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मेरठ का विद्रोह अंग्रेजों के लिए अप्रत्याशित था : डॉ. केके शर्मा

हिन्दुस्तान टीम,मेरठPublished By: Newswrap
Thu, 08 Jul 2021 04:01 AM
मेरठ का विद्रोह अंग्रेजों के लिए अप्रत्याशित था : डॉ. केके शर्मा

दस मई 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अप्रत्याशित नहीं बल्कि अंग्रेजों को निकालने के लिए सुनियोजित तरीके से किया गया था। हां, अंग्रेजों के लिए जरूर यह अप्रत्याशित विद्रोह था। यह विद्रोह भारतीय सिपाहियों के साथ आम आदमी का, ग्रामीणों का, मजदूरों और महिलाओं का था। यह बात बुधवार को चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कृष्णकांत शर्मा ने कही।

डॉ. केके शर्मा बुधवार को हेरिटेज सोसाइटी तथा डॉ. बीआर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय महू के संयुक्त तत्वावधान तथा राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय मेरठ की सहभागिता से आयोजित आजादी का अमृत महोत्सव के तहत मेरठ परिक्षेत्र के विशेष संदर्भ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने इस विद्रोह से जुड़े अनेक संदर्भों का उल्लेख करते हुए इस बात को सिरे से खारिज किया कि प्रथम विद्रोह अचानक हुआ था। उन्होंने सवाल किया कि यदि ऐसा था तो कारतूस चलाने से मना करने वाले सिपाहियों को छुड़ाने, जेल जलाने, तहसील कार्यालय जलाने के लिए मेरठ और आसपास के बड़ी संख्या में ग्रामीण एक साथ कहां से पहुंचे। उन्होंने कहा कि दस मई का दिन क्रांति दिवस का है न कि शहीद दिवस का दिन है। अंग्रेजी मानसिकता के अफसर दस मई को पहले शहीद दिवस लिखा करते थे, लेकिन लगातार विरोध के बाद क्रांति दिवस लिखा जाने लगा।

उन्होंने कहा कि इस प्रथम विद्रोह में सबसे पहले मारे जाने वाले अंग्रेजी अफसर का नाम था कर्नल फिनिश। इस विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन दहशत में आ गई थी। उन्होंने अनेक दृष्टांत सुनाएं, जिसमें यह बात तथ्यों के साथ स्थापित होती है कि मेरठ में दस मई को हुआ विद्रोह सुनियोजित था। वह बताते हैं कि सदर बाजार के पास ढोलकी मोहल्ला की नृत्यांगनाओं ने वहां से गुजरते हुए भारतीय सिपाहियों पर चूड़ियां फेंकी और ताने कसे। इसके बाद जो चिंगार फूटी जिसका विवरण भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में दर्ज है। उन्होंने कहा कि 90 भारतीय सैनिकों में 85 ने चर्बीयुक्त कारतूस को चलाने से मना कर दिया था। इन जांबाज सिपाहियों का कोर्ट मार्शल कर जेल में बंद कर दिया गया था। स्लाइड के माध्यम से अनेक अनछुए संदर्भों से परिचित कराया। राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय के संग्राहलयाध्यक्ष पतरु ने भी संग्रहालय की प्रदर्शनी एवं विशेषताओं पर वक्तव्य दिया। वेबिनार अध्यक्ष एवं ब्राउस के डीन प्रो. डीके वर्मा ने कहा कि इतिहास का लेखन वैज्ञानिक और तार्किक ढंग से नहीं लिखा गया है। अमृत महोत्सव के अवसर पर इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता को बताते हुए अनेक किताबों का संदर्भ दिया। उन्होंने कहा कि यह एक अवसर मिला है कि हम इतिहास में हुई गलतियों को सुधार कर लें। 1857 के विद्रोह के बारे में उन्होंने कहा कि हमें समझना होगा कि यह क्रांति का शंखनाद था। हेरिटेज सोसाइटी के महानिदेशक डॉ. अनंताशुतोष द्विवेदी ने कार्यक्रम की संकल्पना को प्रस्तुत करते हुए अतिथियों का स्वागत किया। संचालन हेरिटेज सोसाइटी के उत्तर प्रदेश मंडल की सदस्य डॉ. रत्ना सिंह ने किया। संयोजन डॉ. अजय दुबे ने किया। कुलपति प्रो. आशा शुक्ला के मार्गदर्शन में यह छठवीं साप्ताहिक संगोष्ठी थी। संगोष्ठी आयोजन में रजिस्ट्रार अजय वर्मा के साथ विश्वविद्यालय तथा हेरीटेज सोसाईटी परिवार का सहयोग रहा।

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