Shardiy Navaratri fair in Vindhyachal tonight - विंध्याचल में शारदीय नवरात्र मेला भव्य आरती के साथ शुरू DA Image
21 फरवरी, 2020|10:45|IST

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विंध्याचल में शारदीय नवरात्र मेला भव्य आरती के साथ शुरू

शारदीय नवरात्र: मातारानी को रिझाने के लिए बेटे के रूप में पेश आएं

बुधवार से शुरू हो रहे नौ दिनी शारदीय नवरात्र कई मायने से अहम है। नवरात्र में मां दुर्गा के विविध रूपों की पूजा अर्चना के शुभ समय एवं विधानों का पालन करना भी जरूरी माना गया है। इन नौ दिनों में माता को मनाने के लिए खुद को बेटे के रूप में प्रस्तुत करना होगा। उनके लिए सलतम उपाय मां के लिए आदर के शब्द काफी माने गए हैं। आध्यात्मिक साहित्यकार सलिल पांडेय ने बताया कि जिस प्रकार हर व्यक्ति की मां अपनी संतान से भौतिक वस्तु की चाहत नहीं बल्कि अपनत्व एवं सहज व सरल व्यवहार की अपेक्षा रखती है। ठीक उसी प्रकार नवरात्र में पूजित होने वाली नौ देवियां भी अपने उपासकों से यही अपेक्षा रखती हैं। मन को शक्तिशाली बनाने के लिए सात्विक पूजा की जानी चाहिए। इसी से मां सबसे ज्यादा प्रशन्न होती है।

 

पूजा में कलश स्थापना का महत्व
10 अक्तूबर को नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त पूर्वाह्न 11.37 से दोपहर 12.33 तक है। इसके पूर्व चित्रा वैधृति योग है, जिसका शास्त्रों में निषेध है। इस प्रकार 10 अक्तूबर से शुरू होकर  18 अक्तूबर तक होगा। इसके बाद कुआरी कन्याओं का पूजन शुरू हो जाएगा। इसके बाद व्रत का परायण भी किया जाएगा। 

माता के आगमन का वाहन
इस बार नवरात्र में माता के आगमन में वाहन को दो तरह से देखा जा रहा है। शास्त्रीय विधानों से माता के आगमन को प्राण प्रतिष्ठित मन्दिरों, शक्तिपीठों में नहीं देखा जाता, क्योंकि यहां तो माता की शक्ति अधिष्ठापित ही है। इसके अलावा घरों में स्थापित होने वाली पूजा में भी मां के आगमन या वाहन को देखने का विधान नहीं है। यह तो अनुष्ठानिक कार्यक्त्रम हैं। यह जब भी होगा, दयालु माता दौड़ी चली आती हैं। वाहन पर ध्यान सामूहिक पूजा-पंडालों पर ही लागू होता है। ।। सप्तम्यो प्रात:-आनीया गृहमध्ये परपूजयेत, पूजा पंडाले  देवी स्थापना औदयिक सप्तम्यां देवी आगमनं।। इस श्लोक के अनुसार पंडालों में जो माता की प्रतिमा स्थापित की जाती हैं और वहाँ पूजा-आवाहन किया जाता है, वहीं आने के लिए मातारानी ) वाहन का प्रयोग करती हैं।

अश्व वाहन होगा
सप्तमी मंगलवार को है। अत: मां दुर्गा अश्व (तुरंग) पर बैठकर आएंगी। अश्व युद्ध में प्रयोग होता है। इसलिए अश्व पर बैठकर आने का मतलब युद्ध की संभावना को जन्म देता है। सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के बादल मंडराते रहेंगे। सप्तमी से वाहन की मान्यता शास्त्रीय भी है और बंगाल में इस पर ज्यादा मान्यता दी जाती है।

प्रथम दिन के हिसाब से
लोकाचार के हिसाब से प्रथम दिन के वाहन पर भी ध्यान देने की परंपरा का निर्वाह किया जाता है। इस हिसाब से माता रत्नजड़ित नौका से आएंगी। नौका जल में संचालित होता है ऐसे में इस बार जल से जुड़े होने के कारण वर्षा की अधिकता का आंकलन किया जा रहा है।

