परिवार दिवस विशेष: अपने हुए पराए, आश्रम में बिता रहे जिंदगी का आखरी पड़ाव
माता-पिता अपने बच्चों को संघर्ष करके पालते हैं, लेकिन जब बच्चे बड़े होते हैं, तो वे माता-पिता को भूल जाते हैं। गंगानगर डिवाइडर रोड स्थित दादा-दादी वृद्धजन निवास आश्रम में 35 बुजुर्ग रह रहे हैं, जिनकी देखभाल उनके परिवार नहीं करते। यह स्थिति संपत्ति के लालच की वजह से और भी गंभीर हो गई है।

माता-पिता अपने बच्चों को अपनी हैसियत से बढ़कर संघर्ष करते हुए पाल-पोश कर बड़ा करते हैं। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब वह माता-पिता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भूलकर उन्हें दरकिनार करने लगते हैं। अब सामान्यत: परिवार सिंगल होता जा रहा है। पति-पत्नी और बच्चे। अब यही परिवार होने लगा है।
आश्रय की स्थिति
गंगानगर डिवाइडर रोड स्थित दादा-दादी वृद्धजन निवास आश्रम पिछले दस वर्षों से संचालित है। यहां अपनों की बेरूखी का शिकार हुए बुजुर्ग अपने जीवन का आखरी पड़ाव बेबसी के साथ जी रहे हैं। आश्रम की संचालिका नम्रता शर्मा ने बताया कि वर्तमान समय में 35 बुजुर्ग महिला और पुरूष रह रहे हैं, जिसमें प्रयागराज, बेगुसराय, गया, अयोध्या, बिहार, बुलंदशहर समेत अन्य जगहों के बुजुर्ग शामिल हैं। पिछले दस वर्षों में सिर्फ एक या दो ही बुजुर्ग आश्रम में ऐसे आए, जिन्हें परिवार के लोग बाद में घर वापस लेकर चले गए।
बुजुर्गों की अनदेखी
जिन बच्चों को जिंदगी में बड़े से बड़ा संघर्ष करके पाला, वह आश्रम में रह रहे बुजुर्गों की सुध तक नहीं लेते हैं। जिसके चलते उनकी मौत के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी आश्रम द्वारा की जाती है। अगर परिजनों को अपने माता-पिता की मौत की सूचना मिल भी जाती है तो वह कहते हैं कि उनके पास समय नहीं है।
संपत्ति का लालच
इसके बाद संपत्ति के लालच में आश्रम में पहुंचकर बुजुर्गों के मृत्यु प्रमाण-पत्र की मांग करते हैं। संचालिका नम्रता शर्मा ने बताया कि आश्रम में परिवार की तरह की सभी बुजुर्ग अपना जीवन बीता रहे हैं। परिवार के लोग बुजुर्ग माता-पिता को खुद छोड़कर जाते हैं फिर इसके बाद कभी उनके हाल-चाल तक नहीं पूछते हैं।
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