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28 नवंबर, 2020|1:37|IST

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चंद्र सरोवर पर महारास ने लुभाया

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साहित्य, संगीत और ब्रज संस्कृति के अनूठे संगम पारासौली स्थित चंद्र सरोवर पर शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में दो दिवसीय शरदोत्सव मनाया गया। इसमें द्वापर युगीन आभा दिखाई दी। महारास चबूतरे पर गोपी-गीत, पद गायन अमृत रूपी चंद्र सरोवर की जल तरंगों से लौटकर ऐसे गूंज रहे थे जैसे साक्षात श्रीकृष्ण देवलोक से उतरकर राधे व गोपियों के साथ महारास कर ब्रजवासियों को पुनः दर्शन दे रहे हों।

शरदोत्सव का शुभारंभ मलूक पीठाधीश्वर द्वाराचार्य संत राजेन्द्र दास महाराज ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। इसके बाद निकुंज बिहारी रास लीला मंडल के निदेशक राम शर्मा के निर्देशन में महारास में इत उत गोपी बिच बिच माधव नाचत ता ता थेई की अभिव्यक्ति के बीच श्रीकृष्ण व गोपियों के रूप में कलाकारों ने मनमोहक नृत्य किया। इसी बीच चंद्र सरोवर पर जलते हजारों दीप चंद्रमा की रोशनी में अपना प्रवाह छोड़कर भक्ति की पराकाष्ठा पर पहुंच रहे थे। भक्तों ने महारास का खूब आनंद लिया। इस दौरान हरिबाबू ओम, रासबिहारी कौशिक, हरस्वरूप शर्मा, देवेन्द्र शर्मा, पंकज शर्मा, यमुना मिशन के संस्थापक प्रदीप बसंल, दाऊ दयाल शर्मा, माधव दास, सुरेश शास्त्री, प्रहलाद शर्मा एड. आदि रहे।

चंद्रसरोवर पर किया श्रीकृष्ण ने महारास

श्रीकृष्ण की लीलाओं में अलौकिक महारास के अनुपम वर्णन में आजु गोपाल रास रस खेलत, पुलिन कल्पतरु तीर री सजनी, शरद विमल नभ चंद्र विराजत, रोचक त्रिविध समीर री सजनी, सरद की रैन जगमगै, तामें खेलत गौर स्याम मिलि रास का भाव समाहित है। भागवत रसिक रासबिहारी कौशिक ने कहा कि आज के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अनेकों गोपियों के साथ यहां महारास किया था। महारास में भगवान ने अपने मन को आकाश में चंद्रमा रूप में स्थापित किया। वह चंद्रमा भी भगवान का रूप देखकर दृवित होकर पिघल गया और चंद्र सरोवर के रूप में विद्यमान है। यहां दीपदान से महारास में प्रवेश का अवसर मिलता है। यहां का हर एक दीपक गोपी रूप है। आकाश में स्थापित चंद्रमा के दर्शन जब चंद्र सरोवर के जल में होते हैं तो साक्षात श्रीकृष्ण चंद्र के दर्शन होते प्रतीत होते हैं।