प्रस्थान ऐरावत हाथी से
माता का प्रस्थान 18 अक्तूबर गुरुवार को होगा । इस दिन के हिसाब से माता ऐरावत हाथी पर विदा होंगी जो शुभता का सूचक है। क्योंकि हाथी सनातन संस्कृति में शुभ माना जाता है। इसकी पूजा देवों में प्रथम पृज्य गणेश के रूप में होती है।

आध्यात्मिक साहित्यकार सलिल पांडेय ने बताया कि माता को प्रसन्न करने के लिए यद्यपि 'निर्मल मन' ही पर्याप्त है। लेकिन शास्त्रों के हिसाब से षोड्षोपचार पूजन भी करना चाहिए। माता को अलग-अलग दिनों मेंअलग -अलग वस्तुओं को समर्पित करने का भी विधान है। लेकिन पूजा के निमित्त सिंदूर, लौंग-इलायची, सुपारी, देशी गाय का घी जरूर खरीदकर प्रतिदिन इसे चढ़ाना चाहिए। प्रसाद के रूप में चढ़ाने के बाद इसका प्रयोग करना चाहिए। इसी घी से दीपक तथा हवन भी करना चाहिए ।

मातारानी को अलग-अलग दिनों में क्या चढ़ाएं 
प्रतिपदा यानी प्रथम दिन चंदन का तेल, त्रिफला, कंघी। द्वितीया को रेशमी वस्त्र। तृतीया को दर्पण,आलता व सिंदूर। चतुर्थी को दही, घी, मधु, चांदी की कोई वस्तु,काजल। पंचमी को आभूषण। षष्ठी को बिल्वपत्र। सप्तमी को पुस्तक अंतिम दिन तक देवी के समीप रखकर ज्ञान की कामना।  अष्टमी को मानसिक विकारों को खत्म करने का भाव भेंट करना चाहिए। नवमी को छत्र भेंट कर 2 से 10 वर्ष की कन्या का पूजन करें।

नौ दिन क्या भोग लगाएं 
प्रतिपदा यानी पहले दिन रोग मुक्ति के लिए देशी गाय का घी। द्वितीया को दीर्घायु के लिए चीनी। तृतीया को दु:खों से मुक्ति के लिए दूध। चतुर्थी को विपत्तियों से छुटकारे के लिए मॉलपुआ। पंचमी को बौद्धिक विकास के लिए केला । षष्ठी को सौंदर्य के लिए मधु। सप्तमी को शोकनाश के लिए गुड़। अष्टमी को संताप दूर के लिए नारियल। नवमी को सर्व विधि लाभ के लिए धान का लावा का भोग लगाएं ।

कैसे मातारानी दौड़ते आएंगी
'सर्व सौख्यकरीं देवी' के अनुसार पूजा का संकल्प लेते समय घर-परिवार के छोटे से छोटे बच्चे, भांजी-भांजे, भाई, बहन, माता-पिता, चाचा-चाची, घर के हर सदस्यों, अपने मित्रों, शुभचिंतकों, अपने वरिष्ठजनों, जिनसे आजीविका चलती है, उनके व अपने नियोक्ता, अपने यहां काम करने वाले श्रमिकों के उत्थान की कामना का भाव लाते ही देवी दौड़ी चली आती हैं। एकांगी पूजा में देवी नहीं आती हैं।

शारदीय नवरात्र में पाठ....
मां के नौ माह गर्भ में रहने के एवज में मां को मिले कष्ट के प्रति आभार व्यक्त करें । हर दिन व्रत न रहें तो कुछ चीजों से इस अवधि में परहेज जरूर करें, ताकि जीवन में परहेज की आदत बने।  वर्ष के प्रथम नवरात्र चैत्र में भगवान राम का जन्म होता है इसलिए इस नवरात्र में तो रामचरित मानस का पाठ किया जाता है। लेकिन शारदीय नवरात्र में चित्तवृत्ति और प्रवृत्ति की उच्चता के लिए श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाए। पाठ न हो पाने पर मां की कोई भी स्तुति करें क्योंकि मां सिर्फ स्तुति से रीझ जाती है। मां के लिए आदर के दो शब्द काफी होते हैं।

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