
बोले मेरठ : बाढ़-बारिश ने छीना काम, अबकी फीकी न रह जाए हमारी दीपावली
Meerut News - इस बार की बारिश और बाढ़ ने मेरठ में दिहाड़ी मजदूरों की जिंदगी को प्रभावित किया है। काम की कमी और सरकारी योजनाओं का लाभ न मिल पाने के कारण मजदूर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। दीपावली का त्योहार...
इस बार पहाड़ों पर हुई बारिश ने भारी तबाही मचाई। बाढ़ के सैलाब ने मैदानों को भी चपेट में ले लिया। इस आपदा का सबसे ज्यादा असर दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा। बारिश ने उद्योग-धंधों के साथ ही निर्माण कार्यों पर असर डाला। इसके अलावा फैक्ट्रियों में बदल रहे काम के स्वरूप के चलते भी मजदूरों को काम मिलना कम हो गया। शहर में लेबर अड्डों पर रोजाना हजारों की संख्या में मजदूर इस उम्मीद से आते हैं कि आज तो काम मिल जाएगा लेकिन शाम होते-होते निराशा हाथ लगती है। अब तो उन्हें लगने लगा है कि पैसे के अभाव में उनकी इस बार की दीपावली फीकी न रह जाए।

मेरठ शहर के 4 बड़े लेबर अड्डे, शास्त्री नगर के-ब्लॉक, बेगमपुल चौराहा, जेल चुंगी चौराहा और बागपत अड्डा। यहां पूरे मेरठ और बाहर के दस हजार से अधिक मजदूर रोज दिहाड़ी मजदूरी के लिए आते हैं। बहुत सारे मजदूर ऐसे हैं, जो बाढ़ ग्रस्त इलाकों से आते हैं, जिनको बाढ़ और बारिश ने तो परेशान किया ही है, अब मजदूरी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। हिन्दुस्तान बोले मेरठ टीम लेबर अड्डों पर मजदूरों का हाल जानने पहुंची। जहां बाइक रुकते ही दर्जनों मजदूर की भीड़ दौड़ पड़ी। इन सभी की आंखों में एक उम्मीद सी थी, कि शायद काम मिलेगा। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि बार-बार देखने को मिलता रहा। जब भी कोई बाइक या कार वहां आकर रुकती तो मजदूरों की भीड़ उस तरफ दौड़ पड़ती। कुछ तो बाइक पर ही जाकर बैठ जाते और कहते चलो साहब कहां चलना है। कितने मजदूर और चाहिएं बताओ, हम चलते हैं। फिर मोलभाव और आखिर में जरूरत के हिसाब से मजदूर जाते। मजदूरों का कहना है कि बरसात और ठंड में लोग मकान बनाने या फिर पुताई का काम बहुत कम कराते हैं। दीपावली के त्योहार से पहले जहां सबसे ज्यादा काम रंगाई और पुताई का होता है, वह भी कम है। ऊपर से सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। मजदूरी के पेशे में 'प्रोफेशनल्स' की एंट्री, बढ़ी मुश्किलें लेबर अड्डे पर खड़े मजदूरों में कुछ रंगाई-पुताई करने वाले भी शामिल थे, इनका कहना है कि आजकल बड़े घरों या बिल्डिंग में काम के लिए सीधे पेंट कंपनी से कॉन्टेक्ट किया जाता है। वहां पर ट्रेंड लड़के रहते हैं, जो मशीनों के द्वारा रंगाई-पुताई करते हैं। कई बार बरसात और ठंड के मौसम में काम कम हो जाता है, जब मजदूरों को दूसरी जगह काम खोजना पड़ता है। ऐसे में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोगों का काम पिट गया है, जो रोज लेबर अड्डे पर पहुंचते हैं, लेकिन काम नहीं मिलने से निराश होकर लौट जाते हैं। लोगों को चाहिए जल्दी और बेहतर काम मजदूर बताते हैं, कि अब लोगों को समय की बचत के साथ बढ़िया काम चाहिए। इसके लिए सीधे कंपनियों या बड़े ठेकेदारों से संपर्क किया जाता है। उनके पास मौजूद ट्रेंड लड़कों को प्राथमिकता मिलती है। ग्राहक को रंगों का आकर्षक