For the first time coalition politics has failed in Mathura - पहली बार मथुरा में गठबंधन की राजनीति हुई फेल DA Image

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पहली बार मथुरा में गठबंधन की राजनीति हुई फेल

17वीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनावों में मथुरा लोकसभा क्षेत्र से ऐसा पहली बार हुआ है जब गठबंधन की राजनीति पूरी तरह फेल हो गई। अन्यथा इससे पूर्व दो बार राष्ट्रीय स्तर पर हुए गठबंधन की राजनीति मथुरा में सफल रही है और सत्तापक्ष को मात खानी पड़ी थी। खास बात यह है कि कांग्रेस के विरोध में जब भी गठबंधन हुआ है, सफल रहा है।

इंदिरा गांधी द्वारा इमरजेंसी लगाने के बाद कांग्रेस के विरोध में विपक्ष एकजुट था। आज की भारतीय जनता पार्टी उस समय जनसंघ हुआ करती थी। 1977 में जब चुनाव हुए तो जनसंघ भी कांग्रेस विरोधी गठबंधन में शामिल था। मथुरा से भारतीय लोकदल से मनीराम बागड़ी चुनाव लड़े। जनसंघ का मनीराम बागड़ी को समर्थन था। इमरजेंसी विरोधी लहर में हुए इस चुनाव में भारतीय लोकदल के मनीराम बागड़ी जीते थे।

इसके बाद कांग्रेस के विरोध में विपक्ष बोफोर्स के मुद्दे को लेकर एकजुट हुआ। 1989 में जनता दल और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा। मथुरा लोकसभा सीट से जनता दल की टिकट पर कुंवर मानवेंद्र सिंह लड़े और उन्होंने कांग्रेस की टिकट पर लड़े उस समय के विदेश राज्य मंत्री कुंवर नटवर सिंह को पराजित कर दिया। इस तरह तब भी गठबंधन सफल रहा था।

2009 में कांग्रेस के विरोध में भाजपा और रालोद का गठबंधन हुआ। गठबंधन के तहत मथुरा सीट से रालोद लड़ी और रालोद के जयंत चौधरी ने बसपा के श्याम सुंदर शर्मा को मात दी।

इस लोकसभा चुनाव में ऐसा गठबंधन था जो भाजपा के विरोध में था। गठबंधन में रालोद, बसपा और सपा शामिल थे। लेकिन इस चुनाव में गठबंधन फेल हो गया और भाजपा प्रत्याशी हेमामालिनी विजयी रहीं।

गठबंधन के सफल प्रत्याशी

1977-मनीराम बागड़ी (भारतीय लोकदल)

1989-कुंवर मानवेंद्र सिंह (जनता दल)

2009-जयंत चौधरी (रालोद)

नोट : इन तीनों गठबंधन में भाजपा (1977 में जनसंघ) शामिल थी।

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