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14 दिसंबर, 2019|5:26|IST

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ग्‍लूटेन पैदा कर रहा लोगों में पेट की बीमारी : प्रो.आरबी सिंह

ग्‍लूटेन पैदा कर रहा लोगों में पेट की बीमारी : प्रो.आरबी सिंह

पूरी दुनिया में प्रोटीन और खाद्य आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा गेहूं से पूरा होता है, लेकिन इसमें मिलने वाला ग्लूटेन प्रोटीन पेट रोग का कारण बन रहा है। विश्व में 100-200 लोगों में एक व्यक्ति पेट रोग से ग्रस्त है। वह गेहूं से बने खाद्य पदार्थ नहीं खा सकता। पेट का रोग शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का ग्लूटेन प्रोटीन के प्रति तैयार हुई प्रतिक्रिया का परिणाम है। बावजूद इसके यह लोगों का प्रमुख खाद्य है। बढ़ती जनसंख्या के लिए गेहूं 20 फीसदी आहार कैलोरी की पूर्ति करता है। चीन के बाद भारत गेहूं उत्पादन में दूसरा विशालतम देश है।

चौ.चरण विवि के जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग विभाग में तीन दिवसीय सेमिनार के शुभारंभ में उक्त बात बतौर मुख्य वक्ता पद्म भूषण और वैज्ञानिक चयन आयेाग के पूर्व चेयरमैन प्रो.आरबी सिंह ने कही। उन्होंने वैज्ञानिकों से गेहूं से ऐसी प्रजाति विकसित करने पर जोर दिया जो पेट की बीमारियों से बचा सके। भाजपा चिकित्सा प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय सह संयोजक दिनेश उपाध्याय ने हर्बल गार्डन एवं हर्बल पौधों को लगाने को कहा। उन्होंने कहा कि आयुष और कृषि मंत्रालय मिलकर इसके प्रयास कर रहे हैं। इसमें ऐसे पौधे उगाए जाएं जो प्रोटीन और खनिज की पूर्ति करने के साथ ही उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाएं।

एडवांसिंग वीट टेक्नोलॉजी कनाडा के वैज्ञानिक सलाहकार रॉन एमडी पॉव ने कहा कि उन्होंने गेहूं की 69 और 6 टिटिकैल प्रजाति विकसित की है। इन प्रजाति से कम जगह में अधिक फसल उगाई जा सकती है। पॉव ने कहा कि जीन्स में बदलाव करके अधिक उत्पादन क्षमता को विकसित किया जा सकता है। पॉव के अनुसार वे ऐसे जीन्स खोजने में जुटे हैं जिससे लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जा सके। उन्होंने कहा कि गेहूं की नई प्रजाजियों के रिसर्च में भारत का विशेष स्थान है। दुनियाभर में भारतीय कृषि वैज्ञानिकों के इस प्रयास को सराहा भी जाता है। कुलपति प्रो.एनके तनेजा ने कहा कि गेहूं पूरी दुनिया में खाद्य आपूर्ति करता है। आज जिस तरह से मिट्टी की गिरती उर्वरता, कम होती उपजाऊ भूमि, बढ़ती जनसंख्या, घटते जल स्रोत की चुनौतियां पूरी दूनिया के सामने है, उमसें हमें ऐसी प्रजातियों को विकसित करने की जरुरत है जो लोगों को पोषक तत्वों के साथ खाद्य आपूर्ति कर सके।

प्रो.तनेजा ने कहा कि भारत में 50 फीसदी जनसंख्या प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुडी है। ऐसे में इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। प्रोवीसी प्रो.वाई विमला ने जेनेटिक रिसोर्सेज के महत्व और जीन बैंक के प्रयोग को महत्वपूर्ण बताया। डीएसडब्ल्यू प्रो.जितेंद्र ढाका ने जेनेटिक इंजीनियरिंग एवं जिनोमिक्स साइंस के बारे में बताया। प्रो.पीके शर्मा ने गेहूं की प्रजातियों के सुधार को समय की जरुरत बताया। सेमिनार में प्रो.एसएस गौरव, एके सिंह, जारोसलव डोलेजल, कुलविंद्र सिंह, पेंटल, प्रबोध त्रिवेदी, प्रो.वीरपाल, प्रो.जयमाला, प्रो.एके चौबे, प्रो.शिवराज पुंडीर, डॉ.एचएस बालियान, डॉ.अशोक कुमार सहित सभी शिक्षक एवं स्टूडेंट मौजूद रहे।

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