तो मीरा हर पद में बोलीं ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’
कोठीवाल नगर के गीता ज्ञान मंदिर में चल रही भक्तिमाल कथा में वृंदावन से आए कथा कविचंद्र दास ने भक्तिमती मीरा बाई के चरित्र पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि मीरा का जन्म सूर्य के तेज से हुआ था और कैसे वह पूर्व जन्म में माधवी नाम की गोपी थीं। अंततः, मीरा ने अपने प्रेम में गिरिधारी को अपना प्रभु माना।

कोठीवाल नगर स्थित गीता ज्ञान मंदिर में चल रही भक्तिमाल कथा में मंगलवार को वृंदावन से आए कथा कविचंद्र दास ने भक्तिमती मीरा बाई के चरित्र का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि मीरा के जन्म के समय उनके चेहरे पर सूर्य जैसा तेज था। इसलिए उनका नाम मिहिरा रखा गया। वही आगे चलकर मीरा हुआ। मीरा पूर्व जन्म में माधवी नाम की गोपी थीं, जिनका विवाह वृंदावन के गोप के साथ हुआ था। अपनी मां की हिदायत के अनुसार उसने श्री कृष्ण का तिरस्कार किया। मगर गोवर्धन धारण लीला के समय उसे विवश होकर गोवर्धन के नीचे जाना पड़ा। वहां श्री कृष्ण की अनोखी सुंदर मूरत को देखकर उसे अपने आप पर ग्लानि हुई और उसने अपने प्राण त्याग दिये।
अंतिम समय में गिरधारी की की छवि देखने के कारण मीरा अगले जन्म में गिरधारी की प्रेमिका बनीं। उसने अपने हर पद में लिखा...‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’।
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