बोले मेरठ : सुविधाएं और संसाधन मिलें तो यहां से भी निकले भाभा और कलाम
Meerut News - मेरठ में आयोजित 23वें अखिल भारतीय विज्ञान मेले में बच्चों ने स्मार्ट हॉस्पिटल, स्मार्ट डस्टबिन, और मार्स रोवर जैसे प्रोजेक्ट पेश किए। ये मॉडल भविष्य की तकनीकी जरूरतों को दर्शाते हैं। बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए मार्गदर्शन और संसाधनों की आवश्यकता है, ताकि वे देश के विकास में योगदान कर सकें।
मेरठ। इनकी आंखों में बड़े-बड़े सपने हैं और आसमान को छू लेने की उम्मीद। छोटी सी उम्र में इन बाल वैज्ञानिकों ने सीमित संसाधन एवं सहयोग से भविष्य की जो उम्मीदें बुनी हैं, यकीन मानिए सुविधाएं और सटीक मार्गदर्शन मिलते ही इनमें से ही भविष्य के मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम निकलेंगे। देश के विभिन्न हिस्सों से सपनों की उड़ान लेकर मेरठ पहुंचे बाल वैज्ञानिकों ने स्मार्ट हॉस्पिटल, स्मार्ट डस्टबिन, सुरक्षित आर्मी बेस, दुश्मन देश को धूल चटाने के लिए ध्वंसक एक्स-6, मार्स रोवर, स्मार्ट डॉक्टर, ब्लाइंड स्टिक और बच्चियों को अपहरण से बचाने से स्मार्ट डिवाइस जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट बनाए हैं।

ये प्रोजेक्ट सुबूत है कि इनके बालमन में वैज्ञानिक बनने का बीजारोपण हो चुका है। जरूरत है बस इन्हें सुविधा, सहयोग एवं मार्गदर्शन की। विज्ञान का युग हमेशा से बदलाव और नवाचार का युग रहा है। लेकिन इस बदलाव को गति देने वाला असल में कोई बड़ा वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक छोटा-सा बच्चा ही होता है, जिसकी आंखों में सपने चमकते हैं और दिमाग में विचारों की उड़ान भरी होती है। बस उसे चाहिए एक मौका, एक मंच और थोड़ी-सी दिशा। अगर ये मिल जाए तो वही बच्चा देश को डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसा मिसाइल मैन भी दे सकता है और दुनिया को बड़े वैज्ञानिक भी। कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला सरस्वती शिशु मंदिर में आयोजित 23वें अखिल भारतीय विज्ञान मेले में, जहां देश के 11 क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा का ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। करीब 400 प्रतिभागियों ने अपने-अपने मॉडल प्रस्तुत किए और यह दिखा दिया कि अगर बच्चों को अवसर मिले तो उनका विज्ञान के प्रति रुझान देश को नई दिशा देने में पूरी तरह सक्षम है। हिन्दुस्तान बोले मेरठ टीम ने इन बच्चों के मॉडल्स के बारे में जाना और उनके भविष्य की प्लानिंग पर बात की। अगर उन्हें सुविधाएं मिलें तो वे एक बेहतर दुनिया बना सकते हैं। हर मॉडल में दिखी वैज्ञानिक सोच, दिखा भविष्य का वैज्ञानिक मेले में प्रस्तुत किए मॉडल सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे आने वाले समय की जरूरत को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। कहीं एआई टूल्स का उपयोग कर मॉडल तैयार किए गए, तो कहीं सेंसर आधारित प्रोजेक्ट ने तकनीक की समझ को दर्शाया। वहीं कुछ बच्चों ने मोबाइल एप्लिकेशन आधारित कमांडिंग प्रोसेस मॉडल प्रस्तुत कर यह साबित किया कि कम उम्र में भी तकनीक पर पकड़ मजबूत हो सकती है। इन मॉडल को देख महसूस हुआ कि बच्चों की सोच को अगर सही दिशा मिले तो यही छोटे-छोटे प्रयोग आगे चलकर देश को तकनीक की सबसे ऊंची सीढ़ियों पर ले जा सकते हैं। वैज्ञानिक सोच के लिए