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तपोभूमि के अवशेष देखने लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं लोग

हिन्दुस्तान टीम,मैनपुरीNewswrap
Sun, 14 Nov 2021 06:25 PM
तपोभूमि के अवशेष देखने लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं लोग

जनपद के ऐतिहासिक मार्कण्डेय मेले की तैयारियां शुरू हो गई हैं। दुकानदार मेले में दुकानें सजाने के लिए पहुंचने लगे हैं। कार्तिक पूर्णिमा पर घिरोर के विधूना में हर वर्ष प्राचीन मेला लगता है। मार्कण्डेय ऋषि की गिनती इतिहास के सर्वश्रेष्ठ ऋषियों में होती है। मार्कण्डेय ऋषि को सब तीर्थों का भांजा भी कहा जाता है। बाहरी दुकानदार आने लगे हैं। इस बार 19 नवंबर से मेला शुरू होगा।

ग्राम विधूना में स्थित महर्षि मार्कण्डेय की तपोभूमि पर कार्तिक की पूर्णिमा पर विशाल मेले का आयोजन किया जाता है जहां देश के कई प्रांतों से आने वाले श्रद्धालु मेले में प्रतिभाग करते हैं। मेले का महत्व न केवल धार्मिक उद्देश्य से है बल्कि क्षेत्रीय लोगों के लिए भी इसका बड़ा महत्व है। मेले में माटी की मटकी, लाठी, लकड़ी का सामान, लोहे का सामान, पत्थर का सामान काफी सस्ती दरों पर मिलता है। क्षेत्रीय लोग वर्ष भर की गृहस्थी इसी मेले से खरीदते हैं। महाभारत तथा रामायण काल की कई गाथाओं को समेटे महर्षि मार्कण्डेय की तपोभूमि पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

देखरेख के अभाव में अस्तित्व पर खड़ा हो रहा संकट

कोसमा। महर्षि मार्कण्डेय के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने तप से यमराज को भी परास्त कर दिया तथा अपनी अल्प आयु को दीर्घ आयु में परिवर्तित करने का काम किया। जानकार बताते हैं कि जब पांडवों को अज्ञातवास हुआ तो यहां पर उन्होंने कुछ समय बिताया था। जिसका प्रमाण यहां स्थित उनके तपस्या वाले पांच चबूतरों से मिलता है। चबूतरों की स्थिति अब अच्छी नहीं है। वहीं पर एक शिव मंदिर भी है जहां पांडव पूजा अर्चना किया करते थे। मार्कण्डेय ऋषि के मंदिर से इस मंदिर की दूरी कुछ मीटर ही है।

सीता ने यहीं गुजारे वनवास के दिन

कोसमा। मेला समिति के आयोजक विकास पाठक का कहना है कि मान्यता है कि विधूना में घना जंगल था। इसी जंगल में वाल्मीकि ऋषि की कुटिया थी। वनवास के दौरान लक्ष्मण सीता को यहीं छोड़कर अयोध्या वापस चले गए थे। तब सीता ने वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में शरण ली। आज भी सीता की रसोई एवं वाल्मीकि कुटिया के प्रतीक मौजूद है।

समुद्रमंथन में प्रयोग की गयी मथनी के हैं अवशेष

कोसमा। विकास पाठक का कहना है कि बुजुर्ग बताते हैं कि देवासुर संग्राम के दौरान समुद्र मंथन का कार्य किया गया था। उस समय देवता एव दैत्यों ने समुद्र मंथन के लिए मथनी का प्रयोग किया था। महर्षि मार्कण्डेय के मंदिर के ठीक सामने समुद्र मंथन में प्रयोग की गयी मथनी के प्रतीक आज भी मौजूद हैं। इस पर लोग प्रसाद आदि चढ़ाकर मनौतियां मांगते हैं।

यहीं था महाभारत काल के विदुर का किला

कोसमा। बताया जाता है कि विधूना गांव में महाभारत काल के विदुर का किला था ऐसी किवदंती है कि भगवान कृष्ण ने विदुर के घर झूठे साग का सेवन किया था। ऐसा भी माना जाता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दिन यहीं गुजारे थे। विदुर के टीले से चंद कदमों की दूरी पर पांच पांडवों के चबूतरों के अवशेष आज भी मौजूद हैं।

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