
बोले मेरठ: मेरठ को मिले एम्स तो क्यों भागें दिल्ली
Meerut News - मेरठ का एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज मरीजों की संख्या में वृद्धि के साथ विकसित हो रहा है। यहां बेहतर चिकित्सा सुविधाएं हैं, लेकिन लोग गंभीर बीमारियों के लिए दिल्ली जाने को मजबूर हैं। डॉक्टरों और जनता की मांग है कि इस मेडिकल कॉलेज को एम्स का दर्जा दिया जाए, जिससे स्थानीय मरीजों को राहत मिलेगी।
मेरठ में एलएलआरएम मेडिलक कॉलेज अच्छे खासे क्षेत्र में फैला हुआ है। जहां रोज हजारों की संख्या में मरीज आते हैं। बेहतर जांचों का इंतजाम, ट्रॉमा सेंटर, विशेष वार्ड भी यहां मौजूद हैं। वहीं मेडिकल कॉलेज को एम्स (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) की तर्ज पर विकसित भी किया जा रहा है। कई बार इसको एम्स का दर्जा दिए जाने और उसी आधार पर बिल्डिंग व वार्ड विकसित करने के लिए प्रस्ताव भी भेजा जा चुका है। ऐसे में डॉक्टर्स और आम जनता का कहना है कि अगर यहां भी एम्स बन जाएगा तो लोगों को दिल्ली नहीं भागना पड़ेगा।
इसलिए मेडिकल कॉलेज को भी एम्स का दर्जा मिले और तैयार किया जाए, ताकि आसपास के जिले से आने वाले लोगों को दिल्ली या अन्य एम्स ना जाना पड़े। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा शहर मेरठ, जहां उम्मीदें भी हैं और इंतज़ार भी। हर रोज़ एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज की दहलीज पर दर्द, भरोसा और जीवन की आस लेकर हज़ारों लोग पहुंचते हैं। कोई गांव से आता है, कोई कस्बे से, तो कोई शहर के दूरदराज़ इलाके से। सबकी आंखों में एक ही सवाल, क्या यहीं इलाज मिल जाएगा, या फिर दिल्ली भागना पड़ेगा? करीब 150 एकड़ में फैला एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज अपने आप में एक विशाल चिकित्सा परिसर है। यहां रोज़ाना 3000 से अधिक मरीज ओपीडी में आते हैं। एमबीबीएस की 150 सीटें, 1000 से ज्यादा बेड, 100 बेड का ट्रॉमा सेंटर और 30 बेड का मेटरनिटी वार्ड, ये आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उस भरोसे की तस्वीर हैं, जो जनता इस संस्थान पर करती है। यहां बेहतर जांच की सुविधाएं हैं, विशेष वार्ड हैं, और गंभीर मरीजों के लिए ट्रॉमा के इंतज़ाम भी हैं। फिर सवाल उठता है, जब बुनियाद इतनी मजबूत है, तो मेरठ को एम्स क्यों नहीं? आज भी सच्चाई यह है कि कैंसर, हृदय रोग, न्यूरोलॉजी, जटिल सर्जरी या उच्चस्तरीय इलाज के नाम पर मरीजों को दिल्ली एम्स या दूसरे बड़े शहरों की ओर दौड़ना पड़ता है। यह दौड़ सिर्फ दूरी की नहीं होती, यह दौड़ होती है पैसे, समय और जिंदगी की। एंबुलेंस में तड़पता मरीज, साथ बैठा घबराया परिवार, और मन में डर, कहीं देर न हो जाए…। ऐसे में अगर एम्स की सुविधा मेरठ में ही मिल जाए तो हजारों लोगों को राहत मिल जाए। इस संबंध में हिन्दुस्तान बोले मेरठ टीम ने एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और डॉक्टर्स से संवाद कर इस संबंध में राय जानी। डॉक्टरों और आम लोगों की एक ही आवाज़ है, अगर मेरठ में एम्स बन जाए, तो दिल्ली क्यों जाएं? एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज बने एम्स, भेजे गए प्रस्ताव मेरठ में दो राज्य और चार निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालय हैं। प्रदेश की पहला खेल विवि भी यहां बन रहा है। तीन मेडिकल कॉलेज भी हैं। लेकिन एम्स या पीजीआई जैसे