
बोले मेरठ: घटती हवा की गुणवत्ता घोंट रही दम, कैसे हो सांसों पर भार कम
संक्षेप: Meerut News - मेरठ में पिछले कुछ दिनों से वायु प्रदूषण ने गंभीर स्थिति ले ली है। पीएम-10 और पीएम-2.5 के स्तर खतरनाक 500 तक पहुँच गए हैं। लोग खांसी, सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। सरकारी अस्पतालों में सांस से संबंधित बीमारियों के मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
मेरठ। धुंधली से धूप, आसमान में छाई कालिख सी परत। सड़कों पर चलते वक्त सांसों में धूल जैसा अहसास। सुबह और देर शाम चारों तरफ पसरा धुआं सा। बाहर निकलो तो आंखों में जलन, खांसी और सांस लेने में परेशानी। बिना किसी कारण पिछले कुछ दिनों से लगातार खांसी जैसे हालात। शहर की आबोहवा में बिछी प्रदूषकों की मोटी परत से हर शख्स परेशान है। मेरठ के कोने-कोने में पीएम-10 एवं पीएम-2.5 जैसे खतरनाक प्रदूषकों के मुख्य स्रोत धूल-धुएं से शहरवासी बेहाल हैं। प्रदूषक अपने अधिकतम स्तर 500 तक बने हुए हैं। वह भी एक-दो घंटे नहीं। 24 घंटे में से 15-16 घंटे तक।

हवा की गुणवत्ता अत्यधिक खराब से गंभीर श्रेणी में बनी हुई है। जो हालात इस वक्त शहर के हैं उसमें सामान्य व्यक्ति के फेफड़ों से हर रोज 10-12 सिगरेट जितना धुआं जबरन घुस रहा है। नतीजा सामने है। मेडिकल से लेकर जिला अस्पताल और निजी चिकित्सकों के यहां सांस के मरीजों की लंबी लाइन है। हिन्दुस्तान बोले मेरठ टीम ने डॉक्टरों और मरीजों के साथ आमजन से संवाद कर इस समस्या का हल जानने का प्रयास किया। शहर की हवा अब जहर बन चुकी है। वह हवा, जो हमें जीवन देने के लिए है, अब धीरे-धीरे दम घोट रही है। पिछले दस दिनों से लगातार बढ़ते प्रदूषण ने लोगों की सांसों पर गहरा असर डाला है। सुबह की ठंडी बयार अब सुकून नहीं दे रही, बल्कि आंखों में चुभन और सांसों में भारीपन महसूस करा रही है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर कोई इस संकट से परेशान है। दीपावली के दस दिन बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पार कर चुका है। वायु गुणवत्ता सूचकांक एक्यूआई 300-400 के बीच तक पहुंच रहा है। सड़कों पर उठती धूल, वाहनों का धुआं, घर मकान बनाने में उठती धूल-मिट्टी, खेतों में पराली जलने की घटनाएं और जगह-जगह कूड़े में लगती आग, इन सबने मिलकर हवा को इतना जहरीला बना दिया है, कि हर सांस चुनौती बन गई है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ रिकॉर्ड तोड़ रही है। मेडिकल अस्पताल के संबंधित विभाग में डॉक्टरों के पास 12 बजे तक 300 से ज्यादा मरीज थे, जिनकी संख्या 600 को पार कर जाती है। कुल मिलाकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल, जिला अस्पताल, सीएचसी और पीएचसी पर 2000 से ज्यादा मरीज पहुंच रहे हैं। सबसे ज्यादा सांस में दिक्कत, खांसी, नजला-जुकाम, सीने में दर्द महसूस करने वाले मरीज शामिल हैं। मेडिकल कॉलेज या जिला अस्पताल में मरीजों की भीड़ से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने लोग हवा की गुणवत्ता बिगड़ने से परेशान हैं। हर तरफ धूल और धुएं का कहर बढ़ते एक्यूआई का मुख्य कारण सड़कों पर उड़ती धूल, जगह-जगह पड़े कूड़े के ढेरों में लगाई गई आग से उठता धुआं मुख्य कारण है। जो इस पूरे माहौल को जहरीला