पहला और बड़ा मंच मौजूद अध्यापकों का कहना है कि यह मेला वैज्ञानिक सोच के लिए पहला मंच है। इस अखिल भारतीय विज्ञान मेले में देशभर से बच्चे आए हैं। इस प्रतियोगिता से बच्चों में वैज्ञानिक सोच डेवलप होगी, वहीं ये बच्चे अपनी प्रतिभा के अनुसार सरकारी योजनाओं का लाभ भी ले सकते हैं। अपने भविष्य को संवार सकेंगे। इस मेले का असली मकसद ही ये है कि किताबी नॉलेज की जगह उनमें प्रैक्टिकल नॉलेज विकसित हो। इनकी एजुकेशन ऐसी हो जिससे ये बच्चे रोजगार खोजने के बजाय दूसरों को दिशा देने वाले बनें। देश की प्रगति में अपनी भूमिका निभाएं। सपनों को चाहिए सहूलियत, राहें ना रह जाएं अधूरी अध्यापकों का कहना है कि अक्सर देखा गया है कि बच्चों में प्रतिभा बहुत होती है, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति, संसाधनों की कमी और सही मार्गदर्शन न मिल पाने के कारण वे पीछे रह जाते हैं। विज्ञान मेले में कई ऐसे बच्चे भी आए जिनकी आंखों में बड़े सपने हैं, अगर किन्हीं कारण उन्हें सुविधाएं नहीं मिलीं तो सपने दबकर रह जाएंगे। फिर भी उनका हौसला, उनकी कल्पनाशक्ति और विज्ञान के प्रति लगाव किसी भी बड़े वैज्ञानिक को प्रेरित कर सकता है। यही वजह है कि ऐसे मंच बच्चों को हिम्मत देते हैं और बताकर जाते हैं, ‘अगर मौका मिला, सुविधा मिली और सही दिशा मिली तो ये बच्चे देश का भविष्य बदल सकते हैं।’ आसपास की घटनाओं से प्रेरित होकर बनाए मॉडल मेले में छात्रों से उनके भविष्य को लेकर बातचीत की तो इनमें से कोई इंजीनियर बनना चाहता है, तो कोई प्रोफेसर बनकर बच्चों को शिक्षित करना चाहता है। कुछ छात्रों के मॉडल्स बनाने के पीछे आसपास घटित घटनाओं से प्रेरणा मिली। जिसको लेकर सोचा और समझा, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। राजस्थान का दसवीं में पढ़ने वाला छात्र कमल सिंह बताता है कि उनके पड़ोस में एक बुजुर्ग की मौत उनके अंधेपन के कारण हो गई। इसके बाद ऐसी डिवाइस बनाने की सोची जो नेत्रहीन लोगों के लिए जीवनदायनी साबित होगी। उसने एक सेंसर युक्त जूता, छड़ी और क्लैपिंग स्विच बनाकर तैयार किया। साथ एल्कोहल डिडेक्टर और जिंक रोबोट भी बनाया, जो मोबाइल एप्लीकेशन से काम करते हैं। ध्वसंक एक्स 6 की मिसाइल दुश्मन देश को सिखाएंगी सबक पश्चिम उत्तर प्रदेश से बीडीएसयूएम स्कूल के प्रदर्श तरुण में छात्र शानू कुमार ठाकुर ने ध्वसंक एक्स-6 नामक वर्किंग मॉडल बनाया। यह मॉडल उन्होंने हाल फिलहाल में पाकिस्तान से हो रहे अटैक को देखते हुए बनाया, जब कई तरह की मिसाइल व ड्रोन से घुसैपठ व हमले हो रहे थे। शानू बताते हैं कि दो से ढाई हजार इस मॉडल की पूरी कॉस्ट है। इसका नाम ध्वसंक एक्स-6 रखा है। यह ड्रोन की तरह काम करता है। साथ ही दो मिसाइल इसमें से निकलती हैं, जोकि तीसरी मंजिल तक धराशायी कर सकता है। दूसरे दिन विज्ञान मेले में नवाचार में ‘ध्वंसक एक्स-6’ ड्रोन आकर्षण का केंद्र रहा। एयरोस्पेस और एस्ट्रोनॉमी श्रेणी में प्रस्तुत किए इस प्रोजेक्ट ने दर्शकों और विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया। उनकी एक प्रर्दशनी में डीआरडीओ से आए जज ने भी सराहना की थी। मंगल ग्रह पर खोज करेगा 1.5 किलोग्राम का मार्स रोवर सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज बिजनौर के छात्र मौलिक मिश्रा ने मंगल ग्रह पर खोज करने के लिए मार्स रोवर मॉडल प्रस्तुत