कॉम्बिनेशन चाहिए, बढ़िया फिनिशिंग चाहिए और समय की बचत भी। ऐसे में दिहाड़ी मजदूर पिछड़ रहे हैं। उनके पास अनुभव तो है, लेकिन आधुनिक तकनीक नहीं। नतीजा ये होता है कि जिनके हाथ में कभी ब्रश और रोलर होता था, वे अब काम की तलाश में खड़े हैं। लंबा इंतजार करने के बाद भी जब काम नहीं मिलता तो कम मजदूरी पर भी काम करने को तैयार रहते हैं, लेकिन खाली हाथ लौटना पड़ता है। बाढ़ बारिश की मार के बाद काम की चिंता मजदूरों का कहना है कि बहुत सारे लोग तो खादर इलाके से यहां मजदूरी के लिए आते हैं। इस बार बारिश बहुत हुई और खेत भी सभी पानी में डूब गए। जिससे ना तो खेतों में काम मिला, ना ही सरकारी काम मिला और शहर में भी काम नहीं मिल पाया। इस बार बारिश के कारण मजदूरी बहुत कम रही। लोगों को अपने घर भी चलाने मुश्किल हो गए। गांव में काम नहीं बचा और इधर शहर में काम मिल नहीं रहा। रोज शहर में आते हैं, घंटो खड़े रहते हैं, लौट जाते हैं। त्योहार सिर पर हैं और मजदूरी मिल नहीं रही है। यहां अपने वाले आधे मजदूरों को भी काम नहीं मिल पाता है। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं, मजदूरी है नहीं मजदूरों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच रहा है। बहुत लोगों को तो यही नहीं पता कि कोई योजना है भी या नहीं। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने श्रम कार्ड भी बनवा रखा है, रजिस्ट्रेशन भी करवा रखा है, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। दीपावली पर जहां अमीर लोग अपने घरों को सजाने में जुटे हैं, वहीं हम मजदूर सोच रहे हैं, कि घर में चूल्हा कैसे जलेगा। बच्चों को नए कपड़े तो दूर की बात है, मिठाई तक खरीदना मुश्किल हो जाएगा। इन अड्डों पर खड़े हर मजदूर की अपनी एक कहानी है, किसी के घर में बीमार लोग हैं, किसी के बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, कोई किराया नहीं दे पा रहा, तो किसी के पास पहनने के लिए सही कपड़े नहीं हैं। ऐसे में दीपावली का त्योहार कैसे मनेगा, बस यही चिंता सता रही है। कम पैसे में भी काम करने को हो जाते हैं तैयार मजदूरों का कहना है, कि जैसे-जैसे समय बीतता रहता है काम मिलने की उम्मीद भी कम होती जाती है। अब तो दिन भी छोटा होने लगा है, ऐसे में काम और भी कम मिलता है। कई बार तो दस बजे के बाद कम पैसे में भी काम करने के लिए तैयार हो जाते हैं। जहां पांच सौ या हजार रुपये मजदूरी मिलती है लोग तीन सौ या सात सौ रुपये में भी काम करने को राजी रहते हैं। इसके बाद भी जब काम नहीं मिलता है तो वापस निराश होकर लौट जाते हैं। बस सबसे बड़ी समस्या तब आती है जब बच्चों के लिए जेब में कुछ नहीं होता। काम मिलता है तो अच्छा भी लगता है। डीलर नहीं देता पूरा राशन, केवाईसी के नाम पर लूट मजदूरों का कहना है कि एक तो हमें काम नहीं मिल पाता, ऊपर से डीलर राशन पूरा नहीं दे रहा है। हर यूनिट पर कम राशन दिया जा रहा है। वहीं लोगों के घरों में सदस्यों के नाम ही काट दिए हैं। केवाईसी के नाम पर पैसे लिए जा रहे हैं। अगर नाम जुड़वाना है तो उसके अगल से पैसे मांगे जा रहे हैं। कैसे काम चलेगा, जब मजदूरी है नहीं और राशन भी पूरा नहीं मिल पा रहा है। राशन डीलर को पैसे दे दो तो वह केवाईसी भी पूरी कर देता है और यूनिट भी जुड़ जाती