25 एकड़ क्षत्रेफल में लहरा रही है सब्जी की फसल, किसान खुश

Newswrap हिन्दुस्तान, मऊ
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Mau News - किसानों ने 25 एकड़ में बालू की रेत को मेहनत से हरे सोने की खदान में बदल दिया है। सरयू नदी के किनारे उगने वाली फसलें जैसे ककड़ी, खीरा, और तरबूज स्थानीय बाजार में आजीविका का साधन बन रही हैं। किसान दिन-रात मेहनत कर अपनी फसलों की देखभाल कर रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है।

25 एकड़ क्षत्रेफल में लहरा रही है सब्जी की फसल, किसान खुश

दोहरीघाट, हिन्दुस्तान संवाद। मेहनत और लगन से 25 एकड़ क्षेत्रफल में बालू के रेत को किसानों ने हरे सोने की खदान में बदल दिया है। कठिन परिश्रम से उनके बैंक खातों की इबारत भी बदलने लगी है। कभी बाढ़ एवं कटान की प्रलय ढाने वाली सरयू हमेशा तटवर्ती लोगों के लिए नुकसानदायक नहीं है, बल्कि लाभदायक भी है। यहां से निकल रहे गर्मियों में होने वाले जायद की फसलों के रूप में सब्जियां स्थानीय बाजार गुलजार कर सैकड़ों की आजीविका का मुख्य साधन बन उनकी तकदीर बदल रही हैं। नदी के किनारे के बालू की रेती किनारे बसने वाले किसानों की खेती के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।कस्बे

के रामघाट पर पड़े सरयू के रेत पर किसान कड़ी मेहनत करके ककड़ी, खीरा, तरबूज, खरबूजा, करैली, लौकी, कद्दू, नाशपाती, परवल, लौकी, कोहड़ा, प्याज, टमाटर आदि की फसलें लहलहा रही हैं। पानी घटने से नदी के बीच निकल आये रेत के टापू इन दिनों हरे सोने की खदान बने हुए हैं। यहां से निकल रहे गर्मियों में होने वाले जायद की फसलों के रूप में फल और सब्जियां स्थानीय बाजार गुलजार कर सैकड़ों की आजीविका का मुख्य साधन बन उनकी तकदीर बदल रही हैं। नदी के किनारे के बालू की रेती किनारे बसने वाले किसानों की खेती के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है। इन दिनों जब नदी का घेरा सिमटकर उत्तरी तलहटी में जा समाया है तो निकल आये रेत के टापू पर लगभग 25 एकड़ क्षेत्रफल में जायद की फसलें लहलहा रही हैं। किसान इन्हें देख खुश हैं, उनकी मेहनत रंग ला रही है। तटवर्ती किसान इनकी सुरक्षा, संरक्षा, वृद्धि एवं देखभाल के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत में जुटे हैं। दोहरीघाट पुल के पास मुक्तिधाम के समीप का इलाका इन फसलों के उत्पादन का अच्छा केन्द्र बन चुका है। साथ ही धनौली रामपुर गांव के सामने से लेकर नईबाजार तक सब्जी की खेती लहलहा रही है। कस्बे के ही अनिल साहनी, रामजी साहनी, सुरेश, रवि साहनी, शिला साहनी, सीताराम, खूबलाल, रामकिशुन, परमीला, तेतरी ऐसे नाम हैं जो सरयू की कोख में फल एवं सब्जियां उगाकर अपनी आजीविका को चला रहे हैं। वहीं इन क्षेत्रों में बिखर रही हरियाली की अनुपम छटा देखकर हर कोई उनकी मेहनत की तारीफ किये बिना नहीं रह पाता। नदी के किनारे रेत में उगने वाली इन फसलों को सिंचाई की भी बहुत आवश्यकता पड़ती है। वहां सिंचाई के लिए किसानों ने रेत में मिलने वाले पानी के सोतों का उपयोग करते हैं। किसानों का पूरा परिवार मिलकर घड़ों की सहायता से गड्ढों में एकत्र पानी को निकालकर उसे सिंचाई के काम में लाते हैं। रेत में फैली लताओं के बीच पौधों की जड़ों का स्थान ठीक से पता चले इसके लिए जड़ों के चारों ओर घेरा बना दिया गया है।

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