उच्चीकृत मेडिकल संस्थान की कमी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि इस पर कभी कोई बात नहीं हुई। संसद और विधानसभा में कई बार एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज को एम्स बनाने की मांग उठ चुकी है। मेरठ-हापुड़ के पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने और वर्तमान में राज्यसभा सदस्य डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने मेडिकल कॉलेज को एम्स में तब्दील करने या संस्थान बनाने की मांग कई बार उठाई। हाल फिलहाल भी डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने केंद्रीय बजट में यहां एम्स के लिए प्रावधान की मांग रखी है। नहीं भटकना पड़ेगा दिल्ली, मिल जाए मेरठ को एम्स डॉक्टर्स और प्रतिनिधियों का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एम्स या पीजीआई जैसा कोई बड़ा संस्थान नहीं है। इस कारण यहां के मरीजों को दिल्ली तक इलाज के लिए भटकना पड़ता है। यदि मेरठ मेडिकल कालेज एम्स में तब्दील हो जाए तो मरीजों को एम्स और पीजीआई नहीं भटकना पड़ेगा। इससे यहां का बजट भी बढ़ जाएगा, जिससे मरीजों को बेहतर इलाज और दवा मुहैया कराई जा सकेगी। अभी यहां का सलाना बजट स्टाफ का वेतन मिलाकर सिर्फ 150 करोड़ है। जबकि पीजीआई और राम मनोहर लोहिया जैसे संस्थानों को सालाना एक हजार करोड़ से ज्यादा का बजट मिलता है। एम्स तक पहुंचने में क्यों टूटती है मरीज की हिम्मत आम जनता की मानें तो दिल्ली एम्स का नाम सुनते ही मन में भरोसा जागता है। लेकिन उस भरोसे की कीमत क्या होती है, यह तब पता चलता है जब एम्स की दौड़ लगाई जाती है, रातों-रात दिल्ली पहुंचने की दौड़, एंबुलेंस का भारी खर्च, अस्पताल के बाहर लंबी कतारें, फुटपाथ पर रातें और इलाज के साथ-साथ रोजमर्रा की जद्दोजहद। कई बार मरीज इलाज से पहले ही आर्थिक और मानसिक रूप से हार जाता है। एम्स में मरीज का प्रवेश ही टेढ़ी खीर होती है। अगर वही सुविधाएं, वही विशेषज्ञता, वही तकनीक मेरठ में ही मिल जाए, तो कितने घरों की आंखों से आंसू सूख सकते हैं, इसका अंदाजा शायद कागजों में नहीं लगाया जा सकता। इसलिए मेरठ में भी एम्स की बहुत जरूरत है। एम्स के लिए क्या होना चाहिए लोगों का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार को मेरठ में एम्स व लोगों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही एलएलआरएम को औपचारिक रूप से एम्स का दर्जा दिया जाए। जहां सुपर स्पेशियलिटी विभाग, अत्याधुनिक जांच मशीनें और रिसर्च सेंटर स्थापित हों। सुपर स्पेशियलिटी विभाग, कैंसर, कार्डियोलॉजी, न्यूरो, ट्रांसप्लांट को प्राथमिकता पर विकसित किया जाए। आधुनिक मशीनें, विशेषज्ञ डॉक्टर और रिसर्च सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसके साथ ही डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की पर्याप्त भर्ती की जाए। वहीं जनता, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठनों को एकजुट होकर आवाज बुलंद करनी होगी ताकि यहां एम्स बन सके। जनप्रतिनिधि, डॉक्टर और जनता मिलकर एकजुट आवाज़ बनें, ताकि यह मांग कागज़ों से निकलकर ज़मीन पर उतरे। मेरठ को एम्स मिलने से क्या-क्या बदलेगा - गंभीर बीमारियों के मरीजों को दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा - गरीब और मध्यम वर्ग को इलाज के लिए कर्ज़ नहीं लेना पड़ेगा - आधुनिक