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दोहरीघाट पंप कैनाल का नाम तो बदला, नहीं बदली सूरत

प्रथम पंचवर्षीय योजना में बनी एशिया की पहली चौधरी चरण सिंह पंप कैनाल नहर जो चार रजवाहा समेत 40 माइनर शाखा संचालित करती है, दुर्व्यवस्थाओं का शिकार...

दोहरीघाट पंप कैनाल का नाम तो बदला, नहीं बदली सूरत
हिन्दुस्तान टीम,मऊSun, 26 May 2024 01:15 AM
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दोहरीघाट। प्रथम पंचवर्षीय योजना में बनी एशिया की पहली चौधरी चरण सिंह पंप कैनाल नहर जो चार रजवाहा समेत 40 माइनर शाखा संचालित करती है, दुर्व्यवस्थाओं का शिकार हो गई है। नहर की बदहाली का आलम ये है कि पोर्च जगह-जगह टूटकर गिर रहे हैं। नहर की दीवारों में दरार पड़ती जा रही है। वहीं, नहर के पोर्चों से पानी टपक रहा है, जिससे किसानों को भरपूर पानी नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह से उनकी हर सीजन की फसल प्रभावित हो रही हैं।
एशिया की वर्तमान में दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी नहर दोहरीघाट का नाम उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2013 में बदलकर चौधरी चरण सिंह पंप नहर कर दिया, लेकिन सूरत नहीं बदल सकी। किसानों के लिए वरदान यह नहर अब अस्तित्व के लिए जूझ रही है। राजनेताओं को नाम बदलने के साथ ही किसानों के हितों के लिए पंप नहर की सूरत भी बदलनी चाहिए, लेकिन ऐसा प्रयास नहीं हो रहा। पंप नहर का विस्तार 350 किलोमीटर में है। मऊ, बलिया जनपद से गुजरी इस नहर से किसानों को सिंचाई की सुविधा समय से नहीं मिलने पर उनका मोहभंग होता जा रहा है। निजी नलकूपों के सहारे क्षेत्र के किसान सिंचाई करने को विवश हैं।

शुरुआत के दिनों में छोटे-बड़े 55 माइनरों द्वारा पूर्वांचल की धरती पर शस्य श्यामला होकर सूखा के समय भी किसानों की आशाओं पर खरा उतरती थी। वर्ष 1954 में पंप कैनाल का निर्माण कराने वाले तत्कालीन सिंचाई मंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी की सोच इस नहर के जरिए पूर्वांचल के किसानों का उत्थान करना था। उन्होंने खेतों की सिंचाई की सुविधा देकर आर्थिक स्थिति को भी मजबूती दी। वहीं, दोहरीघाट में पंप कैनाल नहर स्थापित कर किसानों को बड़ी राहत दी थी। पंपों से छोड़े जाने वाले पानी की धारा का वेग और दबाव अधिक होने से उदगम स्थल से मुरादपुर तक पक्की नहर का निर्माण कराया गया है। मुरादपुर के आगे नहर खोदी गई है। लेकिन अर्चों से नहर के चालू रहने पर पानी टपकता रहता है, वहीं जगह जगह रिसाव भी हो रहा है। जबकि, नहर निर्माण के दौरान निकले कुलबो और नालियों की भी हालत दयनीय हो गई, जिससे पानी टेल तक पहुंच ही नहीं पाता है। नहर के ऊपर भी जगह-जगह झाड़-झंखाड़ उग आए हैं।

किसानों ने कायाकल्प कराने की उठाई मांग

दोहरीघाट। क्षेत्रीय किसानों का कहना है कि जैसे इसका नाम बदला गया, उसी तरह से सरकार इसके कायाकल्प के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करें, जिससे किसानों का कल्याण हो सके। सरकार को चाहिए कि इसे संज्ञान में लेकर लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई करें, ताकि पंप नहर अपनी पूरी क्षमता से चले।

लगान से निजात, परेशानी जस की तस

दोहरीघाट। पूर्व में सरकार ने किसानों का लगान तो माफ कर दिया, लेकिन सिंचाई विभाग के दुर्व्यवस्था को नहीं ठीक कर सकी। वर्तमान की सरकार भी किसानों के मुद्दे पर खामोश है। जर्जर हाल में पहुंची नहर के जीर्णोद्धार की जरूरत है, लेकिन क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों सहित अधिकारी भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अगर इस नहर को सही से चलाया जाए तो किसानों को बड़ी राहत मिलती।

क्षमता 660 क्यूसेक की, 450 क्यूसेक पानी ही छोड़ते हैं

दोहरीघाट। चौधरी चरण सिंह पंप कैनाल नहर की पानी देने की क्षमता 660 क्यूसेक है, जबकि 450 क्यूसेक भी पानी टेल तक पहुंचने में नहर असमर्थ है। इसमें 12 पंप लगे हुए हैं, जिसमें आठ पंप 60 क्यूसेक और चार पम्प 75 क्यूसेक की क्षमता की है। वहीं, दो पंप स्टैंण्ड बाई के रूप में लगे हुए हैं, लेकिन नहर की दीवाले क्षतिग्रस्त होने से नहर को पूरी क्षमता से नहीं चलाया जाता है।

एक नजर में पंप कैनाल नहर

पंप नहर की स्थापना-- वर्ष 1954

कुल पंपों की संख्या--12

संचालित पंप--10

स्टैंडबाई पंप--02

60 क्यूसेक प्रति पंप--08

75 क्यूसेक प्रति पंप--04

कुल रजवाहे--04

कुल माइनर--40

कुलबो की संख्या--750

कुल प्रतिदिन पानी निकालने का लक्षय--660 क्यूसेक

वर्तमान में पानी निकालने की क्षमता--450 क्यूसेक

कितनी हेक्टेयर भूमि सिंचित--45 हजार हेक्टेयर

कुल लंबाई--350 किमी

प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा

नहर के कायाकल्प के लिए प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है। अर्च की टपकती छत की मरम्मत के लिए सतह पर जियो मेंबरेन की नई तकनीक का उपयोग किया जाएगा। दीवारों की मरम्मत होगी। प्रस्ताव पर शासन की सहमति मिलते ही कार्यों को शुरू करा दिया जाएगा।

- मनोज कुमार सिंह, अधिशासी अभियंता सिंचाई विभाग, मऊ।

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