बना देता है। वाहन, कारखाने और निर्माण स्थलों से निकलने वाला प्रदूषण हवा में जहर के मिश्रण को और गाढ़ा कर देता है। यह सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि हर इंसान की जिंदगी की जंग बन चुकी है। आंखों में जलन, सिरदर्द, थकान और बेचैनी अब आम हो गई है। बच्चों की खांसी कम नहीं हो रही है, बुजुर्ग सुबह की सैर पर सांसों को भारी महसूस कर रहे हैं। बढ़ रहे हाई रिस्क ग्रुप के मरीज मेडिकल कॉलेज में डॉ. योगिता सिंह का कहना है कि हाई रिस्क ग्रुप के पेसेंट इस वक्त ज्यादा बढ़ गए हैं। जिनमें हार्ट, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), अस्थमा, टीबी रोगी शामिल होते हैं। सीओपीडी के मरीजों को फेफड़ों में इंफेक्शन और सांस लेने में समस्या होती है। इस वक्त जिस तरह वायु प्रदूषण बढ़ा है, उससे सांसों के मरीजों की संख्या बहुत बढ़ी है। दीपावली के बाद से प्रदूषण ज्यादा बढ़ा है, हवा की क्वालिटी सुधर नहीं रही है। इसलिए जिन घरों में बुजुर्ग हैं उनको एयर प्यूरिफायर का इस्तेमाल करना चाहिए। इस प्रदूषित हवा से सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत होती है। जिसका समाधान ही खुद के हाथों में होता है। सांसों पर बढ़ा संकट, प्रदूषण को किया जाए कम सरकारी अस्पतालों, सीएचसी और पीएचसी में सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। डॉक्टरों का कहना है कि पिछले कुछ दिनों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है और इलाज के लिए बच्चे-बुजुर्ग सभी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। युवक और बुजुर्ग मरीजों में से किसी को सांस लेने में दिक्कत हो रही है, तो किसी को लगातार खांसी और अस्थमा की परेशानी है। अस्पताल में मौजूद रामपाल ने बताया कि पहले तो सुबह टहलने निकल जाता था, लेकिन अब पांच मिनट भी बाहर खड़ा रहना मुश्किल है। सांस फूल जाती है, आंखों में जलन होती है। आज मेडिकल में दिखाने के लिए आया हूं। डॉक्टरों की चेतावनी, बरतें यह सावधानी डॉक्टरों का कहना है कि अब यह समस्या मौसमी नहीं रही, बल्कि सालभर रहने वाला खतरा बन चुकी है। मेरठ मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों का कहना है कि फिलहाल प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में है। जिन लोगों को दमा, एलर्जी या सांस की बीमारी है, उन्हें घर से बाहर निकलने से बचना चाहिए। मास्क पहनना, भांप लेना और पर्याप्त पानी पीना बेहद जरूरी है। इस वक्त सुबह घूमने से बचा जाए, ताकि खांसी और अस्थमा के मरीजों को दिक्कतें ना हों। डॉक्टरों की सलाह डॉक्टरों का कहना है कि इस समय सुबह के वक्त या देर रात बाहर निकलने से बचें। बच्चों और बुजुर्गों को मास्क पहनना चाहिए। पर्याप्त पानी पीएं, घरों के अंदर एयर-प्यूरीफाइंग पौधे रखें और पौष्टिक आहार लें ताकि रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत बनी रहे। समस्या - आजकल सड़कों पर चल रहे काम के कारण धूल मिट्टी उड़ रही है -आतिशबाजी भी एक कारक है। वैवाहिक समारोह में भी आतिशबाजी हो रही है। - बिल्डिंग बनाए जाने के दौरान धूल मिट्टी बहुत ज्यादा उड़ती है - इस मौसम में पराली जलाए जाने के कारण वायु प्रदूषण ज्यादा होता है - अस्पतालों में सांस से संबंधित बीमारियों वाले