित रूप से शेरपा के पास होगी। सुबह दस बजे के बाद ही एवरेस्ट पर मौसमी परिस्थितियां बेहद खराब हो जाती हैं। सोलह को आखिरी बार हुई थी रवि से बात अप्पा साहब ने बताया, रवि से मेरी मुलाकात वर्ष 2008 में मुंबई में हुई थी। रवि तीन सौ लोगों के स्काउट कैंप में वहां पहुंचा था। वहां उसने मेरा पैराशूटिंग का वीडियो देखा था। जिससे वह बहुत प्रभावित हुआ। तब से लेकर इस साल 16 मई तक मेरी और रवि के बीच हर हफ्ते फोन पर बात होती थी। कई बार वह रात को 12 बजे फोन करता था। सोलह मई को वह बहुत खुश था। बोला था, मैं अब एवरेस्ट को फतह किए बिना वापस लौटने वाला नहीं हूं। जीते जी नहीं खोल सका मोटिवेटर का राज रवि कुमार पर्वतारोही कैसे बना..किसने उसे इसकी प्रेरणा दी..हर कदम पर किसका सपोर्ट मिला...रवि इस बात को अब पर्दे में नहीं रखना चाहता था। अप्पा साहब ने कहा, कुछ समय पहले रवि ने मुझे अपने शहर के लोगों के बीच उपस्थित होने के लिए कहा था वह चाहता था कि सब लोग मेरे बारे में जान जाएं। लेकिन, मैंने उसे और इंतजार करने को कहा। मगर, रवि की मौत के बाद उसके मोटिवेटर का यह राज खुल गया। अप्पा के मुताबिक पर्वतारोहण में रवि के लिए टारगेट तय करने में गोपनीयता रखी जाती थी। क्योंकि, ऐसा नहीं करने पर लक्ष्य में कई दिक्कतें भी पैदा हो जाती हैं। एवरेस्ट नहीं था रवि का आखिरी टारगेट अप्पा साहब ने बताया कि रवि चार बड़ी चोटियां फतह कर चुका था। एवरेस्ट के बाद उसका लक्ष्य सेवन समिट यानि सात चोटियों का पैकेज पूरा कर लेने पर था। बाकी की दो चोटियां फतह करना उसका एवरेस्ट के बाद अगला लक्ष्य था। सात मई को रवि ने की थी वीडियो कॉल पर्वतारोहण में रवि कुमार के प्रेरक और गुरु अप्पा साहब ने सात मई को थाइलैंड में हुई अंतर्राष्ट्रीय पैराशूटिंग प्रतियोगिता में गोल्ड प्राप्त किया था। रवि को यह खबर मिली तो उसने सात मई को ही रात को अप्पा को व्हॉट्सएप से वीडियो कॉल करके उन्हें बधाई दी। मिशन से पहले पहुंचा था शिरडी, शनि धाम अप्पा साहब महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित जिस देबड़ाली प्रवरा गांव के रहने वाले हैं वह शिरडी और शनिदेव धाम से लगभग बराबर चालीस चालीस किलोमीटर की दूरी पर है। अप्पा ने बताया, मिशन एवरेस्ट के शुरू होने से पहले रवि मेरे यहां आया था और साईंबाबा और शनिदेव दोनों का आशीर्वाद लेने के लिए मेरे साथ उनके धाम गया था। रवि ने ढूंढ लिया था उस चिंगारी को वर्ष 2008 में मुंबई के स्काउट कैंप में अप्पा के जिस वीडियो को देखकर रवि उनसे प्रभावित हुआ वह वीडियो 12 हजार फिट ऊंचाई से 12 छलांग लगाने के प्रदर्शन का था जिसे उन्होंने दुबई में हुई प्रतियोगिता में करके दिखाया था। अप्पा ने बताया, रवि के उत्सुकता दिखाने पर मैंने उससे कहा था जिन्दगी में कामयाब होने के लिए हर किसी के अंदर कोई चिंगारी होती है उसे ढूंढो। जो चीज अच्छी लगती है और बार बार करने का मन करता है उसी को लक्ष्य बनाओ...तब उसने पहाड़ों में घूमने का शौक बताया था। मैंने उसी साल उसके सामने एवरेस्ट का टारगेट रख दिया ये कहते हुए कि छोटे छोटे टारगेट तो यूं ही हासिल हो जाएंगे। रवि ने अपने अंदर की चिंगारी को ढूंढा और एवरेस्ट फतह कर लिया, लेकिन दुर्भाग्य से वह इसकी खुशी नहीं मना सका। इक्कीस को रवि का बर्थडे यहां मनाएंगे अप्पा जिस तारीख को रवि की पार्थिव देह अग्नि को समर्पित हो गई उसके ठीक 20 दिन बाद उसका जन्मदिन है। अप्पा साहब ने बताया कि 21 जून को रवि का बर्थडे मनाने के लिए वह मुरादाबाद आएंगे। बीच बीच में उसके परिजनों को सपोर्ट देने के लिए भी मुरादाबाद आना होता रहेगा। अप्पा बोले, जिगर तो वहां भी होता है जहां खाने की कमी होती है इसलिए रवि जैसे जांबाज पर्वतारोही गरीब घर में भी पैदा हो सकते हैं। ऐसे पर्वतारोही को अपना सपना पूरा करने का पूरा हक बनता है। कोई उसे रोक नहीं सकता। अप्पा ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार पर्वतारोही को नौकरी भी देती है। रवि के किसी परिजन को सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए।

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  • Web Title:lock book book will open secret of Ravi's death