मेरठ : गन्ने की खोई मिटाएगी चेहरे की झुर्रियां
Meerut News - किसानों की पसंदीदा फसल गन्ना अब उद्योगों में भी उपयोग होगा। चौ. चरण सिंह विवि के प्रोफेसर ने गन्ने की खोई से लैक्टिक अम्ल बनाने की नई विधि विकसित की है, जिसे पेटेंट मिला है। यह प्रक्रिया कृषि अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग करती है और औद्योगिक स्तर पर विस्तार योग्य है।

किसानों की पसंदीदा फसल में शुमार गन्ना अब उद्योगों की झोली भी भरेगा। गन्ने की प्रोसेसिंग के बाद निकली खोई से अब बेहद आसान तरीके से लैक्टिक अम्ल बन सकेगा। चौ. चरण सिंह विवि के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. आरके सोनी और डॉ. मनीषा भारद्वाज ने गन्ने की खोई से लैक्टिल अम्ल बनाने की सरल एवं प्रभावी प्रक्रिया विकसित की है। लैक्टिक अम्ल की इस विधि को पेटेंट मिल गया है। विवि जल्द ही इस विधि के इंडस्ट्री ट्रांसफर की प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। लैक्टिक अम्ल बेहद महत्वपूर्ण रसायन है और इसका उपयोग खाद्य, औषधि, सौंदर्य प्रसाधन और जैव अपघटनीय प्लास्टिक (पीएलए) निर्माण में होता है।
त्वचा की देखभाल के लिए तैयार होने वाले उत्पादों में लैक्टिक अम्ल सर्वाधिक प्रयुक्त होता है। यानी गन्ने की खोई से मिला लैक्टिक अम्ल चेहरे की झुर्रियां भी मिटाएगा। इनोवेशन के यह हैं उद्देश्य- गन्ने की खोई और इस जैसे कृषि अपशिष्ट से लैक्टिक अम्ल का उत्पादन- सरल एवं समय की बचत करने की प्रक्रिया विकसित करना- उत्पादन लागत कम करना और उच्च उपज प्राप्त करना- प्रयुक्त एंजाइम की पुन: प्राप्ति द्वारा प्रक्रिया को अधिक किफायती बनानाइस विधि से ऐसे बनेगा लैक्टिक अम्लप्रो. आरके सोनी एवं डॉ. मनीषा भारद्वाज के अनुसार उक्त विधि में गन्ने की खोई (बगास) को धोकर सुखाया जाता है। फिर से इसे छोटे-छोटे कणों में पीसकर अमोनिया एवं सल्फ्यूरिक अम्ल से उपचाारित किया जाता है। इस प्रक्रिया से लिग्निन हट जाता है और सेल्यूलॉज टूटने योग्य बनता है। दूसरा चरण एंजाइमिक हाइड्रोलिसिस है। इसमें सेल्युलेज एवं जाइलानेज एंजाइम का उपयोग होता है। इससे जटिल कार्बोहाइड्रेट सरल शर्करा में बदल जाती है। तीसरा चरण किण्वन (फरमेंटेशन) का है और इसमें लैक्टोबेसिलस लैक्टिस सूक्ष्मजीव का उपयोग करके शर्करा को लैक्टिक में बदला जाता है। यह प्रक्रिया नियंत्रित पीएच एवं तापमान पर 72 घंटे तक चलती है। प्रयुक्त एंजाइम को पुन: प्राप्त कर अगली प्रक्रिया में उपयोग किया जाता है जिससे लागत कम होती है। नई प्रक्रिया के लाभ- कृषि अपशिष्ट का प्रभावी उपयोग- कम लागत वाली उत्पादन प्रक्रिया- उच्च दक्षता एवं ज्यादा उपज- पर्यावरण अनुकूल तकनीक- औद्योगिक स्तर पर विस्तार योग्य- जैव अपघटनीय प्लास्टिक उत्पादन में सहायक
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