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26 सितम्बर, 2020|2:24|IST

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संपूर्ण त्याग ही आकिंचन्य धर्म कहलाता है : ज्ञानमती माताजी

संपूर्ण त्याग ही आकिंचन्य धर्म कहलाता है : ज्ञानमती माताजी

जंबूद्वीप में दशलक्षण पर्व के नौवें दिन आकिंचन्य धर्म मनाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवंतों का अभिषेक व शांतिधारा के साथ किया गया।

विधान में गणिनीप्रमुख आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी ने अकिंचन्य धर्म पर प्रवचन करते हुए कहा कि यह आत्मा शरीर से भिन्न है, ज्ञानमयी है, उपमा रहित है, वर्ण रहित है, सुख संपन्न है, परम उत्कृष्ट है और भयरहित है। इस प्रकार आत्मा का ध्यान करने से मन में आकिंचन्य धर्म प्रवृत्त होता है और जीव परिग्रहों से मुक्त होने की स्थिति में आ जाता है। बताया कि आकिंचन्य धर्म का पालन करते हुए भगवान आदिनाथ से लेकर उनके पुत्र भरत व भरत के पुत्र अर्ककीर्ति आदि इस प्रकार 14 लाख इक्ष्वाकुवंशीय राजा लगातार राजपाट को अपने उत्तराधिकारी को सौंपकर दीक्षा धारण करके मोक्ष गए। आर्यिका श्री चंदनामती माताजी द्वारा तत्त्वार्थसूत्र की नवम अध्याय का अर्थ सहित वाचन किया गया। पीठाधीश रवींद्र कीर्ति स्वामी जी द्वारा शांतिमंत्र का जाप किया गया। समस्त मांगलिक क्रियाएं प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन व प्रवीण चंद जैन ने संपन्न कराई।

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  • Web Title:Complete renunciation is called Akinnyanya religion Gyanmati Mataji