हैं। राशन के लिए बहुत सारे गरीब लोग भटकते रहते हैं, लेकिन डीलरों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। गांवों में राशन डीलरों ने हद कर रखी है। किसी पर कोई कार्रवाई भी नहीं होती, बस पिसता है तो मजदूर और गरीब आदमी। समस्याएं - काम नहीं मिलने से दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल होता है - इस बार बारिश और बाढ़ के कारण भी लोग परेशान रहे हैं - बारिश के कारण गांवों से लेकर शहर तक काम की दिक्कत रही - शहर में काम मिल नहीं रहा है और गांवों में खेतीबाड़ी है नहीं - राशन भी पूरा नहीं मिल रहा, केवाईसी के नाम पर पैसे ले रहे हैं सुझाव - मजदूरों को शहर और गांव में अस्थायी काम मिलना चाहिए - मुफ्त राशन व सामुदायिक भोजनालय की व्यवस्था की जाए - जिले में सभी मजदूरों को योजनाओं के तहत लाभ दिया जाए - गांवों में राशन देने में गड़बड़ी करने वाले डीलरों पर कार्रवाई हो - मजदूरों से केवाईसी के नाम पर पैसे लेने वालों पर कार्रवाई हो हमारी भी सुनो बारिश इस बार ज्यादा रही थी, इसलिए लोगों को काम भी बहुत कम मिला, अब सर्दी में भी काम कम हो जाता है। - दर्शन दीवाली का त्योहार सिर पर है, हमें कई बार काम नहीं मिलता, खाली हाथ घर लौटना पड़ता है, काम मिले तो अच्छा लगता है। - सतीश एक तो काम नहीं मिलता, ऊपर से डीलर राशन भी पूरा नहीं देता है, यूनिट ही काट दी हैं और केवाईसी के नाम पर पैसे मांगते हैं। - कुंवरपाल सरकारी योजना का कोई लाभ मजदूरों को नहीं मिलता है, श्रम कार्ड होने के बाद भी आजतक कुछ नहीं मिला, काम भी नहीं मिलता। - गुलाब सिंह बारिश के मौसम में वैसे ही काम नहीं होता, अब त्योहार भी सिर पर हैं, लेकिन काम नहीं लगता तो परेशानी होती है। - धर्मपाल कई बार तो लोग दिनभर खड़े होकर चले जाते हैं, दिहाड़ी भी नहीं मिलती, देर होने पर लोग कम मजदूरी में भी काम करते हैं। - जॉनी आजकल बड़े ठेकेदारों के पास होता है, यहां बहुत कम लोगों को काम मिलता है, दिनभर इंतजार करते रहते हैं। - संजीव कुमार दीवाली से पहले लोग काम कराते हैं, बहुत से लोग तो रंगाई-पुताई के लिए सीधे कंपनी से ही करवा लेते हैं, या ठेकेदारों से करवाते हैं। - प्रमोद कई बार काम मिलने की बड़ी दिक्कत रहती है, पूरे दिन खड़े रहते हैं और जब काम नहीं मिलता तो वापस लौट जाते हैं। - शिवपूजन आजकल दिहाड़ी मजदूरों से लोग कम काम कराते हैं, ठेकेदारों को ठेका दे देते हैं, उनको मजदूरों की जरूरत होती है ले जाते हैं। - सुनील हम लोग तो ठेकेदार के अंडर काम करते हैं, वही हमें काम की व्यवस्था करता है, कई बार काम नहीं भी होता है, यह सबके साथ है। - आजाद इस बार तो बारिश और बाढ़ ने लोगों का काम कम कर दिया, फिर भी हम लोग ठेकेदार के साथ मिलकर काम करते हैं। - टीटू बारिश और बाढ़ के कारण लोगों को इस बार बहुत परेशानी हुई है, लोगों को गांव में भी काम नहीं मिलता और शहर में भी नहीं। - आबिद मियां जरूरी नहीं कि काम रोज ही मिले, लोगों को बहुत-बहुत दिनों तक काम नहीं मिलता है, त्योहारी सीजन में भी काम नहीं मिलता है। - आफताब ज्यादातर लोग बड़ा काम तो ठेकेदारों से ही कराते हैं, रंगाई-पुताई का काम भी कंपनियों के लोगों से कराते हैं, बहुत परेशानी होती है। - रिजयाजुद्दीन

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