मरीज ज्यादा आ रहे हैं -सड़कों पर उड़ती धूल, प्रदूषण फैलाने वाले वाहन भी जिम्मेदार ---------- सुझाव - सड़कों और चौराहों पर छिड़काव कराया जाए ताकि धूल मिट्टी ना उड़े - शादी विवाह या समारोहों में आतिशबाजी सीमित हो - बिल्डिंग निर्माण के साथ ध्यान रखा जाए कि धूल ना उड़े - पराली और कूड़ा ना जलाया जाए, एनजीटी इस ओर ध्यान दे - बुजुर्ग और बच्चों को इस मौसम में मास्क लगाकर रहना चाहिए - शुद्ध हवा के लिए घरों में एयर प्यूरीफायर लगवाएं वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण - वाहनों का अत्यधिक धुआं : शहरों में बढ़ती गाड़ियों की संख्या ने हवा को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया है। - निर्माण कार्यों से उठती धूल : बिना रोक-टोक चल रहे निर्माण कार्यों से लगातार हवा में धूल के कण फैलते हैं। - कूड़ा जलाना : घरों और सड़कों के किनारे कूड़े में आग लगाने से जहरीली गैसें निकलती हैं। - धुआं : त्योहार, वैवाहिक समारोह, अधोमानक वाहनों से निकला धुआं हवा को प्रदूषित कर रहा है। - पेड़ों की कटाई : पेड़ों की संख्या घटने से हवा को शुद्ध करने वाला प्राकृतिक तंत्र कमजोर हो गया है। समाधान - पेड़ लगाएं, पेड़ बचाएं : हर घर, हर मोहल्ले में पेड़ लगाने की आदत डालें। - वाहनों का कम प्रयोग करें : छोटी दूरी पर साइकिल या पैदल चलें, साझा वाहन का उपयोग करें। - कूड़ा जलाना बंद करें : सूखा-गीला कूड़ा अलग-अलग रखें, नगर निगम के माध्यम से निस्तारण कराएं। - घर के अंदर हवा शुद्ध रखें : तुलसी, मनीप्लांट, एलोवेरा जैसे पौधे घर में लगाएं। प्रशासन, नगर निगम क्या करे -सड़कों पर पानी का छिड़काव हो -प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर सख्ती हो -ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली लागू की जाए -कूड़ा जलाना बंद हो -ट्रैफिक की बेहतर व्यवस्था हो, ताकि जाम न लगे दस दिन का एक्यूआई 26 अक्टूबर - 268 27 अक्टूबर - 270 28 अक्टूबर - 274 29 अक्टूबर - 312 30 अक्टूबर - 279 31 अक्टूबर - 193 1 नवंबर -326 2 नवंबर - 381 3 नवंबर - 376 04 नवंबर- 292 एक्यूआई स्थिति 0-50 अच्छी 51-100 संतोषजनक 101-200 मध्यम 201-300 खराब 301-400 अत्यधिक खराब 401-500 बेहद गंभीर नगर निगम और अन्य विभागों को दिए सख्त निर्देश प्रदूषण को लेकर नगर निगम और संबंधित विभागों को सख्त निर्देश दिए गए हैं। प्रदूषण वाले स्थलों के आसपास लगातार पानी का छिड़काव करने के निर्देश दिए हैं। वहीं कूड़ा जलाने और अन्य मामलों में सख्ती से कार्रवाई का निर्देश दिया है -डा.वीके सिंह, डीएम। इनका कहना है इस मौसम में दिल और सांसों की समस्या वाले मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। लोगों को खासकर बुजुर्गों को सावधानी बरतनी चाहिए। धुएं से दूरी रखें, पूरे कपड़े पहनें, मास्क लगाएं, समय से अपनी दवाइयां लें। पटाखों से उठने वाला धुआं फेफड़ों पर असर डालता है, इससे बचा जाए। - डॉ. योगिता सिंह कुछ दिन से धस्का बढ़ गया है, अचानक परेशानी होने लगी है, डॉक्टर को दिखाने आया हूं, एक्सरे भी कराया है। - आबिद छाती में दर्द सा रहता है, बलगम और खांसी ज्यादा हो गई है, हाल फिलहाल में अचानक ज्यादा समस्या हो रही है। - अयान

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