किया। जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। करीब 1.5 किलोग्राम वजन वाले इस रोवर को विशेष रूप से मंगल सतह की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है। मॉडल में डेटा भेजने और प्राप्त करने के लिए उच्च क्षमता वाली एंटीना लगाई है, जो अंतरिक्ष संचार की वास्तविक प्रणाली को दर्शाती है। रोवर के पहिए मजबूत ग्रिप वाले हैं, जिससे यह ऊबड़-खाबड़ और रेत जैसे भूभाग पर आसानी से चल सकें। अत्यधिक तापमान से बचाने के लिए इसमें एमएलआई (मल्टी लेयर इंसुलेशन) लगाया है, जो वास्तविक अंतरिक्ष उपकरणों में उपयोग होने वाली थर्मल प्रोटेक्शन तकनीक का प्रतीक है। मॉडल की विशेषताओं में हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरा, माइक्रो सेंसर, सोलर पैनल और बॉटल-टाइप ऊर्जा भंडारण प्रणाली शामिल है। पराली के समाधान का खोजा हल सीनियर वर्ग में दिशिका गुप्ता ने पराली के समाधान को खोजा है। उन्होंने बताया फसल कटाई के बाद खेतों में बचा तना, पत्तियां और अवशेष जिसे स्टबल या पराली कहा जाता है, भारतीय कृषि की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बन चुका है। धान और गेहूं की कटाई के बाद खेत में बचा यह हिस्सा किसानों को किसी प्रकार का लाभ नहीं देता, इसलिए अधिकतर स्थानों पर इसे जलाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। छात्रा के अनुसार स्टबल डेल्टा यानी पराली के वितरण और मात्रा का विश्लेषण यह समझने में मदद करता है कि किन क्षेत्रों में पराली प्रबंधन की सबसे अधिक आवश्यकता है। कृषि वैज्ञानिक आधुनिक उपकरण, बायो-डिकम्पोज़र और मशीनरी के माध्यम से समाधान की ओर प्रयास कर रहे हैं। छात्रा ने बताया कि इसका मैनेजमेंट तैयार किया है, किस तरह से इसको मैनेज किया जाएगा। बोले अध्यापक और छात्र इस मेले का मकसद ही बच्चों को किताबी नॉलेज की जगह प्रैक्टिकल होने के लिए है, यहां बच्चों की प्रतिभा सामने आती है। - राजकुमार त्यागी बच्चों के प्रोजेक्ट उनकी सोच और समझ को दर्शाते हैं, हमेशा बच्चों को प्रैक्टिकल होना चाहिए, उनके मॉडल्स गवाह हैं। - सुरेंद्र कुमार शर्मा बच्चों में वैज्ञानिक सोच डेवलप करने का यह एक बड़ा मंच है, जहां बच्चे अपनी शुरुआत करते हैं, ताकि आगे अच्छे अवसर मिलें। - डॉ. सोनिया अग्रवाल बच्चों में प्रतिभा तो होती है, लेकिन कई बार उनकी आर्थिक स्थिति, संसाधनों की कमी और सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। - शिल्पी गोयल इस मेले से बच्चों की प्रतिभा निखरेगी, जहां बच्चों ने एक से बढ़कर एक प्रोजेक्ट तैयार किए हैं, देश की प्रगति में बेहतर साबित होंगे। - अनीता सांगवान बच्चों का मार्गदर्शन करने में अध्यापक बड़ी भूमिका निभाता है, इसलिए अध्यापक उनकी जरूरत के हिसाब सहायता करें। - अंजलि अग्रवाल इस मेले में देशभर से प्रतिभागियों ने भाग लिया है, जिनके मॉडल्स वैज्ञानिक सोच और उनकी प्रतिभा को प्रदर्शित करते हैं। - आरती गुप्ता इस मेले में ऐसे बच्चे हैं जिन्होंने एआई आधारित तकनीक प्रयोग कर मॉडल तैयार किए हैं, जो कि नई दिशा देते हैं। - पूजा रस्तोगी बच्चों की सोच को अगर सही दिशा मिले, तो इनके ये प्रयोग आगे चलकर देश को तकनीक की सबसे ऊंची सीढ़ियों पर ले जा सकते हैं। - पूजा शर्मा बच्चों के मॉडल, इनके हौसले, इनकी कल्पनाशक्ति और विज्ञान के प्रति लगाव किसी भी बड़े वैज्ञानिक को प्रेरित कर सकता है। - अनिरुद्ध शर्मा ऐसे मंच बच्चों