मशीनें, सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर और रिसर्च सुविधाएं मिलेंगी - मेडिकल छात्रों को उच्च स्तरीय शिक्षा और प्रशिक्षण मिलेगा - पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई पहचान मिलेगी ये बोले डॉक्टर अस्पताल में तकरीबन सभी विभाग और उपकरण उपलब्ध हैं, लेकिन एम्स बनने से शिक्षा और इलाज की गुणवत्ता कई गुना बढ़ेगी। मेडिकल कालेजों को इंस्टीट्यूट में बदलने का प्रस्ताव शासन के पास लंबित है। एम्स बनने के बाद लोगों को दिल्ली भी नहीं जाना पड़ेगा। - डॉ. आरसी गुप्ता, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज मेरठ मेडिकल कॉलेज एम्स बन जाए, यह सभी की इच्छा रही है, हम भी चाहते हैं कि मरीजों को सभी सुविधाएं यहां मिल जाएं, दिल्ली जाना ही ना पड़े और अब तो यहां सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ता जा रहा है। - डॉ. केके गुप्ता, पूर्व प्राचार्य एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज को एम्स की तर्ज पर विकसित करने के प्रस्ताव कई बार भेजे जा चुके हैं। इमारतें, वार्ड, ट्रॉमा सुविधाएं—सब कुछ उस दिशा में बढ़ भी रहा है। डॉक्टरों और आम जनता की एक ही राय है कि यदि इसे एम्स का दर्जा मिल जाए। - डॉ. संदीप मित्थल, पूर्व प्राचार्य यहां एम्स बन जाएगा तो गंभीर बीमारियों के मरीजों को दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा, गरीब और मध्यम वर्ग को इलाज के लिए कर्ज़ नहीं लेना पड़ेगा, आधुनिक मशीनें, सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर और रिसर्च सुविधाएं मिलेंगी। - डॉ. प्रदीप भारती गुप्ता, पूर्व प्राचार्य एम्स बनने के बाद यहां छात्रों को उच्च स्तरीय शिक्षा और प्रशिक्षण मिलेगा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई पहचान मिलेगी, साथ ही मरीजों को दिल्ली नहीं भटकना पड़ेगा, लगातार इस संबंध में बात आगे बढ़ रही है। - डॉ. धीरज राज, एसआईसी मेरठ और आसपास के इलाकों के मरीजों को भी एम्स जाना पड़ता है, जबकि मेडिकल कॉलेज में अच्छी सुविधाएं हैं, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर है, ऐसे में यहां एम्स तो होना ही चाहिए, ताकि लोगों को परेशानी ना हो, सभी इलाज यहीं मिलें। - डॉ. अशोक कटारिया, सीएमओ, मेरठ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री से इस संबंध में बात की गई है, आग्रह किया गया है कि लाला लाजपत राय मेडिकल कॉलेज में एम्स सेटेलाइट केंद्र व केंसर इंस्टीट्यूट की स्थापना की जाए, पश्चिम यूपी के 14 जिलों का एक बड़ा केंद्र मेडिकल कॉलेज है, जिसे एम्स का दर्जा मिले। - डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी, सांसद, राज्यसभा मेडिकल कॉलेज चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में अग्राणी रहा है, यहां हजारों मरीज रोज आते हैं, लेकिन गंभीर बीमारी वाला मरीज सबसे पहले एम्स की तरफ जाता है, अगर यहां भी एम्स बन जाए तो हजारों लोगों को राहत मिलेगी। - डॉ. रियाज खान गोरखपुर और रायबरेली में जब एम्स बन सकता है, लखनऊ में एसजीपीजीआई हो सकता है तो मेरठ में एम्स क्यों नहीं हो सकता है, यह हमारी बहुत पुरानी मांग है, मेरठ में भी एम्स बनाया जाना चाहिए, ताकि गरीब लोगों को दिल्ली जैसा इलाज यहीं मिल सके। - सतीश त्यागी, प्रदेश अध्यक्ष, राजकीय मेडिकल कॉलेज कर्मचारी महासंघ

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