को हिम्मत देते हैं, अगर मौका मिला, सुविधा मिली और सही दिशा मिली तो ये बच्चे देश का भविष्य बदल सकते हैं। - प्रीति शर्मा बच्चों की वैज्ञानिक सोच को आकार देने के लिए स्कूलों का सहयोग, शिक्षकों की प्रेरणा और सरकार की योजनाओं का मिलना जरूरी है। - यशपाल सिंह यह विज्ञान मेला इस बात का प्रमाण है कि भारत के बच्चे प्रतिभा में किसी से कम नहीं, बस उन्हें उड़ान भरने के लिए पंखों की जरूरत है। - राजकुमार सिंह यह मेला वैज्ञानिक सोच विकसित करने के लिए पहला मंच है, इस मेले के माध्यम से बच्चों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे आगे बढ़ें। - कृष्ण कुमार शर्मा, प्रिंसिपल इस मेले और प्रतियोगिता के माध्यम से बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित होती है, भविष्य में क्या करना है और देश के लिए क्या करेंगे। - विनेश कुमार बच्चे बोले हमारे पड़ोस में एक नेत्रहीन वृद्ध की मौत हो गई थी, जिसके बाद मैंने यह जूता और छड़ी बनाए, जिससे एक नेत्रहीन व्यक्ति चल-फिर सकता है। - कमल सिंह, राजस्थान, पुष्कर यह एआई डस्टबिन है, जिसे एआई ट्रेसकैन नाम दिया गया है, जिसमें सेंसर लगा है और इमेज इस्टॉल की गई हैं, जो कूड़े को बिन में डाल देगा। - अदीदेव नारायण, केरल मैंने किडनैपिंग से बचाने के लिए डिवाइस बनाई है, जिसके जरिए महिला या बच्चे को किडनैपिंग से बचाया जा सकता है, इसके लिए मुझसे पुलिस अधिकारी भी मिले हैं। - राहुल कुमार चौधरी, छात्र, झारखंड सांस्कृतिक संध्या में दिखी ‘अनेकता में एकता’ की झलक मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित बालेराम ब्रजभूषण सरस्वती शिशु मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में चल रहे 23वें अखिल भारतीय विज्ञान मेले में शुक्रवार को विभिन्न स्कूलों के छात्र-छात्राओं ने प्रदर्शनी देखी। इसके साथ ही शाम के समय सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। सांस्कृतिक संध्या का शुभारंभ मुख्य अतिथि मेयर हरिकांत अहलूवालिया, कार्यक्रम अध्यक्ष अतुल गुप्ता निदेशक अपैक्स, मुख्य वक्ता पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल, विशिष्ट अतिथि धर्मेंद्र भारद्वाज, सदस्य विधान परिषद ने किया। मंचासीन अतिथियों का परिचय प्रधानाचार्य कृष्ण कुमार शर्मा ने किया। सर्वप्रथम विद्यालय की छात्राओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हरियाणवी नृत्य, गढ़वाली नृत्य, गुजराती नृत्य, राजस्थानी नृत्य, भोजपुरी नृत्य, पंजाबी नृत्य प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रमों में भारत में ‘अनेकता में एकता’ की झलक दिखाई दी। सभी कार्यक्रमों का देशभर से आए बाल वैज्ञानिकों ने भरपूर आनंद लिया। अतिथियों ने विचारों से सभी को प्रेरित किया। कमल किशोर सिन्हा अखिल भारतीय मंत्री, विद्या भारती ने कहा वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति की बढ़ती हुई स्थिति में सरस्वती शिशु मंदिर में भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने में सफल सिद्ध हुए हैं। संचालन अंजलि अग्रवाल ने किया। प्रांतीय संगठन मंत्री प्रदीप गुप्ता, प्रबंध समिति पदाधिकारी मनमोहन गुप्ता, डॉ. विनोद अग्रवाल, डॉ. आशीष अग्रवाल, डॉ. सुधांशु अग्रवाल, अरुण जिंदल, सीमा गोयल, गीता अग्रवाल, सीमा श्रीवास्तव आदि रहे।

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